माँ अपने बेटे को गोद में उठा कर दौड़ती रही उसे पता ही नहीं था कि वो कहा जा रही है।
पीछे पड़े सैनिक ओर आगे भयानक जंगल ।उसे आगे का रास्ता ही नहीं पता था ।वो भागती रही, जब तक एक उफनती हुई नदी के किनारे नहीं पहुँची। लहरें गरज रही थीं, मानो स्वर्ग भी उनकी पीड़ा सुन रहा हो। पीछे से बड़ी रानी के सैनिकों की मशालें पास आती जा रही थीं।
छोटी रानी ने अपने नन्हे बेटे को कसकर सीने से लगा लिया। उसकी आँखों में निराशा चमक रही थी।
मेरे लाल… अगर आज इन निर्दयी हाथों ने हमें पकड़ लिया तो महाराज का सम्मान ओर मेरी मरयादा सब मिट जाएगी। इस लिए में हमे इस नदी की गोद सौंप रही हूं।
राजवर्धन मासूम आँखों से माँ को देख रहा था, कुछ समझ नहीं पा रहा था, पर आँसुओं की धार देखकर उसकी पकड़ और मज़बूत हो गई।
छोटी रानी ने उसकी ललाट को चूमा और रोते-रोते प्रार्थना की—
“हे भगवान! हम अब तुम्हारी शरण में है । चाहे हम जीवित रहे या मर जाए।”
कठोर हृदय से उसने नदी में छलांग लगा दी ।
जैसे ही माँ और बेटा नदी में कूदे, उफनती हुई धारा उन्हें अपने साथ बहाकर ले जाने लगी। पानी की तेज़ लहरें चारों ओर गरज रही थीं।
अचानक नदी में एक प्रचंड उफान आया। उस उफान ने छोटी रानी को उठाकर दूसरे किनारे पर फेंक दिया। वह अचेत-सी रेत पर पड़ी रही, पर जीवित थी।
कुछ ही क्षण बाद नदी में दूसरा उफान उठा। उस लहर ने राजवर्धन को भी अपने साथ बहाकर दूसरे किनारे की ओर फेंक दिया। छोटा-सा बालक पानी में भीगता हुआ किनारे की रेत पर आ गिरा।
लेकिन उस उफान के साथ राजवर्धन को कुछ और भी मिला था। नदी की धारा के साथ दो रहस्यमयी वस्तुएँ उसके पास आकर ठहर गईं—दो छोटी-छोटी जादुई मणियाँ।
वे मणियाँ मानो जीवित थीं, उनमें कोई अद्भुत शक्ति जाग रही थी।
जैसे ही नन्हे राजवर्धन के हाथ उन मणियों से स्पर्श हुए, अचानक उनमें छिपी हुई दिव्य शक्ति जाग उठी।
क्षणभर में वह शक्ति प्रकाश की तरह उठी और सीधे राजवर्धन के शरीर में समा गई।राजवर्धन कुछ देर तक रेत पर पड़ा रहा। जब उसे होश आया तो उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से आसपास टटोलना शुरू किया। तभी उसकी नज़र उन दो मणियों पर पड़ी जो नदी की धारा के साथ उसके पास आकर ठहर गई थीं।
वे साधारण पत्थरों जैसी दिखाई दे रही थीं, पर कुछ देर पहले उनमें से अद्भुत प्रकाश निकला था।
राजवर्धन ने मासूमियत से दोनों मणियों को उठा लिया और अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया।
उसे यह नहीं पता था कि उन मणियों की सारी शक्ति अब उसके भीतर समा चुकी है। अब वे केवल साधारण, कीमती पत्थरों की तरह उसके हाथ में रह गई थीं।नदी की तेज़ धारा माँ और बेटे को बहाते हुए दूर एक दूसरे राज्य की सीमा तक ले आई। सुबह होने तक दोनों किनारों से चलते हुए अंततः एक ही दिशा में बढ़ते गए और उसी राज्य के एक छोटे से गाँव के पास पहुँच गए।
यह वह स्थान था जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता था। उनका अतीत, उनका राजमहल, और उनके ऊपर लगा झूठा कलंक—सब उस नदी की धारा में पीछे छूट चुका था।
गाँव के लोगों ने देखा कि एक अकेली स्त्री है, जिसकी गोद में एक छोटा-सा बच्चा है। दोनों की हालत बहुत दयनीय थी। कपड़े फटे हुए थे, चेहरा थकान और भूख से मुरझाया हुआ था।
गाँव वालों के मन में उस स्त्री और उसके बच्चे के लिए दया जाग उठी। वे आपस में बातें करने लगे—
“बेचारी किसी मुसीबत की मारी लगती है।”
“देखो तो, गोद में छोटा बच्चा भी है… कहाँ जाएगी यह?”
