दोहा: ३
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥
कथा: "कड़वी ज़ुबान का ज़हर"
एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। वह दान-पुण्य बहुत करता था, लेकिन उसकी ज़ुबान बहुत कड़वी थी। वह अपने नौकरों और परिवार वालों से हमेशा चिल्लाकर और अपमानजनक तरीके से बात करता था। उसे लगता था कि चूंकि वह पैसा दे रहा है, तो उसे कुछ भी बोलने का हक है।
एक दिन एक संत उसके द्वार पर आए। व्यापारी ने उन्हें भी झिड़क दिया। संत मुस्कुराए और बोले, "बेटा, तुम महल में तो रहते हो, लेकिन तुम्हारे शब्द कांटे की तरह हैं। क्या तुम्हें पता है कि जब तुम किसी को बुरा बोलते हो, तो सबसे पहले वह ज़हर तुम्हारे अपने भीतर घुलता है?"
व्यापारी ने पूछा, "वह कैसे?" संत ने कहा, "क्रोध का शब्द बोलने से पहले तुम्हारे मन को जलना पड़ता है। जैसे जलता हुआ कोयला दूसरों पर फेंकने से पहले तुम्हारा अपना हाथ जलता है। तुम्हारी वाणी का असर दूसरों पर बाद में होता है, तुम्हारे अपने स्वास्थ्य और शांति पर पहले होता है।" व्यापारी को समझ आ गया कि शांत शब्द दूसरों के लिए ही नहीं, खुद के सुकून के लिए भी ज़रूरी हैं।
सीख :
यहाँ कबीर आपको केवल 'मीठा बोलने' की सलाह नहीं दे रहे, बल्कि वह आपके अहंकार (मन का आपा) पर चोट कर रहे हैं।
जब कबीर कहते हैं 'मन का आपा खोय', तो उनका मतलब है कि जब तक तुम्हारे भीतर 'मैं' (Ego) बड़ा है, तुम्हारी वाणी में कर्कशता रहेगी ही। तुम मीठा बोलने का नाटक तो कर सकते हो, लेकिन वह बनावटी होगा।
असली शीतलता तब आती है जब तुम सामने वाले को भी अपने जैसा ही एक इंसान समझते हो। कबीर कह रहे हैं—ऐसी भाषा चुनो जो तुम्हारे भीतर के गुस्से को शांत करे और सुनने वाले के मन को भी राहत दे। जो शब्द तुम्हें खुद अशांत कर दें, उन्हें बोलना सिर्फ़ अज्ञानता है। याद रखो, शब्द ही घाव देते हैं और शब्द ही मरहम बनते हैं। चुनाव तुम्हारा है।
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दोहा: ४
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रूँदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रूँदूँगी तोहे॥
कथा: "मिट्टी का हिसाब"
एक मूर्तिकार था जिसे अपनी बनाई मूर्तियों और अपनी ताकत पर बड़ा गुमान था। वह जब मिट्टी गूँथता, तो उसे पैरों से बहुत बुरी तरह कुचलता और कहता, "देख मिट्टी, मैं तेरा मालिक हूँ। मैं जैसा चाहूँ तुझे वैसा मोड़ सकता हूँ। मेरी मर्जी के बिना तू बस धूल है।"
एक दिन जब वह मिट्टी को पैरों से कुचल रहा था, उसे लगा जैसे जमीन से एक धीमी आवाज़ आई। मिट्टी कह रही थी, "ऐ इंसान! आज तू ऊपर है, इसलिए मुझे कुचल रहा है। तुझे अपनी जवानी और अपनी शक्ति पर भरोसा है। पर भूल मत, यह खेल बस कुछ ही सालों का है। एक दिन तू थकेगा, गिरेगा और इसी मिट्टी में मिल जाएगा। तब मैं ऊपर होऊँगी और तू मेरे नीचे। फिर मैं तुझे अपने भीतर समेट लूँगी।" मूर्तिकार का हाथ रुक गया और उसका सिर शर्म से झुक गया।
सीख :
यह दोहा हमें हमारी असलियत याद दिलाता है। हम जिसे 'अहंकार' कहते हैं, वह अक्सर उन चीज़ों पर होता है जो परमानेंट (permanent) हैं ही नहीं—जैसे हमारा शरीर, हमारा पद या हमारी दौलत।
कबीर यहाँ किसी को डरा नहीं रहे, बल्कि हमें होश में ला रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जिस मिट्टी (शरीर) पर तुम्हें इतना नाज़ है, वह अंत में मिट्टी ही हो जानी है। जब अंजाम सबको पता है, तो फिर बीच के सफर में इतना घमंड क्यों? जीवन का असली आनंद 'मालिक' बनने में नहीं, बल्कि इस सत्य को स्वीकार करने में है कि हम सब इस प्रकृति का एक छोटा सा हिस्सा हैं।
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"अहंकार का पोस्टमार्टम" की यह यात्रा अभी शुरू हुई है। कबीर के इन गहरे रहस्यों को और अधिक विस्तार से समझने और जीवन के कड़वे मगर ज़रूरी सत्यों से रूबरू होने के लिए मुझे Matrubharti पर Follow करें।
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