Boons - 9 in Hindi Mythological Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | वरदान - 9

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वरदान - 9

एक दिन वरदान गाँव के कुछ लड़कों के साथ कंचे खेल रहा था।
हर बार की तरह वह अपनी दोनों मणियों से खेल रहा था और हर बाज़ी जीतता जा रहा था।
बाकी लड़के हैरान थे—
“अरे, ये कैसे हर बार जीत जाता है!”
तभी एक लड़का अपने साथ अपने एक दोस्त को लेकर आया।
वह लड़का गाँव का नहीं था—वह पास के नगर के एक जौहरी का बेटा था।
उसकी नज़र जैसे ही वरदान के हाथ में उन मणियों पर पड़ी, वह एकदम ठिठक गया।
उस दिन खेल ख़त्म होने के बाद वह जौहरी का बेटा सीधे अपने घर पहुँचा।
उसका मन बेचैन था—वह बार-बार उन्हीं मणियों के बारे में सोच रहा था।
जैसे ही वह अपने पिता के पास पहुँचा, उसने उत्साह और हैरानी से कहा—
“पिताजी, आज मैंने एक लड़के के पास ऐसी मणियाँ देखीं… जो मैंने पहले कभी नहीं देखीं। वे बिल्कुल अलग थीं…  
जौहरी ने उसकी बात ध्यान से सुनी। वह वर्षों का अनुभवी था, उसकी आँखें तुरंत चमक उठीं।

“क्या तुमने ध्यान से देखा था?”
लड़के ने सिर हिलाकर हाँ कहा और पूरी बात विस्तार से बता दी।
जौहरी कुछ देर सोचता रहा, फिर उसने अपनी पेटी खोली और उसमें से एक काँच की मणि निकाली—
वह बिल्कुल वैसी ही दिखती थी जैसी वरदान के पास थी।
उसने वह मणि अपने बेटे को देते हुए कहा—
“कल तुम उस लड़के के पास जाओ… और मौका देखकर उसकी मणियों के बदले यह काँच की मणि बदल देना। उसे पता भी नहीं चलेगा।”
लड़का थोड़ा घबराया, पर अपने पिता की बात मान गया।
उसकी आँखें फैल गईं—
“ये… ये तो साधारण कंचे नहीं हैं…”
अगले दिन फिर वही खेल शुरू हुआ।
वरदान और बाकी लड़के कंचे खेल रहे थे।
जौहरी का बेटा भी उनके साथ बैठ गया। उसकी नज़र बार-बार वरदान की मणियों पर ही थी।
खेलते-खेलते उसने मौका देखा—
जब सब लड़के खेल में मग्न थे और वरदान का ध्यान कहीं और था, तब उसने चुपके से अपनी लाई हुई काँच की मणि वरदान की एक असली मणि से बदल दी।
शाम को जब वरदान खेलकर घर लौटा, तो उसके चेहरे पर दिनभर की थकान के साथ हल्की-सी खुशी भी थी।
हमेशा की तरह उसने अपनी दोनों मणियाँ निकालीं और उन्हें झोपड़ी की दीवार के एक कोने में रख दिया—
ताकि रात होते ही उनकी रोशनी से उसका छोटा-सा घर जगमगा उठे।
धीरे-धीरे अँधेरा घिरने लगा।
झोपड़ी के बाहर सन्नाटा था, और अंदर माँ अपने काम में लगी थी।
कुछ ही देर में मणियाँ हल्की-हल्की चमकने लगीं…
पर आज उनकी रोशनी में भी कुछ बदलाव था।
एक मणि पहले की तरह उजली और शांत प्रकाश दे रही थी,
लेकिन दूसरी की चमक कुछ फीकी थी—जैसे उसमें जान ही न हो।

