dirty in Hindi Women Focused by कमल चोपड़ा books and stories PDF | गन्दे

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गन्दे

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कमल चोपड़ा

   अपने वक्त से कुछ पहले ही काम पर चली आयी थी मीना। आमतौर पर इस वक्त तक वे लोग सोये होते थे और वह आकर कॉलबैल बजाकर जगाती थी उन्हें, पर आज कोठी का दरवाजा खुला था। मालकिन खुद झाड़ू लेकर फर्श की धुलाई में जुटी हुई थी। पानी बहकर बाहर तक आया हुआ था। उसने अन्दर घुसते हुए हैरानी जताई, "बीबीजी! आज क्या बात है? खैर तो है..."​उसे देखते ही मालकिन चिल्ला पड़ी, "खैर  तो नहीं है...लेकिन तू? अन्दर मत आइयो...अन्दर मत आइयो!"​"क्या हुआ है?"​"तुझे नहीं पता? बड़ी भोली है ना? झूठी मक्कार, धोखेबाज, गन्दी कहीं की, ऐसी लगती तो नहीं थी तू...? पर तू तो बाहर ही रहा। गेट के पास बैठ जा...काम निपटाकर बात करती हूँ तुझसे..."​ऊँचाई से एकाएक गिरकर बहुत नाजुक-से किसी सहारे से घाटी में लटक गयी थी वह—बीबीजी को क्या हो गया है एकाएक?​बड़बड़ाती हुई मालकिन उधर अपने काम में जुट गयी थी—ऐसी लगती तो नहीं थी हरामखोर लेकिन...​कल जबसे मालकिन को मीना की असलियत के बारे में पता चला था तो तब से मालकिन को लगने लगा था—जैसे वह घरभर में चल रहे गन्दे विषाणुओं की आँधी से घिर गयी है।​उनका सारा तप, विश्वास, नियम और पवित्रता सब भ्रष्ट हो गये हैं। अनजाने में उससे कोई बहुत बड़ा पाप करवा दिया गया है। अब वह नरक की भागीदार होगी। उसे लगने लगा था उसका सारा घर अपवित्र हो गया है।​हरएक वो चीज जिसे पिछले दिनों किसी-न-किसी रूप में मीना ने छुआ था, कल तक वो उसे ठीक-ठाक लग रही थीं लेकिन आज उसे वही चीजें बेहद गन्दी, अपवित्र, घृणित और कीटाणुओं से लथपथ लग रही थीं।​​एक दिन योंही अचानक मीना किसी पुरानी बाई के बताए अनुसार उनके यहाँ काम माँगने चली आयी थी और उन्होंने उसे रख लिया था। चौका-बर्तन और कपड़े साफ करने का काम वह ऐसे मन लगाकर करती कि शायद कोई अपना भी काम इतनी लगन और मेहनत से न करता।​दो वर्षों में वह इस घर की सदस्य जैसी बन गयी थी। जहाँगीरपुरी की झुग्गियाँ जहाँ मीना रहती थी यहाँ से काफी दूर थीं लेकिन वह अपने काम पर ठीक वक्त पर चली आती थी। उसने मालकिन को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था। मालकिन भी कभी उसके साथ मालकिन की तरह पेश नहीं आयी थी। कभी उसे महसूस ही नहीं होने दिया था कि वह नौकरानी है और वह मालकिन...!​हैरान थी मालकिन कि पहले वह मीना को पहचान क्यों नहीं पाई? ऐसी औरत होगी उसने सोचा तक नहीं था? भनक तक नहीं लगने दी थी उस चालाक, धोखेबाज, गन्दी और नीच औरत ने...?​कल शाम से मालकिन कितनी ही बार अपने घर को बुहारने-धोने के बाद कितनी ही अगरबत्तियाँ जला चुकी थी।​मालकिन काम में जुटी हुई है और वह बैठी है? बहुत अजीब लग रहा था मीना को, उसे समझ नहीं आ रहा था आखिर बात क्या हुई है? उससे ऐसा क्या अपराध हो गया है?​काफी देर इन्तजार करने के बाद मीना उठ खड़ी हुई—इस तरह क्यों पेश आ रही है मालकिन? पूछूँ तो सही? बात क्या है?​मालकिन ड्राइंगरूम में कपड़े से अपने हाथ पोंछ रही थी। उसे अन्दर आता हुआ देखकर बिदकने लगी, "बस-बस दरवाजे के पास ही रह...मुझे तेरा पहले से पता होता कि तू ऐसी औरत है, तो मैं तुझे अपने घर में घुसने भी न देती..."