khooni kashmkash in Hindi Thriller by vishnupriya pandit books and stories PDF | हैरानी - Ateet ki Yaadein - 5

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हैरानी - Ateet ki Yaadein - 5

Episode -5 (खूनी कश्मकश) 


अस्पताल की सफेद दीवारों के पीछे छिपे राज़ अब धीरे-धीरे दम घोंटने लगे थे। 

डॉक्टर सिन्हा और नर्स डेजी एक बार फिर रिया के कमरे में दाखिल हुए। कमरे में फैली फिनाइल की तीखी गंध और मशीनों की 'बीप-बीप' के बीच रिया शांति से लेटी थी। आज उसकी हालत पहले से कुछ बेहतर लग रही थी, लेकिन उसकी आँखो में अब भी एक अनसुलझी पहेली तैर रही थी।

इलाज शुरू करते हुए डॉक्टर सिन्हा ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की। उन्होंने रिया की नब्ज़ टटोलते हुए बहुत ही धीमी आवाज़ में पूछा, "क्या मैं तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ?"

रिया ने अपनी बड़ी-बड़ी हैरान आँखो से डॉक्टर सिन्हा की ओर देखा और बस इतना कहा, "पूछिए?"

"कौन हो तुम? तुम्हारा घर कहाँ है? और तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है?" डॉक्टर सिन्हा के इन सवालों ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।

रिया के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई, जिसमें दर्द साफ़ झलक रहा था। 

उसने पलटकर पूछा, "क्या आपको वाकई मेरे बारे में कुछ नहीं पता, डॉक्टर साहब?"

डॉक्टर सिन्हा ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उनके चेहरे पर तनाव साफ था। "तुमने कभी बताया ही नहीं, तो हमें कैसे पता होगा?"

रिया कुछ देर के लिए शून्य में ताकने लगी। उसकी खामोशी डॉक्टर सिन्हा को बेचैन कर रही थी। उन्होंने नर्स डेजी की तरफ एक अर्थपूर्ण नज़र डाली और फिर रिया से पूछा, "क्या हुआ? तुम अचानक चुप क्यों हो गई? क्या सोच रही हो?"

रिया ने ठंडी आह भरते हुए कहा, "हैरानी की बात है! आपको मेरे बारे में कुछ भी पता नहीं है, फिर भी आप इतनी शिद्दत से मेरा इलाज कर रहे हैं। क्या मैं जान सकती हूँ कि ऐसा क्यों?"

डॉक्टर सिन्हा के अंदर जैसे एक पल के लिए इंसानियत जाग उठी। उन्होंने संजीदगी से जवाब दिया, "देखो, यह हर डॉक्टर का फर्ज होता है कि सामने वाले मरीज की पहचान चाहे जो भी हो, बिना एक पल की देरी किए उसका इलाज शुरू कर दे। हमारा काम जान बचाना है, सवाल पूछना नहीं।"

डॉक्टर सिन्हा की यह बात सुनकर रिया की आँखों के कोरों में आँसू तैरने लगे। वह भावुक होकर बुदबुदायी, "मैं यहाँ कैसे आई? और आखिर मुझे हुआ क्या है?"

रिया का यह मासूम सवाल डॉक्टर सिन्हा के दिमाग में हथौड़े की तरह लगा। वे मन ही मन सोचने लगे, 'यह कैसा माजरा है? इस लड़की को यह तक नहीं पता कि इसे यहाँ कौन लाया? इसे अपनी हालत की खबर नहीं और हमें इसकी पहचान का पता नहीं। और वो मास्कमैन... उसका इस लड़की से क्या नाता है? यह उलझन सुलझने के बजाय और उलझती ही जा रही है।'

तभी डॉक्टर सिन्हा की नज़र रिया के हाथ पर पड़ी। वह उस पुरानी तस्वीर को अब भी कलेजे से लगाए बैठी थी। डॉक्टर सिन्हा ने जिज्ञासावश पूछा, "अच्छा तुम, यह बताओ कि इस तस्वीर में ऐसा क्या है जो तुम इसे एक पल के लिए भी खुद से अलग नहीं करती? क्या तुम्हें ऐसी तस्वीरें बहुत पसंद हैं?"