वरदान कुछ देर तक उन मणियों को देखता रहा।
फिर वह उठकर अपनी माँ के पास गया और बोला—
“माँ, देखो… आज ये मणि पहले जैसी नहीं चमक रही।”
छोटी रानी ने अपने बेटे के हाथ से मणियाँ लीं और ध्यान से देखने लगी।
वह सीधी-सादी  थी—उसे इन मणियों के असली रहस्य का कोई ज्ञान नहीं था।
उसने हल्की मुस्कान के साथ बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा, ये मणियाँ अब पुरानी हो गई होंगी… इसलिए एक खराब हो गई है। ऐसा हो जाता है।”
वरदान ने माँ की बात मान ली,
पर उसके मन की शंका पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
उसने फिर से मणियाँ दीवार पर रख दीं,
जहाँ एक मणि उजली रोशनी दे रही थी…
और दूसरी फीकी-सी चुपचाप पड़ी थी।
उस रात झोपड़ी में रोशनी तो थी,
पर पहले जैसी चमक  नहीं थी।
उधर जौहरी का बेटा चुपचाप वह मणि अपने घर ले गया।
उसके मन में डर भी था और उत्साह भी।
जैसे ही उसने वह मणि अपने पिता को दी, जौहरी की आँखें चमक उठीं।
उसने मणि को ध्यान से देखा, अलग-अलग रोशनी में परखा…
फिर उसके चेहरे पर एक लालची मुस्कान आ गई।

“ये तो बहुत ही कीमती मणि है… ऐसी मणि तो मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी।”
वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला—
“मैं इसे लेकर सीधे राजा के पास जाऊँगा।
राजा इसे देखकर अवश्य प्रसन्न होंगे…
और मुझे बहुत बड़ा इनाम देंगे।”
जौहरी के मन में अब केवल एक ही विचार था—
लाभ और लालच।
अगले ही दिन जौहरी ने उस मणि को बड़े आदर से एक चाँदी की थाली में रखा।
उसने उसे सावधानी से लाल रेशमी कपड़े से ढक दिया, मानो कोई अनमोल खज़ाना हो।
फिर वह पूरे सज-धज के साथ राजदरबार की ओर चल पड़ा।
राजमहल के ऊँचे द्वार पर पहुँचकर उसने पहरेदारों से कहा—
“मुझे महाराज से मिलना है। मेरे पास उनके लिए एक अत्यंत कीमती भेंट है।”
पहरेदारों ने उसे भीतर जाने की अनुमति दी।
कुछ ही देर में वह भव्य दरबार में पहुँचा, जहाँ राजा अपने सिंहासन पर विराजमान थे।
जौहरी ने झुककर प्रणाम किया और धीरे से बोला—
“महाराज, मैं आपके लिए एक अनमोल रत्न लेकर आया हूँ… ऐसी मणि, जो आपने पहले कभी नहीं देखी होगी।”
पूरा दरबार उसकी ओर उत्सुकता से देखने लगा।
जौहरी ने धीरे-धीरे उस लाल कपड़े को हटाया…
जैसे ही कपड़ा हटा,
मणि की चमक पूरे दरबार में फैल गई—
उसकी रोशनी इतनी तेज़ थी कि सभी की आँखें कुछ पल के लिए ठहर गईं।
राजा ने जैसे ही उस मणि को देखा, उनकी आँखें चमक उठीं।
उन्होंने उसे ध्यान से अपने हाथ में उठाकर हर ओर से परखा—उसकी चमक अद्भुत थी, मानो उसमें कोई दिव्य शक्ति छिपी हो।
कुछ क्षण के लिए वे मौन हो गए…
फिर उनके मन में एक विचार आया।
राजा (मुस्कुराते हुए):
“यदि ऐसी दो मणियाँ हों… तो मैं अपनी राजकुमारी के लिए इनसे सुंदर झुमके बनवा सकता हूँ। वह कितनी प्रसन्न होगी!”
दरबार में बैठे मंत्री भी उस मणि की प्रशंसा करने लगे।
राजा ने जौहरी की ओर देखते हुए कहा—
“यह मणि अत्यंत अद्भुत है। तुम्हें इसके लिए उचित इनाम मिलेगा…
लेकिन मुझे ऐसी ही एक और मणि चाहिए।”
जौहरी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उसे तो पहले से ही पता था कि दूसरी मणि कहाँ है…
उसने झुककर उत्तर दिया—
“महाराज, आपके आदेश का पालन अवश्य होगा। मैं शीघ्र ही आपके लिए दूसरी मणि भी प्रस्तुत करूँगा।”
राजा संतुष्ट हो गए…
अगले दिन जौहरी का बेटा फिर से गाँव आया।
वह सीधे उस मैदान की ओर गया, जहाँ वरदान अपने दोस्तों के साथ खेलता था।
जैसे ही वह वहाँ पहुँचा, उसने देखा—
वरदान पहले की तरह ही सबके साथ कंचे खेल रहा था।
लड़के हँस रहे थे, खेल में मग्न थे…
पर जौहरी के बेटे की नज़र केवल एक चीज़ पर थी—
वरदान के हाथ में बची हुई दूसरी मणि।
वह भी बाकी लड़कों के साथ बैठ गया,
पर उसका ध्यान खेल में कम और उस मणि पर ज़्यादा था।
वह मन ही मन सोच रहा था—
“आज मुझे किसी भी तरह यह दूसरी मणि भी हासिल करनी है…”
जौहरी के बेटे को देखते ही वरदान और उसके दोस्त बहुत खुश हो गए।
अब उन्हें लगने लगा था कि वह उनका अपना ही साथी बन गया है—
जो रोज़ उनके साथ खेलने आता है।
सब बच्चों ने हँसते हुए उसका स्वागत किया—
“अरे, तुम फिर आ गए! आओ, आज साथ में खेलते हैं।”
वरदान तो विशेष रूप से प्रसन्न था।
उसने उसे अपना सच्चा दोस्त मान लिया था।
धीरे-धीरे जौहरी के बेटे ने भी सबके साथ घुलना-मिलना शुरू कर दिया।
वह हँसता, खेलता, और बातों में सबका मन जीत लेता।
कुछ ही दिनों में उसने वरदान से अच्छी दोस्ती कर ली।