​"ऐसी औरत? क्या मतलब?"​"जब तू काम खत्म करके यहाँ से जा रही थी उस वक्त यहाँ एक बर्तन बेचनेवाली आयी बैठी थी ना?"​"हाँ हाँ, मैं जानती हूँ उसको। हमारी ही झुग्गी-बस्ती में रहती है। पुराने कपड़े लेकर बर्तन-वर्तन देती है।"​"उसीने बताया मुझे तेरे बारे में...।"​"क्या...?"​"बड़ी भोली बन रही है? जैसे सच में ही तू पाक-साफ है? सब पता चल गया है मुझे।"​"हमारे यहाँ आने से पहले गुण्डे उठाकर ले गये थे तुझे और उन्होंने तेरे साथ बलात्...तेरे साथ गन्दा काम किया उन्होंने। दस-दस जनों ने मुँह काला किया तेरे साथ?"​काँपकर रह गयी वह। आसमान टूटकर एकाएक उसके ऊपर आन पड़ा। अपने हाथों से मुँह छुपाकर नीचे फर्श पर बैठ गयी थी वह। एकाएक लगे आघात को ना झेल पाकर रुलाई फूट पड़ी उसकी। उस बर्तनवाली औरत की मुझसे क्या दुश्मनी थी? मेरे खिलाफ यहाँ बोलने का उसे क्या फायदा? इस घर में आकर लगने लगा था कि धीरे-धीरे मैं उस हादसे को भूल जाऊँगी पर...? उस औरत ने मेरी पिछली जिन्दगी खोलकर... औरतें ही औरतों के खिलाफ जाकर क्या हासिल कर लेती हैं?​अपना मुँह छुपाकर रोते हुए देखकर उस पर तरस खाने की बजाय मालकिन और भड़क उठी, "ये तिरिया चरितर किसी और को जाके दिखाइयो... एक-ना-एक दिन सच तो सामने आना ही था! असलियत खुल गयी तो रोना आ रहा है? ये भी पता चला है मुझे कि तेरा नाम मीना नहीं... अमीना-शमीना कुछ है? हमारे घर में तो प्याज, लहसुन तक नहीं आता और तू?"​एकाएक बिफर उठी, "कौन कहता है मैं मुसलमान हूँ... ये भी उसी बर्तनवाली ने कहा होगा। अच्छा हाँ... एक बार वो मेरे पास बैठी थी। मेरी मामी मुझे मिलने आयी। मैंने मामी को उससे मिलवाया—ये सईदा है मेरी मामी। उसने सोचा होगा मुसलमान के रिश्तेदार भी मुसलमान ही होंगे। अब मेरे मामा ने मुसलमान औरत से शादी कर ली तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कैसे मुसलमान हो गयी? मैं हिन्दू माँ-बाप की औलाद हूँ..."​मालकिन के माथे पर क्रोध, हिकारत और अविश्वास के बल कम नहीं हुए थे—और वो जो बात छुपाई तूने कि तेरे साथ दस-दस जनों ने गन्दा काम...​जवाब में चीख पड़ना चाहती थी मीना। कोशिश करके उसने उस चीख को अपने अन्दर रोका।​हालाँकि अपमान, घृणा और आरोपों की नुकीली बर्छियों ने न जाने कितनी बार घायल किया था उसे, पर आज... कुछ भर आये जख्मों के खुरंडों को किसी ने पहले से भी नुकीली बर्चियाँ फिर से गड़ा दी थीं। तड़फड़ाकर रह गयी थी वह। कोशिश के बावजूद शब्द नहीं फूट पा रहे थे उसके मुँह से।​उसे सिर झुकाए खड़ा देखकर मालकिन फिर कड़की, "कह दे... ये भी झूठ है कि तेरे साथ गन्दा काम...?"​चीख उठी वह, लेकिन आवाज बाहर नहीं आयी थी, "हुआ था..." बड़ी​कठिनाई हुई थी उसे यह कहने में। यह सुनकर एक कदम पीछे हट गयी थी मालकिन, जैसे बहुत गलीज संक्रामक घिनौने गुप्तरोगी किसी जीव को अपने सामने खड़ा देख लिया हो।​फिर उसने वे ही प्रश्न दोहराए थे जो उसने अपने सगे माँ-बाप और भाई के अलावा भी कई जनों के आगे रखे थे और उत्तर में वे लोग सख्त और सूखे पत्थरों की तरह ही बने रहे थे—मेरे साथ जो हुआ उसमें मेरा क्या कसूर है? मेरे साथ तो उल्टा जुल्म हुआ है? मेरे साथ किसी को सहानुभूति क्यों नहीं? मुझे ही दोषी क्यों माना जा रहा है? मेरे साथ नफरत क्यों कर रहे हैं? जोर-जबरदस्ती के बाद मैं क्या कुछ और हो गयी हूँ? बड़ी-बड़ी दुर्घटनाओं में दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों से तो इतनी नफरत नहीं करते लोग? वो गन्द जो उस दुर्घटना में मेरे लगा था अभी तक लगा हुआ है! रोज नहाती हूँ मैं। महीनों हो गये उस बात को, एकदम ठीक-ठाक पाक-साफ हूँ मैं।