Mera Pyar - 19 in Hindi Love Stories by mamta books and stories PDF | मेरा प्यार - 19

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मेरा प्यार - 19


​​एपिसोड 19  ज़ोया का डर और शोहर का साया

​ज़ोया की आँखें धीरे से खुलीं। कमरे के बाहर से आ रही भारी जूतों की आवाज़ और कमांडोज़ की गूँज ने उसे बेचैन कर दिया। वह कमज़ोर थी, पर उसका दिल अज़ीम के लिए धड़क रहा था।
​ज़ोया की घबराहट:
"अज़ीम... ज़ारा आपा..." ज़ोया ने लड़खड़ाती आवाज़ में पुकारा। उसे लगा कि शायद उसके पिता ने अज़ीम को धक्के मारकर बाहर निकाल दिया है। वह बेड से उठने की कोशिश करने लगी, उसकी साँसें तेज़ हो गईं। "कोई है? क्या हुआ है बाहर? अज़ीम कहाँ है?"
​उसी वक्त दरवाज़ा खुला और ज़ारा अंदर दाखिल हुई। ज़ारा के चेहरे पर अभी भी उस थप्पड़ का निशान था, लेकिन उसकी आँखों में अब एक अजीब सा सुकून और ताकत थी।
​ज़ारा का सांत्वना देना:
"ज़ोया, शांत हो जाओ। कुछ नहीं हुआ," ज़ारा ने उसे थामते हुए कहा।
​"आपा, बाहर इतना शोर क्यों है? और आपके चेहरे पर यह क्या है? क्या डैड ने अज़ीम के साथ कुछ किया? उन्हें यहाँ से निकाल दिया क्या?" ज़ोया की आँखों में आँसू आ गए। "अगर उन्हें कुछ हुआ तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।"
​शोहर की एंट्री और ज़ोया की हैरानी:
तभी कमरे के दरवाज़े पर एक साया उभरा। लंबा कद, आँखों पर काला चश्मा और एक ऐसी शख्सियत जिससे पूरा कमरा जैसे भर गया। वह शोहर अख्तर था।
​ज़ोया उसे देखकर दंग रह गई। "जीजू? आप... आप यहाँ इंडिया में? इस वक्त?"
​शोहर ने एक फीकी मुस्कान के साथ ज़ोया के सिर पर हाथ रखा। "मैं अपनी छोटी साली साहिबा को देखने आया हूँ। और अज़ीम... वह कहीं नहीं गया है। वह यहीं है, सुरक्षित है। अब इस अस्पताल में मेरी मर्ज़ी के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता, तुम्हारे डैड तो बहुत दूर की बात हैं।"
​अज़ीम की वापसी:
शोहर के इशारे पर अज़ीम कमरे के अंदर आया। उसे सही-सलामत देखकर ज़ोया की जान में जान आई। लेकिन ज़ोया ने देखा कि अज़ीम अब अकेला नहीं था, शोहर के दो सबसे खास गार्ड्स उसके पीछे साये की तरह खड़े थे।
​शोहर ने अज़ीम की तरफ देखा और फिर ज़ारा से कहा, "ज़ारा, इस लड़के ने जो किया है, उसका कर्ज मैं उतारूँगा। मिस्टर खन्ना ने इसे ज़लील करने की कोशिश की थी, अब मैं इसे वो मुकाम दूँगा कि मिस्टर खन्ना इसके सामने हाथ जोड़कर खड़े होंगे।"
​अज़ीम चुपचाप ज़ोया की तरफ देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक पल में दुनिया इतनी कैसे बदल गई—जहाँ अभी उसे ज़लील किया जा रहा था, वहीं अब दुनिया का सबसे बड़ा बिज़नेस टायकून उसके साथ खड़ा था।