फिर गाँव के कुछ दयालु लोगों ने मिलकर निर्णय लिया कि उसकी सहायता करनी चाहिए। सबने मिलकर थोड़ी-थोड़ी मेहनत की और गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी बना दी, ताकि वह स्त्री अपने बच्चे के साथ वहाँ रह सके।
इस प्रकार छोटी रानी और उसका पुत्र राजवर्धन उस अनजान राज्य में एक नई जिंदगी शुरू करने लगे—
एक ऐसी जिंदगी, जहाँ कोई उन्हें राजघराने का नहीं, बल्कि एक साधारण माँ और बेटे के रूप में जानता था।छोटी रानी अब उस नए राज्य में एक साधारण स्त्री की तरह रहने लगी। वह अपने और अपने बेटे के पालन-पोषण के लिए वह गाँव के लोगों के घरों में काम करने लगी। वह किसी के घर झाड़ू-पोंछा करती, पानी भरती, कभी रसोई में काम करती ,लोगो ले कपड़े धोती इसी तरह दिन भर मेहनत करने के बाद जो थोड़ा बहुत अन्न या पैसा मिलता, उसी से वह अपने बेटे का पेट भरती।
राजवर्धन अभी छोटा था। वह अपनी माँ को चुपचाप काम करते देखता और कई बार उसकी आँखों में आँसू आ जाते। उसे समझ नहीं आता था कि उसकी माँ इतनी मेहनत क्यों करती है, पर वह हमेशा उसकी उँगली पकड़कर उसके साथ-साथ चलता रहता।
छोटी रानी हर रात अपने बेटे को सीने से लगाकर सो जाती और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती—
“हे प्रभु, मेरे बेटे की रक्षा करना। यही अब मेरा सब कुछ है।”
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। समय के साथ राजवर्धन भी बड़ा होने लगा। अब वह “वरदान” के नाम से जाना जाने लगा।
वह गाँव के बच्चों के साथ खेलता, उनके साथ पढ़ाई करता और कभी-कभी गाँव वालों की गाय-बकरियाँ चराने भी चला जाता। उसे यह काम बहुत प्रिय था, क्योंकि जंगल और खुले मैदान में उसे एक अजीब-सी शांति मिलती थी।
वरदान के पास एक छोटी-सी बाँसुरी थी जो उसे एक दिन जंगल में खेलते हुए मिली थी । जब भी वह उसे बजाता, उसकी धुन इतनी मधुर होती कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता।
केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जंगली पक्षी, गाय और बकरियाँ भी उसकी धुन सुनकर उसकी ओर खिंचे चले आते।
जब वह जंगल में गाय-बकरियाँ चराने जाता, तो एक शांत जगह बैठकर बाँसुरी बजाने लगता। धीरे-धीरे उसकी गाय और बकरियाँ चारों ओर चरते-चरते खुद ही उसके पास आ जातीं और शांत होकर उसके आसपास बैठ जातीं।
कई बार तो जंगल के पक्षी भी पास के पेड़ों पर आकर बैठ जाते और उसकी धुन सुनते रहते।
गाँव के लोग अक्सर कहते—
“इस बच्चे की बाँसुरी में जैसे जादू बसता है,जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है।”समय बीतता गया और देखते ही देखते वरदान बारह वर्ष का हो गया था।
हालाँकि अब वह एक साधारण चरवाहे के रूप में गाँव में रहता था, पर उसके व्यक्तित्व में एक राजकुमार जैसी गरिमा झलकती थी। उसका रूप ऐसा था कि जो भी उसे देखता, एक पल के लिए ठहर जाता।
उसकी आँखों में तेज था, चेहरा उज्ज्वल और चाल में आत्मविश्वास।
गाँव के बच्चे उसके साथ खेलते तो थे, पर उसकी बुद्धि और चतुराई के सामने कोई टिक नहीं पाता था। चाहे खेल हो, पढ़ाई हो या कोई कठिन काम—वरदान हर चीज़ में सबसे आगे रहता।
वह केवल रूप से ही सुंदर नहीं था, बल्कि मन से भी अत्यंत शांत, दयालु और बुद्धिमान था।
जहाँ दूसरे बच्चे झगड़ा करते, वहाँ वरदान सबको समझाकर शांति करा देता।
जहाँ किसी को सहायता की आवश्यकता होती, वह सबसे पहले आगे बढ़कर मदद करता।वरदान जब अपने साथ के लड़कों के साथ खेलने जाता, तो वे सब कंचे खेलते थे। पर वरदान के पास साधारण कंचे नहीं थे।
उसके पास वही दो मणियाँ थीं, जो उसे उस उफनती नदी की धारा से मिली थीं। वह उन्हें ही अपने कंचों की तरह इस्तेमाल करता और अपने साथियों के साथ खेलता।
जब भी वे बच्चे कंचे खेलते, वरदान अपनी दोनों मणियों को जमीन पर लुढ़काता और बड़ी कुशलता से निशाना लगाता। उसकी चाल इतनी सटीक होती कि दूसरे लड़के अक्सर हार जाते और हँसते हुए कहते—
“अरे, वरदान तो हमेशा जीत जाता है!”
लेकिन उन बच्चों को क्या पता था कि वे साधारण कंचे नहीं, बल्कि अद्भुत मणियाँ हैं।
दिन भर खेलने के बाद जब रात होती, तो वही मणियाँ अपने आप हल्की-हल्की रोशनी से चमकने लगतीं।
उनकी चमक इतनी उजली होती कि छोटी-सी झोपड़ी में दीपक जलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। पूरी झोपड़ी उनकी रोशनी से जगमगा उठती।
छोटी रानी और वरदान को यह समझ नहीं आता था कि यह कैसी मणियाँ हैं।
उनके लिए तो वे बस उनकी रोज़मर्रा की चीज़ बन चुकी थीं—
दिन में उन्हीं से कंचे खेले जाते,
और रात में वही मणियाँ उनके छोटे से घर को रोशन कर देतीं।