​पति की आवाज सुनकर मालकिन अन्दर जाकर अपने काम में व्यस्त हो गयी थी। वह बाहर खड़ी रह गयी। क्रोध और अपमान में थरथराती हुई-सी। अन्दर जमा दर्द पिघलकर आँखों के रास्ते बह निकला था। यहाँ इस घर में आकर लगा था कि धीरे-धीरे जख्म भर जायेंगे लेकिन... सगे माँ-बाप ने भी उल्टा मुझ पर ही... उस घर में ही मेरे लिए जगह न बची तो इस घर से क्या उम्मीद?​रेडीमेड कपड़ों की फैक्ट्री में जहाँ वह नौकरी करती थी—काम से उस दिन लौटने में देर हो गयी थी। उन दिनों सुल्तानपुरी की झुग्गियों में अपने माँ-बाप और एक भाई के साथ रहती थी वह। आउटर रिंग रोड से जैसे ही वह अपने घर की ओर जानेवाले कच्चे रास्ते पर उतरी—एक मारुति के पास खड़े तीन-चार लड़कों ने उसके मुँह पर कपड़ा डालकर उसे जबरदस्ती उठाया और पास खड़ी मारुति में डालकर उसे ले भागे थे। रास्तेभर उन्होंने उसके मुँह को कपड़े से दबाए रखा था। उसे कहाँ ले जाया गया, उसे पता नहीं चल पाया था। उसे बस इतना महसूस हुआ था कि उसके सिर पर किसी चीज से वार किया गया है और वह बेहोश हो गयी थी।​होश आने पर उसने अपने-आपको अस्त-व्यस्त और जख्मी हालत में पाया था। भेड़ियों ने नोचा-खाया है, वह समझ गयी थी। लेकिन वह जंगल में नहीं, एक अँधेरे कमरे में बन्द थी। उसके जगह-जगह लगीं नोचों-खरोंचों से खून रिस रहा था।​उसके मुँह पर फिर से कपड़ा बाँधकर शायद उसी मारुति से उसे उसी जगह वापस छोड़ दिया गया था।​घर पहुँचकर उसने कुछ नहीं बताया था कि पिछले चौबीस घण्टे वह कहाँ रही थी? उसके साथ क्या हुआ था। लेकिन उसके लौट आने की खबर पाते ही भीड़ बनकर आ जुटे आसपास के लोगों ने अनुमान लगा लिया था और बड़ी तेजी से यह बात फैल गयी थी कि वह लुटकर आयी है।​वह निस्पंद निःसत्व-सी खड़ी थी। बापू पागलों की तरह अपने बाल नोच रहा था। छोटा भाई बुरी तरह सहमा सिकुड़ा-सा कोने में बैठा था। माँ बुरी तरह रोती-कुरलाती हुई अपनी छाती पीट रही थी। उसने आगे बढ़कर माँ को चुप कराने की कोशिश की, "माँ, मैं ठीक-ठाक हूँ... मरी तो नहीं?"​"इससे अच्छा तो था कि तू मर ही जाती... अब ना तू जी पाएगी और ना तुझे कोई जीने देगा...!"​हैरान परेशान थी वह—ऐसी कितनी बड़ी दुर्घटना हो गयी है उसके साथ? जिसका उसे अनुमान नहीं लग पा रहा है? सही-सलामत तो है वह...​बाहर खुसर-पुसर चल रही थी—ऐसी लगती तो नहीं थी—आजकल किसी का क्या पता चलता है? पहले से जान-पहचान होगी उनके साथ; खुद इज्जत लुटा आयी होगी?​तिलमिलाकर चीखी थी वह, "लुटाकर नहीं लूटकर मेरे साथ ज्यादती... जबरदस्ती... और आप लोग उल्टा मुझे..."​बापू भी उल्टा उसीको मारने दौड़ा था, "इतना होने के बाद भी जुबान लड़ा रही है? कुछ भी शर्म नहीं तुझे? तू तो मुँह दिखाने लायक नहीं बची..." और बापू ने बाँह से पकड़कर उसे अन्दर खींच लिया था।​रात भर माँ और बापू उसे गालियाँ बकते हुए कोसते रहे थे कि उसने उन्हें भी मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा है। उसकी जिन्दगी तो बरबाद हुई सो हुई, उसके साथ उनकी जिन्दगी भी बरबाद हो गयी है...