“सफ़र अक्सर हमें मंजिलों से नहीं, सवालों से मिलाते हैं। ट्रेन की ऊपरी बर्थ पर बैठा वह ग्यारह साल का बच्चा, जो अभी ठीक से दुनिया को समझना शुरू भी नहीं कर पाया था, उसके पास ‘जाति’ और ‘भौकाल’ जैसे शब्दों का होना समाज की किस सच्चाई की ओर इशारा करता है? पेश है मेरे ताज़ा सफ़र के अनुभवों से उपजी एक छोटी सी कहानी -14235: जिज्ञासा और जाति।”
“कृपया ध्यान दीजिए – अयोध्या, सुल्तानपुर के रास्ते प्रयागराज संगम की ओर जाने वाली गाड़ी संख्या ‘14235’ प्लेटफॉर्म नंबर ‘तीन’ पर आ चुकी है।”
मैं इसी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था। गाड़ी के आते ही मन में सबसे पहला विचार एक सुरक्षित सीट का आता है – कि किसी तरह वह मिल जाए, तो मानो अंदर से आवाज़ आती है, “आपकी यात्रा मंगलमय हो”; असल में इस शुभकामना का असली अर्थ यही होता है।
गाड़ी जैसे ही रुकी, मेरी निगाहें अपने भारी शरीर को ‘स्थापित’ करने के लिए उचित जगह खोजने लगीं। लेकिन जैसा अक्सर होता है, सीट आसानी से मिलती नहीं; और मिल भी जाए, तो उसमें आपका शरीर पूरी तरह समा जाए, यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है।
जैसे-तैसे ऊपर की बर्थ मिली और मैंने खुद को वहाँ टिका दिया। तभी बगल में देखा, तो एक ग्यारह साल का लड़का मुझे ही देख रहा था। शायद वह सोच रहा होगा कि उसके एकांत और आराम में इस आदमी ने कैसे दखल दे दिया।
“वह मुझे एकटक देख रहा था और बीच-बीच में मेरी भी नज़रें उससे टकरा जातीं। मैं मन ही मन सोच रहा था कि काश यह कुछ बोले, तो दोस्ती की कोई गुंजाइश बने।
मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा, ‘आप कहाँ जा रहे हो?’
वह कुछ देर शांत रहा, फिर बड़ी सहजता से बोला, ‘मथुरा।’
मैं थोड़ा ठिठका और पूछा, ‘लेकिन यह ट्रेन तो मथुरा नहीं जाती!’
उसने जवाब दिया, ‘हम लखनऊ में उतर जाएँगे।’
मेरा कौतूहल और बढ़ गया, ‘पर यह गाड़ी तो लखनऊ भी नहीं जाती है।’
उसने बड़ी मासूमियत से उत्तर दिया, ‘हमें नहीं पता… जहाँ पापा बोलेंगे, वहीं उतर जाएँगे।’
उसके इस जवाब के बाद माहौल में एक सन्नाटा पसर गया। मैंने भी ज़्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा कि कहीं वह नाराज़ न हो जाए। कुछ समय बाद सन्नाटा उसी ने तोड़ा, ‘आपका नाम क्या है?’
मैंने कहा, ‘कपिल! और आपका?’
उसने बताया, ‘माधव! लेकिन स्कूल में मुझे दोस्त “पप्पू” बुलाते हैं। आपको पता है, मेरे स्कूल में सभी का एक दूसरा नाम है – एक चिक्कू है, एक दम्मू है… ऐसे बहुत से दोस्त हैं जिनका नाम हमने अलग से रखा हुआ है।'”
मैंने पूछा, “आप किस कक्षा में हो?”
माधव चहककर बोला, “पाँचवीं पास कर ली है, अब छठी में जाऊँगा।”
मैंने अगला सवाल किया, “पाँचवीं में कौन-कौन से विषय (Subjects) थे?” यह पूछते ही मुझे एहसास हुआ कि शायद मैंने गलती कर दी; चलती ट्रेन में कोई बच्चा पढ़ाई की बातें कहाँ करना चाहता है!
