दोहा: ५
कबीर माया पापिणी, हरि सूँ करे हराम।
मुखि कस्तूरी महमही, कुबधि कुहाड़ा काम॥
कथा: "कस्तूरी का लालच"
एक बार एक राहगीर जंगल से गुज़र रहा था। उसे अचानक कहीं से बहुत ही दिव्य और भीनी-भीनी खुशबू आई। वह राहगीर मंत्रमुग्ध हो गया। उसने सोचा, "जिस चीज़ की खुशबू इतनी प्यारी है, वह चीज़ कितनी कीमती होगी!"
वह उस खुशबू के पीछे भागने लगा। रास्ते में काँटे लगे, उसके पैर लहूलुहान हो गए, उसने खाना-पीना छोड़ दिया, लेकिन वह खुशबू उसे और दूर खींचती रही। अंत में उसने देखा कि वह खुशबू उसकी अपनी ही झोली में रखे एक छोटे से कस्तूरी के टुकड़े से आ रही थी, जिसे वह भूल चुका था। वह बाहर जिस 'खजाने' को पाने के लिए मर रहा था, वह उसके पास ही था। लेकिन उस कस्तूरी के मोह ने उसे पूरे जंगल में भटका दिया और अंत में उसे थकाकर चूर कर दिया।
सीख :
कबीर यहाँ 'माया' को पापिणी कह रहे हैं, क्योंकि वह बड़ी चालाक है। माया का मतलब कोई जादू-टोना नहीं है; माया का मतलब है वह 'भ्रम' जो तुम्हें यह यकीन दिलाता है कि सुख बाहर की चीज़ों में है।
वह कस्तूरी की तरह मीठी लगती है, लेकिन काम कुल्हाड़ी जैसा करती है—यानी वह तुम्हारी 'बुद्धि' और तुम्हारे 'समय' को काट देती है। तुम पद, पैसा और प्रतिष्ठा के पीछे भागते हो यह सोचकर कि वहाँ शांति मिलेगी, लेकिन माया तुम्हें अंत तक सिर्फ दौड़ाती रहती है।
कबीर समझा रहे हैं कि जो तुम बाहर खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर ही है। जब तक तुम बाहर की चमक-दमक (माया) में उलझे रहोगे, तब तक तुम अपने असली स्वभाव (हरि) को कभी नहीं पहचान पाओगे।
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दोहा: ६
साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं।
जो धन का भूखा फिरे, सो तो साधु नाहिं॥
कथा: "कीमती भेंट"
एक बहुत अमीर आदमी एक मशहूर संत के दर्शन करने गया। उसने सोचा कि संत को प्रभावित करने के लिए वह सबसे महँगा उपहार ले जाएगा। उसने हज़ारों सोने की मोहरें एक रेशमी थैली में भरीं और गर्व के साथ संत के चरणों में रख दीं। वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, यह उम्मीद करते हुए कि संत उसकी खूब तारीफ करेंगे और उसे 'विशेष' भक्त मानेंगे।
संत ने थैली की तरफ देखा भी नहीं। वह पास बैठे एक गरीब किसान से बात करते रहे जो अपने साथ चढ़ाने के लिए केवल एक लोटा पानी और एक फूल लाया था। अमीर आदमी को चिढ़ हो गई, वह बोला, "महाराज, मैंने आपको इतना धन दिया और आप इस गरीब किसान को ज़्यादा सम्मान दे रहे हैं?"
संत मुस्कुराए और बोले, "बेटा, तुम यहाँ धन देकर अपनी 'अमीरी' का प्रदर्शन कर रहे हो, अपनी श्रद्धा नहीं दिखा रहे। तुमने धन दिया ताकि मैं तुम्हारी प्रशंसा करूँ, यानी तुमने सौदा किया है, भेंट नहीं दी। यह किसान जो लाया है, उसमें इसकी पूरी सादगी और प्रेम है। मुझे तुम्हारे सोने की नहीं, तुम्हारे भाव की ज़रूरत थी।"
सीख :
इसे गहराई से समझना। कबीर यहाँ केवल साधु-संतों की बात नहीं कर रहे, वे उस 'नीयत' की बात कर रहे हैं जिससे तुम संसार में व्यवहार करते हो।
अहंकारी आदमी हर चीज़ को पैसे से तौलता है। वह सोचता है कि वह सम्मान भी खरीद सकता है और भगवान को भी। लेकिन कबीर कह रहे हैं कि जहाँ 'लेन-देन' का भाव आ गया, वहाँ कोई पवित्रता नहीं बची। जो इंसान तुमसे कुछ पाने की लालसा रखता है, वह तुम्हें रास्ता क्या दिखाएगा? वह तो खुद ही अपनी ज़रूरतों का गुलाम है।
असली 'साधुता' का मतलब है—अंदरूनी अमीरी। जिसे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, वही तुम्हें सही आईना दिखा सकता है। अगर तुम सच को पाना चाहते हो, तो अपनी जेब नहीं, अपना 'भाव' बड़ा करो। क्योंकि सच बाज़ार में नहीं बिकता, वह केवल समर्पित मन को मिलता है।
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क्या हम भी अपने रिश्तों और श्रद्धा में 'सौदा' तो नहीं कर रहे? कबीर की यह चोट अगर आपके मन को छुई हो, तो इस यात्रा को जारी रखने के लिए मुझे Matrubharti पर Follow ज़रूर करें।
आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अनमोल है। अगले अध्याय में जानेंगे—क्या है वो चीज़ जो मौत के बाद भी साथ जाती है?"