जौहरी का बेटा भी अब बच्चों के साथ बैठकर कंचे खेलने लगा।
आज वह अपने साथ घर से बहुत सारी मिठाई लेकर आया था।
उसने बड़े प्यार से सब बच्चों को मिठाई बाँटी—
“लो, आज सब मिलकर खाते हैं!”
बच्चे बहुत खुश हो गए।
सबने मिलकर मिठाई खाई और फिर खूब हँसते-खेलते खेल खेलने लगे।
आज का दिन पूरी तरह मस्ती और दोस्ती में बीत रहा था।
जौहरी का बेटा भी उनके साथ खेलता रहा, हँसता रहा…
पर उसके मन में छिपा हुआ उद्देश्य अभी भी जिंदा था।
लेकिन आज उसे वह मौका नहीं मिल पाया,
जब वह वरदान की दूसरी मणि चुरा सके।
सारा समय बच्चों की भीड़ और खेल में ही बीत गया।
शाम को जब जौहरी का बेटा घर पहुँचा, तो उसके पिता ने तुरंत उससे पूछा—
“क्या हुआ? आज दूसरी मणि लाई?”
लड़के ने धीरे से सिर झुका लिया और बोला—
“नहीं पिताजी… आज मौका नहीं मिला।”
जौहरी का चेहरा कठोर हो गया, पर लड़का चुपचाप खड़ा रहा।
सच तो यह था कि आज उसके पास मौका था भी नहीं…
पर अगर होता भी, तो शायद वह मणि चुराता नहीं।
उसे अब वरदान और उसके दोस्तों के साथ खेलना अच्छा लगने लगा था।
उनके साथ हँसना, दौड़ना, कंचे खेलना—
ये सब उसके लिए बिल्कुल नया था।
बचपन से ही उसे कभी खुलकर खेलने नहीं दिया गया था।
उसके पिता उसे दिन-रात अपने काम में लगाए रखते—
रत्नों को पहचानना, उनका मूल्य जानना, सौदा करना…
पर आज पहली बार उसे बचपन का असली सुख मिला था।
वह जानता था—
अगर उसने वह दूसरी मणि चुराकर अपने पिता को दे दी,
तो फिर उसे कभी भी वरदान और उसके दोस्तों के साथ खेलने नहीं भेजा जाएगा।
इसलिए उसने मन ही मन तय कर लिया—
“कुछ दिन और… मैं बस कुछ दिन और अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता हूँ…”
उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—
अगले दिन जब जौहरी का बेटा खाली हाथ घर लौटा,
तो जौहरी का क्रोध फूट पड़ा।
उसने गुस्से में बेटे से पूछा—
“मणि कहाँ है?”
लड़का डरते हुए बोला—
“पिताजी… आज भी मौका नहीं मिला…”
बस इतना सुनना था कि जौहरी का धैर्य टूट गया।
उसने गुस्से में आकर अपने ही बेटे को मारना शुरू कर दिया।
लड़का दर्द से चिल्ला उठा—
पर उसके मुँह से एक ही बात निकल रही थी—
“मैं चोरी नहीं करूँगा…”
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे,
पर उसके दिल में अब भी अपने दोस्तों के लिए सच्चाई थी।
जौहरी को अपने बेटे के दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ा।
उसकी आँखों में सिर्फ लालच था—
“मुझे वो दूसरी मणि चाहिए… किसी भी कीमत पर!”