​​ बिखरते रिश्ते और शोहर का इंतकाम


​अस्पताल के उस कमरे में जहाँ अभी सुकून होना चाहिए था, वहाँ नफरत की दीवारें खड़ी हो गई थीं। ज़ोया होश में तो थी, पर बाहर की हलचल और ज़ारा के चेहरे पर उँगलियों के निशान देखकर उसका दिल दहल गया।
​मिस्टर खन्ना का आखिरी प्रहार:
मिस्टर खन्ना कमरे के दरवाज़े पर खड़े थे, उनके चेहरे पर पछतावा नहीं, बल्कि अभी भी वही पुराना अहंकार था। उन्होंने शोहर अख्तर को देखकर ठिठकने के बजाय अपनी आवाज़ और ऊँची की।
​"ज़ारा! यह सब क्या तमाशा है? तुम अपने इस शोहर को यहाँ ले आई ताकि अपने पिता को नीचा दिखा सको? और यह लड़का (अज़ीम)... इसे अभी भी यहीं रखा हुआ है?" मिस्टर खन्ना चिल्लाए।
​ज़ारा का कड़ा जवाब:
ज़ारा अपनी जगह से हिली तक नहीं। उसने अपनी सूजी हुई आँखों से अपने पिता को देखा। "मैंने आपको मौका दिया था डैड। लेकिन आपने उस मौके को एक थप्पड़ में बदल दिया। अब आप मेरे पिता नहीं, सिर्फ एक बिज़नेस राइवल (प्रतिद्वंद्वी) हैं।"
​शोहर अख्तर का दखल:
शोहर, जो अब तक खामोशी से सब देख रहा था, आगे बढ़ा। उसने अपनी सिगार बुझाई और मिस्टर खन्ना के बिल्कुल करीब जाकर खड़ा हो गया। उसकी लंबाई और उसका रसूख मिस्टर खन्ना को छोटा महसूस करा रहा था।
​"मिस्टर खन्ना," शोहर की आवाज़ धीमी पर जानलेवा थी। "आपने अपनी रईसी के नशे में मेरी पत्नी पर हाथ उठाया है। आपने सोचा था कि आप इस शहर के राजा हैं? अब देखिए, मैं आपके इस तख्त को कैसे जलाता हूँ।"
​जब 'अख्तर साम्राज्य' बीच में आया
​शोहर ने अपने पीए (PA) की तरफ इशारा किया। अगले ही पल, अस्पताल के टीवी स्क्रीन्स और मिस्टर खन्ना के फोन पर न्यूज़ फ्लैश होने लगी।
​ब्रेकिंग न्यूज़: खन्ना ग्रुप के खिलाफ इंटरनेशनल फ्रॉड की जाँच शुरू।
​अपडेट: अख्तर इंडस्ट्रीज ने खन्ना ग्रुप के 51% शेयर्स रातों-रात खरीद लिए।
​घोषणा: मिस्टर खन्ना अब अपनी ही कंपनी के मालिक नहीं रहे।
​मिस्टर खन्ना के हाथ से उनका फोन गिर गया। "यह... यह नामुमकिन है! तुम ऐसा नहीं कर सकते!"
​शोहर का फैसला:
​"मैं सब कुछ कर सकता हूँ। और रही बात अज़ीम की... तो अज़ीम अब से 'अख्तर ग्रुप' का नया प्रोजेक्ट हेड है। वह प्रोजेक्ट, जो आपकी पुरानी उजड़ी हुई दुकान की जगह पर एक आलीशान 'सुकून सेंटर' बनाएगा। अब आप अपनी उस खाली तिजोरी को देखिये, जिसमें अब सिर्फ धूल बची है।"

​ज़ोया का आंसू और अंत
​ज़ोया ने अज़ीम का हाथ पकड़ लिया। उसने देखा कि अज़ीम अभी भी शांत था। उसे न दौलत की खुशी थी, न मिस्टर खन्ना की बर्बादी का जश्न। उसे सिर्फ ज़ोया के ठीक होने की फिक्र थी।
​मिस्टर खन्ना को गार्ड्स ने बाहर निकाल दिया। वह अस्पताल के गलियारे में अकेले खड़े थे—बिना दौलत के, बिना परिवार के, और बिना साख के।