रिया ने उस तस्वीर को बड़े प्यार से देखा, जैसे वह कोई कागज़ का टुकड़ा नहीं बल्कि उसकी पूरी कायनात हो। उसने कहा, "हाँ... यह मुझे बहुत पसंद है।"

"पर क्यों? इसमें ऐसा खास क्या है?" डॉक्टर सिन्हा ने कुरेदने की कोशिश की।

रिया उन यादों में खोते हुए सिर्फ इतना बोली, "बहुत कुछ!" 

उसके जवाब ने डॉक्टर सिन्हा को और भी ज़्यादा परेशान कर दिया। वे बिना कुछ कहे कमरे से बाहर आए और गलियारे में पड़ी एक बेंच पर बैठ गए। उनका सिर चकरा रहा था।

अंदर कमरे में, नर्स डेजी ने देखा कि डॉक्टर सिन्हा जा चुके हैं और रिया अकेली है। उसने धीरे से रिया के पास जाकर कहा, "सुनो, मुझे तुम्हें कुछ ज़रूरी बात बतानी है।"

"जी, बोलिए!" रिया ने चौंक कर देखा।

नर्स डेजी ने इधर-उधर देखते हुए फुसफुसाकर कहा, "तुम्हें यहाँ वो 'मास्कमैन' लेकर आया था। रात के करीब दो बज रहे थे जब वह तुम्हें बुरी हालत में यहाँ लाया था। तुम पूरी तरह बेहोश थी।"

यह सुनते ही रिया बिस्तर से झटके के साथ उठ खड़ी हुई। उसने नर्स डेजी का हाथ पकड़ लिया और कांपती आवाज़ में पूछा, "कौन है वो मास्कमैन? क्या आप मुझे बता सकती हैं कि वो दिखता कैसा है? और मुझे क्या हुआ है?"

नर्स डेजी खुद हैरान रह गई। "यही सवाल तो मैं तुमसे पूछने वाली थी! क्या तुम्हें वाकई नहीं पता कि वो कौन है?"

"नहीं! मुझे कुछ याद नहीं," रिया बदहवास होकर चिल्लाई।

नर्स डेजी ने उसे शांत कराते हुए कहा, "अपने दिमाग पर ज़ोर डालो। याद करने की कोशिश करो। वो तुम्हारा कोई पुराना दोस्त हो सकता है... या शायद कोई पुराना दुश्मन? कोई तो होगा जो तुम्हें इस तरह यहाँ छोड़ गया। याद करने की कोशिश करो कि तुमने किसी के साथ कुछ गलत तो नहीं किया?"

नर्स डेजी ने रिया को दवा दी और उसे आराम करने का बोलकर बाहर निकल गई। रिया ने दवा खाई और बिस्तर पर लेट गई, पर उसकी आँखें उस तस्वीर पर टिकी थीं। धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद होने लगीं और वह फिर से उन्हीं पुरानी, धुंधली और दर्दभरी यादों के भंवर में समा गई।

उधर डॉक्टर सिन्हा ने ठान लिया था कि वे इस राज़ की तह तक जाकर ही रहेंगे। 

उन्होंने नर्स डेजी से कहा, "तुम नए स्टोर रूम की तलाशी लो, मैं पुराने स्टोर रूम में जाता हूँ। शायद किसी पुरानी फाइल में कोई सुराग मिल जाए।"

पुराने स्टोर रूम का दरवाज़ा खोलते ही धूल का एक गुबार उठा। डॉक्टर सिन्हा जैसे ही अंदर बढ़े, मकड़ी के जालों ने उन्हें घेर लिया। जालों को हटाते हुए वे धूल-मिट्टी के बीच आगे बढ़े। वहाँ की पुरानी बत्ती बार-बार झपक रही थी, जिससे माहौल और भी डरावना लग रहा था। उन्होंने अपनी टॉर्च जलाई। अलमारी में पीली पड़ चुकी पुरानी फाइलों का ढेर लगा था।

उन्होंने पागलों की तरह फाइलें खंगालनी शुरू कीं। वे उस चेतावनी का मतलब ढूंढ रहे थे— 'उसे जल्दी ठीक करो'। उनके मन में बस एक ही सवाल गूँज रहा था, 'किसे ठीक करने की बात हो रही है? क्या वो उस लड़की की बात कर रहा है या कोई और? कौन है वो?' घंटों की मशक्कत के बाद भी उन्हें कुछ हाथ नहीं लगा।

