यह चांदनी है।
सुबह का समय था। गंगा के किनारे, ऋषिकेश में मैं कुछ पढ़ रहा था। तभी सामने से एक आवाज़ आई, "भैया, 'बोहनी' करा दो न।"
मैंने जैसे ही सर उठाया, सामने देखा तो एक छोटी लड़की हाथों में फूल लिए खड़ी थी। मैंने कहा, "मेरे पास अभी रुपए नहीं हैं।"
वह थोड़ी देर खड़ी रही और मेरी किताब की तरफ देखती रही। यह देखकर मैंने पूछा, "क्या आप स्कूल जाती हो?"
उसने हँसकर जवाब दिया, "हाँ भैया।"
"किस कक्षा में हो?" मैंने पूछा।
"भैया, थ्री (3)!"
मैंने धीरे से बात आगे बढ़ाई और पूछा, "आपका नाम क्या है?"
"भैया, चांदनी।"
"आप आज स्कूल क्यों नहीं गईं?" मैंने पूछा।
"भैया, एक दिन छोड़ कर जाती हूँ न," चेहरे पर एक मासूम मुस्कान के साथ चांदनी बोली।
मैंने पूछा, "ऐसा क्यों?"
चांदनी मेरे बगल में बैठ गई। अपने फूलों की डलिया को थोड़ा दूर रखकर बोली, "भैया, पापा काम पर जाते हैं, मम्मी घर का काम करती हैं। बड़े भैया और दीदी आज स्कूल गए हैं, इसीलिए फूल बेचने की ज़िम्मेदारी आज मेरी है।" वह थोड़ा रुकी, फिर कुछ सोचकर बोली, "कल मैं स्कूल जाऊँगी, तो दीदी फूल बेचने आएगी।"
मैं उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसकी बातें सुनने के साथ-साथ कई सवाल मेरे मन में अपना स्थान बनाते जा रहे थे। मैं सोच रहा था कि यह कैसी विडंबना है! हमारा समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारे मन की स्थिति ऐसी क्यों है कि हम यह सब होने देते हैं?
मैं यही सोच ही रहा था कि उसने पूछा, "भैया, आप किस कक्षा में हो?"
मैंने पहले कहा, "मैंने अभी एम.ए. पास किया है।"
यह बात उसे समझ नहीं आई—और आती भी कैसे? इतनी छोटी उम्र में उसे यह सब जानने की ज़रूरत भी नहीं थी।
फिर चांदनी ने पूछा, "ऐसे बताओ न भैया कि एक, दो, तीन, चार... ऐसे कौन-सी कक्षा में हो?"
मैंने कहा, "चांदनी, एक, दो, तीन... ऐसे ही बारह तक होता है। फिर तीन साल की और कक्षा होती है।"
इतने में वह तपाक से बोली, "भैया, तेरह, चौदह, पंद्रह!"
मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था, सिवाय एक हँसी के।
तभी उसने मेरी कॉप़ी उठाई और बोली, "भैया, मैं कला (ड्राइंग) अच्छी बनाती हूँ, बनाऊँ?"
मैंने कहा, "बिल्कुल!"
और फिर वह एक पेज, फिर एक और पेज, और फिर आगे भी... बस चित्र बनाती रही।
उस समय चांदनी फूल बेचना बिल्कुल भूल गई थी।
यह सिर्फ कहानी नहीं हैं यह हमारे समाज की उस कड़वी विडंबना को उजागर करती है जहाँ कहने को गरीबी (नियत की बात है कि हम वास्तव में है या बने रहना चाहते हैं)और मजबूरियों (ऐसी कौन सी मजबूरी है कि पढ़ाई को विकल्प बना लिया जाए) के कारण मासूम बच्चों का बचपन समय से पहले ही खत्म कर दिया जाए?
शिक्षा के प्रति चांदनी की ललक स्पष्ट दिखती हैं , कॉपी मिलते ही उसका फूल बेचना भूलकर चित्र बनाने में डूब जाना यह आसान नहीं है।
उच्च शिक्षा की डिग्रियों और बुनियादी शिक्षा के लिए जूझते इन बच्चों के बीच का यह विरोधाभास हमें आत्ममंथन करने पर मजबूर करता है कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम अपनी भावी पीढ़ी को समान अधिकार और सुरक्षित बचपन देने में कहाँ चूक रहे हैं।
ये भंभीर विषय है कि हम अपनी पीढी को या अपने बच्चों को कैसा भविष्य दे रहे हैं? हमारी मानसिक स्थिति कैसी हैं? हमारी सामाजिक संरचना कैसी हैं? हमारी शिक्षा व्यवस्था कैसी हैं?
इन प्रश्नों पर हमें पुनः विचार और समाधान खोजना होगा।