Vows and Fasting in Hindi Spiritual Stories by Kapil Tiwari books and stories PDF | व्रत और उपवास

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व्रत और उपवास

“व्रत” और “उपवास” ये शब्द आपने कई बार सुने होगे क्या आप इनका वास्तविक अर्थ जानते है?

 व्रत का अर्थ है “संकल्प ” जो हमेशा मन से निकलता है। और मन क्या है ?अभी अहम का घर है आज कल के लोगो ने व्रत को भी मनोरंजन बना लिया है, लोग किसी एक विशेष दिन को महत्वपूर्ण मान कर जो प्रतिदिन खाना खाते हैं वो खाना उस दिन नहीं खाते हैं। उस दिन कुछ विशेष खाने के लिए बनता हैं या लाया जाता हैं और मजे के साथ खाया जाता हैं। तो व्रत को हमने एक दिन कुछ अच्छी चीजें खाने का दिन बना दिया है।
आप खुद सोचो कि हम बड़े नियोजित तरीके से एक दिन खाना का त्याग करते हैं और हम उस दिन क्या खायेंगे ये भी हम ही तय करेंगे। तो उसमें आध्यात्मिक ऊंचाई हैं ही कहा? खाना खाने और छोड़ने का प्रयोजन मात्र है।
अहंकार के चुनाव से अहंकार कम नही हो सकता क्योंकि आप जानते ही हो अहम वो चालक, ताकतवर, और होशियार है जो पहले अपने अनुसार आचरण चुनता है फिर उस पर चलता है, और खुद को श्रेष्ठ घोषित कर देता है । इसी लिए अष्टवक्र गीता में लिखा है की आप अव्रतीय हो जाओ मतलब ऐसा व्रत लो ही मत ।

अव्रतीय ये लाभप्रद होगा , शास्त्र कहते है उपवास करो व्रत नहीं।

लेकिन समाज ने व्रत और उपवास का वास्तविक अर्थ समझा ही नहीं हैं। तभी कुछ जानकार लोगो ने इसे समझाने के लिए , व्रत को त्याग से जोड़ा और उन्होंने बोला कि जो लोग भी जब भी व्रत रहें हर एक व्रत में अपनी एक बुरी चीज , बुरी आदत का त्याग करें और धीरे धीरे सच्चाई की ओर बढ़े , तब संभावना है की मन एक दिन शांत अवस्था तक पहुंच जाए।
व्रत का खाने पीने से कोई सम्बंध नहीं है बुरी चीज छोड़ने से है क्योंकि ऐसा करने में मन को चुनौती मिलती हैं और बेहतर होने की संभावना भी मिलती हैं।

     “उपवास”

उपवास शब्द उपनिषद् से निकल कर आया है जिसका वास्तविक अर्थ हैं। उप + वास (उप का अर्थ होता है ” समीप”)(वास का अर्थ है “रहना”)
जैसे उपनिषद् का अर्थ होता है (गुरु के समीप बैठना)

तो उपवास का अर्थ है अपने पास रहना ,खुद के और क़रीब बैठना , अपने केंद्र पर उपस्थित होना, अपना अवलोकन करना।
अपने मन को सच्चाई, शांति की ओर ले जाना,अपने मन को खुद के करीब रखना, सही कहे तो खुद के करीब रहना ही सच्चा उपवास होता है , मन को शांत रखना या निरंतर प्रयास करना ही उपवास का वास्तविक अर्थ है।
खाना न खाना किसी एक विशेष दिन उपवास रखना ये सब शारीरिक विज्ञान के लिए तो ठीक हैं लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसकी कोई उपयोगिता नहीं हैं।

     इसे ऐसे भी समझा जा सकता हैं, उपवास अक्सर अहंकार का ही एक नया चोला है—बस अपनी आदतों की लिस्ट बदल लेना। कोई खाने से चिपका है, तो कोई न खाने के संकल्प से। दोनों एक ही धरातल पर खड़े हैं और दोनों ही अपने 'होने' के भाव (ego) को पुष्ट कर रहे हैं, बस तरीके अलग हैं।
          त्याग का गणित बड़ा सीधा है: जब तक 'त्याग करने वाला' मौजूद है, तब तक कुछ भी त्यागा नहीं गया। मोक्ष की चाह में भूखा रहने वाला भिक्षु और धन की चाह में दौड़ता व्यापारी, दोनों की बुनियादी स्थिति एक ही है। दोनों बाहर किसी चीज़ को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
भीतर का बदलाव शरीर को कष्ट देने से नहीं, बल्कि अहंकार के झूठ को पकड़ने से आता है। जब आप अपने भीतर के खेल और दिखावे को सीधे देख लेते हैं, तब जाकर चेतना का स्तर ऊँचा उठता है।
सच्चाई यह है कि उपवास आपको खुद की नज़रों में 'महान' महसूस करा सकता है, लेकिन यह आपके अहंकार को खत्म नहीं करता, बल्कि उसे और पोषण देता है। असली क्रांति उपवास में नहीं, बल्कि अपने ही झूठ को पहचान लेने के बोध में है।

                                                          ~  यथार्थ