(1) ( ये सत्य कहानी पर आधारत अपराध बोध की कहानी है... नाम कल्पनिक है।)
" तोता राम झूठ बोले " ये बनवारी ने कहा था। बनारस से पानीपत आ चूका मंदिर मे दस साल बाद। पहले कया था, ये तो उसका अतीत ही बता सकता है, या बनारस की वो गलियों और खुली हवेलीयों के पिछवाड़े... वक़्त उस अतीत का ज़ब वो कही भी किसी की जेब काट काट कर कुछ बना भी तो पंडित उपाराम का शगिर्द... उपराम था एक नबर का कंजूस... चाये भी वो चुस्की लेकर पीता हुआ पूछता था, पता कया " पता है मुझे तू पीकर आया है " ये था उसका गुरु... शगिर्द ने उसको बाहर की घड़ी कलाई पे बाधने को दी थी... चमकती थी वो रात्रि को भी। उसके शगिर्द दस मे से एक बनवारी को ही चाहता था... बनवारी उसे कुछ न कुछ देता रहता था.... पर उपाराम को नहीं पता था... कहा से आता है ये माल... उसे कया चाहे कही से भी हो... वो और को तो कुछ दे चाहे न दे पर बनवारी को रोटी कम मंदिर पे चढ़ने वाले फल अक्सर खाने को दे देता देता था... लकड़ी की सीढ़ियों पे चढ़ना उसे बहुत अच्छा लगता था।
उसके साथ रस्सा लटका हुआ रहता था, सीढ़ियों मे अंधेरा.... पढ़ाई पंडित की पूरी होने के बाद बनवारी ने तो एक पगड़ी और सौ का नोट चमकता उसे दे दिया था "-- जियो मेरे लाल, कोशिश करता हूँ, यही कही तुझे तालीम के बाद मंदिर कोई पक्का दे दू..." बनवारी खुश था। गुरू भी खुश हो जाता था। बस इसके चलते दस साल हो गए थे।
बनारस मे ही एक छोटा मंदिर मिल गया। उसकी जो तनखाह थी, कोई पांच सौ रूपये महीना पर.. चढ़ावा पंडित का... मंदिर था बाके बिहारी ज़ी का... बनवारी अब निठला तो बिलकुल नहीं था। चालू भी था। पर पंडितगिरी को लाज भी नहीं लगने देना चाहता था। कुल मिला कर देखे तो वो अब गिरगिट बन जाना चाहता था।
पर आदते कहा छुट्टती है। बच कर जरा, धीरे से, बस। भय कहा था, बाके ज़ी की पूजा आरती रोजाना होती रही थी। "सुना था, ब्राह्मण हो " एक शक्श ने पूजा काल के दौरान पूछा। " हाँ ज़ी " बनवारी ने कहा।
" एक मेरा लड़का है, अगर उसे ठीक कर सकते हो। " उसने आँखे भरते हुए कहा। " कया बीमार है " बनवारी ने घंटी वजाते कहा।
"नहीं --- उसको ऊपरी कोई बाधा है, वो चुप रहता है।" उस शक्श ने धीमे स्वर मे कहा। "अच्छा --- आपको कैसे पता " बनवारी ने कहा। डॉक्टर की कोई रिपोर्ट मे कुछ नहीं आता.. वो उसे नीद की गोली देकर सोने पे जोर देते है। " बनवारी सुन कर इस लफड़े को सुन कर चुप कर गया। " कुछ भी पंडित ज़ी जो मेरे पास है उसका ही है, मै लाखो का मालिक पर किस काम का " बनवारी की आँखो मे चमक आ गयी। " आप करते कया है महाशय " वो रुक कर बोला फिर " आपका लड़का किधर है ---" वो महाशय बोला " मै पानीपत रहता हूँ, आप चलो तो उधर ही सेट भी कर दुगा। " बनवारी ने आरती करनी थी। बाके ज़ी का पहली बार धयान किया... जैसे कोई तरंग जागी हो। " आरती के बाद " अब बोलो महाशय "। वो शक्श थोड़ा रुक कर बोला " आप पानीपत चल सकते है " बनवारी दो चित हो गया। ये मंदिर छोड़ कर इतनी दूर, कोई और वहा नहीं है। " वो शक्श ने रुदन किया, " आप विश्वास नहीं करेंगे, सपन मे बाके बिहारी ज़ी ने आपका ही नाम लिया, और आपको पहले ही दिखा कर कहा, यही आपके लडके को ठीक करेगा। " बनवारी की सिटिपिटी गुल हो गयी। " महोदय सत्य कह रहे हो, मै नहीं मानता " वो शक्श बोला " उन्होंने कहा वो मानेगा नहीं, " तो उसे जोर देकर कहना, गुरू जो आपके उपाराम है घड़ी कलाई पे बधी है, वो मेरी है भाव बाके की है, वो समझ जायेगा..... " बनवारी का सुन कर रंग उड़ गया, चेहरा पीला पड़ गया।----------------- अगले अंक पे यही कहानी "तोता राम " अगले पेज पर। ( नीरज शर्मा )