जब वे बाहर आए, तो नर्स डेजी भी हताश खड़ी थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। "सर, मुझे भी कुछ नहीं मिला," उसने निराश होकर कहा।

डॉक्टर सिन्हा का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने गुस्से में पास की दीवार पर ज़ोर-ज़ोर से घूंसे मारने शुरू कर दिए। "कुछ नहीं मिल रहा! सब कुछ खत्म हो रहा है!" वे चिल्लाए।

नर्स डेजी ने उन्हें संभाला, "सर, शांत हो जाइये। हमें अस्पताल के बाकी मरीजों और स्टाफ से बात करनी चाहिए। शायद किसी और डॉक्टर ने किसी नए मरीज को देखा हो जिसके बारे में हमें खबर न हो।"

इसी बीच वहाँ के एक सीनियर डॉक्टर वर्मा आ पहुँचे। डॉक्टर सिन्हा ने उनसे पूछा, "वर्मा साहब, क्या मेरी गैरमौजूदगी में यहाँ कोई अजीब मरीज आया था?"

डॉक्टर वर्मा अचानक ठहाका मारकर हँसने लगे। उनकी हँसी पूरे गलियारे में गूँज गई। "डॉक्टर सिन्हा! शायद आपकी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। दो साल पहले बिल्कुल ऐसी ही एक मरीज आई थी, जिसे आपने खुद हैंडल किया था। क्या आप उसे इतनी जल्दी भूल गए?"

डॉक्टर वर्मा की बात सुनकर डॉक्टर सिन्हा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वे मन ही मन बुदबुदाए, "उसी दिन का ही तो भुगतान कर रहा हूँ... काश उस दिन मैं यहाँ न होता।"

डॉक्टर वर्मा के जाने के बाद डॉक्टर सिन्हा अपने केबिन में चले गए। केबिन की दीवार पर लगी घड़ी की 'टिक-टिक' अब उनके कानों में हथौड़ों की तरह बज रही थी। तभी उनकी नज़र फिर उस दीवार पर पड़ी जहाँ वो धमकी लिखी थी। उन्होंने एक कपड़ा लिया और उसे पागलों की तरह रगड़ने लगे।

हैरानी की बात यह थी कि वे उस स्याही को जितना साफ़ करते, वह उतनी ही गहरी और सुर्ख लाल होती जा रही थी। जैसे वह कोई साधारण स्याही नहीं, बल्कि ज़ख्म से निकलता ताज़ा खून हो। 

डॉक्टर सिन्हा के हाथ दुखने लगे, वे पसीने से तर-बतर होकर नीचे फर्श पर बैठ गए। उनकी हार साफ़ दिख रही थी।

तभी नर्स डेजी अंदर आई और चीख पड़ी, "सर! देखिए! यह रंग और भी गहरा हो गया है!"

दीवार पर लिखी धमकी अब किसी डरावने साये की तरह चमक रहा थी। डॉक्टर सिन्हा की हिम्मत टूट चुकी थी। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, "डेजी... यहाँ रहना अब मौत को दावत देना है। चलो, यहाँ से भाग चलते हैं!"

दोनों बदहवास होकर अस्पताल के मुख्य दरवाज़े की तरफ भागे। जैसे ही वे बाहर निकलने वाले थे, तभी सामने...

"सामने कौन था? क्या वह मास्कमैन था या अतीत का


नमस्ते मेरे प्यारे! पाठकों उम्मीद है आपको ' हैरानी: अतीत की यादें' का यह पांचवा अध्याय खूनी कश्मकश पसंद आया होगा। अस्पताल की दीवारे अब राज उगलने लगी और डॉक्टर सिन्हा का वह 2 साल पुराना अतीत इस कहानी में एक ऐसा मोड़ ले आया है। जिसकी कल्पना शायद आपने नहीं की होगा। वह कौन है जिसे जल्दी ठीक करने की धमकी दी जा रही है? और रिया की उन यादों में ऐसा क्या छिपा है जो डॉक्टर सिन्हा की रातों की नींद उड़ा रहा है। अपनी राय कमेंट्स में जरूर बताएं। जानने के लिए बने रहें हमारे साथ। कहानी पसंद आए तो रेटिंग जरूर करें। और मुझे फॉलो कर लें!"