अगले दिन जौहरी का बेटा भारी मन से गाँव पहुँचा।
उसके चेहरे पर उदासी थी और आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
वरदान ने उसे देखते ही पूछा—
“क्या हुआ? तुम इतने चुप क्यों हो?”
लड़का कुछ पल चुप रहा…
फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह धीरे-धीरे बोला—
“वरदान… मुझे तुमसे एक बात कहनी है…
मेरे पिताजी… उन्होंने मुझे तुम्हारी मणि चुराने को कहा था…”
वरदान यह सुनकर चौंक गया,
पर उसने कुछ नहीं कहा… बस ध्यान से उसकी बात सुनता रहा।
लड़का रोते हुए बोला—
“मैंने एक मणि बदल दी…
और अब वो दूसरी भी लाने को कह रहे हैं…
अगर मैं नहीं लाया, तो वो मुझे फिर मारेंगे…”
यह सुनकर वरदान का मन पिघल गया।
उसे अपने दोस्त के दर्द से ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं दिया।
उसने बिना एक पल सोचे अपनी बची हुई मणि निकालकर उसके हाथ में रख दी और मुस्कुराते हुए बोला—
“अगर इससे तुम्हें मार नहीं पड़ेगी…
तो ये ले जाओ।”
लड़का स्तब्ध रह गया—
उसने सोचा भी नहीं था कि वरदान इतना बड़ा दिल दिखाएगा।
उसकी आँखों से आँसू और तेज़ बहने लगे।


जौहरी बहुत प्रसन्न था।
उसके हाथ में अब दोनों मणियाँ थीं—
जिनके लिए वह कई दिनों से चाल चल रहा था।
उसने फिर से उन्हें बड़े आदर से एक चाँदी की थाली में रखा,
और ऊपर से लाल रेशमी कपड़े से ढक दिया।
इस बार उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और लालच दोनों साफ दिखाई दे रहे थे।
वह सीधा राजदरबार की ओर चल पड़ा।
दरबार में पहुँचकर उसने झुककर प्रणाम किया और कहा—
“महाराज, आपके आदेशानुसार मैं दूसरी मणि भी लेकर उपस्थित हुआ हूँ।”
राजा के चेहरे पर प्रसन्नता की चमक आ गई।
जौहरी ने धीरे-धीरे लाल कपड़ा हटाया…
और दोनों मणियाँ एक साथ चमक उठीं।
उनकी रोशनी पहले से भी अधिक तेज़ थी—
पूरा दरबार मानो प्रकाश से भर गया।
राजा अत्यंत प्रसन्न हुए
राजा उन दोनों मणियों को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।
उन्होंने कुछ देर तक उन्हें ध्यान से देखता रहा।

