Storeys - Part 45 in Hindi Motivational Stories by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 45

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मंजिले - भाग 45

 ------------------------मंजिले कहानी सगरहे कि सब से सुंदर क्लाकृति मेरी यही कहानी जुर्म ही बड़ी खास चर्चित है। पता कयो ये सच्ची कहानी है एक दम रीड की हडी की तरा "------- ताजुब है न। "
                               (जुर्म )
      सुबह की वही छटपटाट वही हर रोज की तरा दुपहर तक बिज़ी घर घर की कहानी.... कही पर चीख कही हसने की आवाजे कही मदहोशी की चुस्की चाये की, बनारस के शहर मे मंदिरो की घंटिया वजने के चल चित्र.. हर कोई आपनी लीला मे डूबा हुआ महादेव के जैकार कर रहा था। नुकड़ पे चाये के किये भीड़ देख चाचा चाये वाले की ख़ुशी... रेलवे जक्शन पर गाड़ियों मे भीड़.. कोई आ रहा कोई जा रहा... गंगा के पानी मे कोई डुबकी लगा रहा कोई शांत जल को देख रहा... कोई मोबाईल पे मग्न अख़बार की खबर मे मग्न था कोई दिल से चाह कर पाठ मे मग्न था। 
                            इसी बीच शहर के मुहल्ला मे तीन युवकों का प्रवेश हुआ.. बाइक तेज थी... अन्धो की तरा। पहले एक फिर दो तेज.... लोग पीछे मुड़ कर देख रहे थे" ---कया हुआ इन लड़को को।" खूब तेजम तेज।
रुक कर एक बाइक से बोला... " जयादा दूर नहीं गया होगा.. कमबख्त... तू इधर भाग.. मै बीच की सड़क पर। " वहा एक ही आवाज थी चीर देंगे साले को। " जक्शन पर सीढ़ियों पे बैठे दोनों आफ रहे थे... तभी राज ने कहा ---" ठीक हो तुम " अजली बोली "हाँ " फिर चुप दोनों। 
                          "यहां से निकल चले " अजली ने खुशक लवो से पानी वाली बोतल लगायी। अंजली खूबसूरत थी.. बहुत ही... उसके वाल अर्ध कट थे। राज भी कम नहीं था... थे दोनों पड़ोसी.. पर जवानी की गर्म तासीर वाह इश्क था।
                          लेकिन उपरले वहाव होते है... जिसे समाज कभी कभी बर्दास्त नहीं करता...इसे ही लव मर्जी कहते है (मैरिज ) राज और अंजली एक ट्रेन की खाली ट्रेन से निकल कर एक डिब्बे से दूसरी और निकल गया था। लाईने पार करते करते राज ने कहा --"अंजली कैसे बंद आँखो से देख लेते है। " अंजली चुप थी। डिब्बे मे दोनों बैठ गए थे। राज पर उसको यकीन था... अंधा विश्वास था। घर उससे वसाना था। राज की स्टूडेंट थी.. वो परफेसर था... शादी शुदा था एक बच्चा था उसका। लेकिन वो इसलिये छोड़ कर चला आया था उसकी घरवाली जानी वाइफ हद से जयादा नुक्ताचीनी वाली.. आपने भाईयों की ऐसी तैसी कराने मे आतुर...
                                ये भी अगर वो घर लिख कर आते न, तो पता कभी चलना ही नहीं था। धकड़ थे उसके साले दोस्त, पताल तक पीछा न छोड़े। राज कह रहा था.. " बम्बे के गांव मे हमारा बसेरा होगा... " अंजली कह रही थी " राज मुझे छोड़ मत जाना " उसने उसका हाथ सहलाते हुए कहा। राज को ये बात हजम नहीं हुई... " कयो ऐसा कयो कहा... कया यकीन नहीं मुझ पर... " अजली ने हाँ मे सिर हिलाते हुए कहा। 
                       जक्शन पर आख़र ढूंढ लिया था... यहां वो बैठे थे वही उनका आना हो गया। काफ़ी बचे पर नहीं... पकड़े गए। सत्य कहानी पर आधारत राज जेल में है। अजली के बाप ने उसकी शादी उसे वक़्त कर दी... उनकी जिंदगी ऐसे हो गयी थी जैसे पिंजरे मे परिंदे। अजली के अब दो बच्चे... राज भी एक साल बाद नमोशी का मारा आज उसने आना था। वही महुहले मे कब, कैसे जाता... लेने सिर्फ उसकी बीवी गयी। " उसने बस इतना कहा " अगर तुम मेरी नोक जोक से दुखी थे, तो कह देते। भागना इसका कोई साफ क्रेक्टर है। " राज चुप था। अजली उसके बाद कभी चिलाई नहीं..... दो बच्चे तीसरा होने वाला था।
चुप थे दोनों ही।   ----------नीरज शर्मा