माधव ने कंधे उचकाए और कहा, “याद नहीं है।”
थोड़ी देर के मौन के बाद माधव ने अचानक पूछा, “आपकी जाति क्या है?”
यह सुनकर मैं सन्न रह गया। ऐसा लगा मानो मेरे मस्तिष्क को किसी ने मज़बूती से दबोच लिया हो। इस सवाल का क्या और कैसे जवाब दूँ, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक लंबी साँस खींचकर मैंने प्रतिप्रश्न किया – “आप मेरी जाति जानकर क्या करोगे माधव?”
उसने बिना सोचे पट से जवाब दिया, “मैं तो बस पूछ लेता हूँ।”
मैंने फिर पूछा, “पर यह क्यों ज़रूरी है?”
वह शांत हो गया। मैं सोचने लगा कि ग्यारह साल के एक बच्चे के भीतर समाज ने यह ‘जाति’ नामक वायरस कब और कैसे बो दिया? इस उम्र में, जहाँ उसका रुझान खेल, खिलौनों, कौतुक और तर्क की तरफ होना चाहिए था, वहाँ वह खुद को और दूसरों को जाति के संकीर्ण दायरे में खोज रहा था।
माधव ने पूछा, “क्या आप ‘फ्री फायर’ खेलते हो?”
मैंने कहा, “नहीं।”
“मैं तो खेलता हूँ,” माधव उत्साह से बोला।
“इसमें क्या होता है?” मैंने जिज्ञासा जताई।
“इसमें लीड (Level/Lead) लेनी होती है। मेरे पास बहुत बड़ी लीड है! और इसमें खूब मार-धाड़ भी होती है।”
मैंने सवाल किया, “पर क्या यह सच में संभव है? क्या तुम इसे मोबाइल के बाहर भी कर सकते हो?”
माधव ठिठका और बोला, “नहीं।”
“फिर ऐसे खेल का क्या फायदा?” मेरे इस सवाल पर उसने तपाक से जवाब दिया, “जिसकी जितनी बड़ी लीड होती है, उसका उतना ही ‘दबदबा’ होता है।”
मैंने फिर कुरेदा, “दबदबा का क्या मतलब होता है?”
माधव तुरंत बोला, “भौकाल!”
मैंने मन बना लिया था कि माधव को जिज्ञासा से भर दूँ। कम से कम वह यह तो सोचे कि जिन शब्दों को वह इतनी आसानी से अपने जीवन में स्थान दे रहा है, क्या उसे उनका सही अर्थ भी पता है? मैं चाहता था कि वह घर जाकर अपने बड़ों से इनके मायने पूछे। मेरा मकसद बस इतना था कि बच्चे के भीतर की जिज्ञासा कभी मरे नहीं और वह बिना जाने-समझे किसी भी विचार को स्वीकार न करे। इसलिए, मैं अक्सर उसके उत्तरों से ही नए प्रश्न बुन लेता था।
मैंने फिर पूछा, “पर माधव, यह भौकाल बनाना क्यों है?”
वह तेज़ी से हँसा और बोला, “भैया, आप भी न…!”
मेरे प्रश्नों का उसके पास कोई ठोस उत्तर नहीं था, लेकिन अब उसके भीतर जिज्ञासा जाग चुकी थी। उसकी पहली निर्मल जिज्ञासा फूटकर बाहर आई, “भैया, आप किस चीज़ की पढ़ाई करते हो?”
मैंने बताया, “मैंने अभी अपना ‘एम.ए.’ (M.A.) पूरा किया है।”
माधव ने तसल्ली से कहा, “ठीक है भैया!”
धीरे-धीरे ट्रेन की ठंडी हवा और पटरियों की लय उसे नींद की गोद में ले गई। वह तो सो गया, लेकिन मुझे विचारों के एक अंतहीन जाल में छोड़ गया – कि इस मासूम और सरल बच्चे को किसी अजनबी से बात करने से पहले उसकी ‘जाति’ पूछना आखिर किसने और किस प्रयोजन से सिखाया होगा?
~ कपिल तिवारी ”यथार्थ”