जौहरी “तुमने बहुत ही अनमोल भेंट दी है।
हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं।”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा—
“तुम कल सुबह दरबार में आना…
तुम्हें तुम्हारा योग्य इनाम दिया जाएगा।”
जौहरी के चेहरे पर खुशी झलक उठी।
उसने झुककर प्रणाम किया और बोला—
“जैसी महाराज की आज्ञा।”
इसके बाद वह गर्व और संतोष के साथ दरबार से बाहर चला गया।
उसके मन में अब केवल एक ही विचार था—
कल उसे बड़ा इनाम मिलने वाला है।

राजा दरबार से उठकर राजा उन दोनों मणियों को अपने हाथों में लेकर सीधे राजकुमारी के महल की ओर चल पड़े।
राजकुमारी अपने कक्ष में बैठी थी। जैसे ही उसने अपने पिता को आते देखा, वह मुस्कुराते हुए खड़ी हो गई।

“पिताजी, आप इस समय यहाँ?”
राजा ने स्नेह से उसकी ओर देखा और बोले—
“बेटी, आज मैं तुम्हारे लिए एक विशेष उपहार लेकर आया हूँ।”
उन्होंने धीरे से अपनी हथेली खोली…
और वे दोनों चमकती हुई मणियाँ सामने आ गईं।
उनकी रोशनी पूरे कक्ष में फैल गई।
राजकुमारी की आँखें आश्चर्य से चमक उठीं—
“वाह पिताजी! ये कितनी सुंदर हैं!”
राजा मुस्कुराए और बोले—
“मैं इनसे तुम्हारे लिए सुंदर झुमके बनवाऊँगा।
तुम इन्हें संभाल कर रखना।”
राजकुमारी ने खुशी-खुशी वे मणियाँ अपने हाथों में ले लीं।
पर  उसमें झुमके बनाने तक न पहने का सबर नहीं था।

अगले दिन सुबह राजकुमारी ने बड़ी प्रसन्नता से उन दोनों मणियों को एक सुंदर हार में जड़वाया।
जब उसने वह हार पहना, तो मणियों की चमक उसके गले में और भी मनमोहक लग रही थी।
राजकुमारी ने दर्पण में खुद को देखा और मुस्कुरा उठी।
उस दिन वह भगवान के दर्शन करने के लिए मंदिर गई।
मंदिर का वातावरण शांत और पवित्र था—
घंटियों की मधुर ध्वनि, धूप की सुगंध और भक्तों की प्रार्थनाएँ चारों ओर गूँज रही थीं।
जैसे ही राजकुमारी मंदिर के भीतर पहुँचीवह भगवान के सामने खड़ी होकर आँखें बंद करके प्रार्थना करने लगी—
“हे प्रभु, मेरे राज्य की रक्षा करना और मेरे पिता को सदा सुखी रखना…”जैसे ही राजकुमारी पूजा करने बैठी,
मंदिर में अचानक एक गहरी और गूँजती हुई आवाज़ सुनाई दी।
वह आवाज़ सीधे भगवान की मूर्ति की ओर से आ रही थी—
“जा  स्त्री दो मणियों की माला पहनकर मुझे दिखाने आई है…
यदि तू मेरी सच्ची भक्त है,
तो अगली बार सौ  मणियों की माला, झुमके और कंगन पहनकर आना…
अन्यथा, जैसे ही तू मंदिर में प्रवेश करेगी, मैं तुझे श्राप दे दूँगा!”
राजकुमारी यह सुनकर काँप उठी।
उसके हाथ थरथराने लगे, और उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया।
पूरे मंदिर में सन्नाटा छा गया।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसी दिव्य वाणी है।
राजकुमारी तुरंत उठी और डरते हुए महल की ओर लौट गई।
उसके मन में केवल एक ही विचार घूम रहा था—
“मैं सौ  मणियाँ कहाँ से लाऊँगी?”