​​दो साम्राज्यों का टकराव — अख्तर बनाम खन्ना



​अस्पताल का गलियारा अब एक युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। अख्तर ने अपनी सिगार का धुआँ मिस्टर खन्ना के चेहरे की तरफ छोड़ा और बेहद ठंडी मुस्कान के साथ उनके और करीब आ गया।
​अख्तर: "मिस्टर खन्ना, आप अपनी जिस दौलत और महल पर इतना गुमान कर रहे हैं न, उतना तो मैं हर साल चैरिटी में बाँट देता हूँ। आपने सोचा कि ज़ारा यहाँ अकेली है तो आप उस पर हाथ उठा लेंगे? आपने सिर्फ अपनी बेटी को नहीं मारा, आपने अख्तर की रूह को जख्मी किया है।"
​मिस्टर खन्ना: "वह मेरी बेटी है अख्तर! उसे अनुशासन सिखाना मेरा हक है। वह एक मामूली दुकानदार के लिए खानदान की साख मिट्टी में मिला रही थी।"
​अख्तर: (तेज़ और कड़वाहट भरी हँसी हँसते हुए) "साख? आपकी साख उस कांच के घर जैसी है जिसे मैंने एक ही झटके में तोड़ दिया है। अब सुनिए कि ज़ारा मेरे महल में कैसे रहती है... मेरे लंदन वाले घर में ज़ारा के कदम ज़मीन पर तब तक नहीं पड़ते जब तक वहां मखमल न बिछा हो। उसे एक छींक भी आ जाए, तो शहर के सबसे बड़े डॉक्टर्स की टीम हाथ जोड़कर खड़ी रहती है। मैंने उसे कभी ऊँची आवाज़ में 'तू' तक नहीं कहा, क्योंकि वह मेरे लिए इस दुनिया की सबसे कीमती और नायाब हस्ती है। मैंने उसे हमेशा पलकों पर बिठाकर रखा है।"
​मिस्टर खन्ना: "तुम उसे बिगाड़ रहे हो..."
​अख्तर: (बेहद धीमी और भारी आवाज़ में) "मैंने उसे संवारा है, बिगाड़ा नहीं। जिस ज़ारा को आपने यहाँ एक कमरे में बंद करने की कोशिश की, मेरे घर में उस पूरे साम्राज्य की चाबियाँ उसके पास रहती हैं। वह हुक्म देती है और आधी दुनिया का बाज़ार रुक जाता है। और आपने... आपने उस मासूम चेहरे पर हाथ उठाया जिसे मैं दुनिया की हर तकलीफ से बचाकर रखता हूँ?"
​महल की हकीकत और खन्ना का पतन
​अख्तर ने अपनी नज़रों से मिस्टर खन्ना को जैसे भस्म कर दिया।
​अख्तर: "मेरे महल में ज़ारा कैद नहीं है, वह वहां की मलिका है। उसे वहां किसी अज़ीम की तलाश नहीं करनी पड़ती क्योंकि मैं उसे वो वक्त और वो इज्जत देता हूँ जिसका उसे हक है। आपने उसे बाप का प्यार और सम्मान नहीं दिया, इसलिए वह आज इस अज़ीम में वो सुकून ढूँढ रही थी जो उसे अपनों से नहीं मिला। गलती अज़ीम की नहीं, आपके उस पत्थर दिल की है जिसे सिर्फ़ नोटों की गिनती आती है।"
​मिस्टर खन्ना चुप थे, उनके पास अब कोई जवाब नहीं बचा था।
​अख्तर: "आज आपने उस पर हाथ उठाया है, कल आप अपनी इस हवेली की छत के लिए तरसेंगे। मैंने आपका बैंक बैलेंस नहीं, आपका वजूद खरीद लिया है। अब जाइये यहाँ से, इससे पहले कि मेरा सब्र जवाब दे जाए और मैं भूल जाऊँ कि आप कभी ज़ारा के पिता कहलाते थे।"