​अगले दिन दोपहर बाद आये पुलिसवाले को जब पता चला कि वह लौट आयी है तो उसने उल्टा उन्हें ही झाड़ा था कि उन्होंने उसके लौट आने की खबर थाने में क्यों नहीं दी है? गुम होने की रिपोर्ट लिखवा सकते हो, लौट आने की नहीं?​"वे कौन लोग थे?" पुलिस के पूछने पर मीना ने कहा, "ये तो पता नहीं कि वे कौन थे लेकिन मेरे सामने आ जायें तो मैं उन्हें पहचान सकती हूँ, लगता है कि सड़क पार की कोठियों में ही रहते होंगे..."​"कुल कितने थे?"​"कुल तीन थे, जिसने मेरे साथ जबरदस्ती की एक वो। बाकी दो तो अपहरण में उसकी मदद करनेवाले ही थे...।"​"पर मैंने तो सुना है दस-दस जने थे... सभी जगह फैला हुआ है कि दस-दस जनों ने..."​"पता नहीं किसने फैला दी है यह दस-दसवाली बात। लोग एक को दस तो बना ही देते हैं। वो हरामी तो एक ही था...।"​कहते-कहते उसकी रुलाई फूट पड़ी थी। पुलिसवाले के पूछने पर मीना ने उसका थोड़ा-बहुत हुलिया बता दिया था। गाड़ी के बारे में भी कुछ सवाल पूछकर उस वक्त तो पुलिसवाला चला गया था। लेकिन शाम को आकर उसके बापू को फिर झाड़ने लगा था और जोर देने लगा था, "थाने चलकर अपनी रिपोर्ट वापस ले लो वरना... हमें तुम्हारी भी इनक्वायरी करनी पड़ेगी। कुछ माँ-बाप खुद अपनी बेटियों को धन्धे के लिए भेजते हैं और कभी-कभार ग्राहक से झगड़ा हो जाने पर खुद ही ऐसी रिपोर्ट कर देते हैं? कहीं आप लोग भी?"​तड़फकर रह गये बापू और माँ; उन्हें काटो तो खून नहीं। उनकी अजीब हालत देखकर पुलिसवाला हैवान की तरह हँसा और नरमाई से बोला, "तुम लोग थाने चलकर अपनी रिपोर्ट वापस ले लो... मामला खत्म... वरना..."​इतना समझ पाना बापू के लिए मुश्किल नहीं था कि पुलिस को उन लोगों का पता लग चुका है और खुद की जेबें भरने के बाद पुलिस उन गुण्डों को बचाने में जुट गयी है।​उन्हें भी अहसास था कि बात आगे बढ़ाने का मतलब है खुद की और अधिक बेइज्जती और बदनामी।​और बापू उसी वक्त उस पुलिसवाले के साथ जाकर मामला खत्म कर आया था।​सहानुभूति जताते हुए नाते-रिश्तेदारों की बातों में उसे अजीब किस्म का अफसोस-सा सुनाई देता। उसे लगता उसके जीते-जी उसके मुँह पर उसकी असमय मृत्यु का मातम मनाया जा रहा है।​इससे पहले कि बदनामी दूर-दूर तक फैले... जल्द-जल्द इसकी शादी कर दो... रह गयी तो रह ही जायेगी। जितनी जल्दी हो सके... वरना...​लाजो मौसी के इस सुझाव को बापू ने बहुत गंभीरता से लिया था और अगले ही दिन से उसके लिए रिश्ता ढूँढ़ने में जुट गये थे। सुबह का निकला हुआ बापू चेहरे पर नाकामयाबी को लिए हुए शाम को घर​लौटता—आजकल अच्छी-भली लड़कियों की कद्र नहीं, ऐसे में दागी लड़की को कौन पूछता है?​पाँच-छह दिन बाद लाजो मौसी एक बूढ़े और बुढ़िया को साथ लेकर आयी थी। वे दोनों बड़े गौर से मीना को देखते रहे थे... और फिर मुँह मीठा करके खुशी-खुशी चले गये थे। हालाँकि माँ और बापू खुश नहीं थे, लेकिन लाजो मौसी बधाइयाँ देती हुई उन्हें अपने-आपको खुश किस्मत समझने के लिए कह रही थी। मीना समझ गयी थी कि माँ और बापू को यह रिश्ता न चाहते हुए भी करना पड़ रहा है।​लड़के के बारे में कुछ भी पता न चल पाने के कारण उसे स्वयं ही लाजो मौसी से पूछना पड़ा था।​"आजकल लड़केवालों के नखरे इतने हैं कि पूछो मत? लड़का शरीफ है। यहीं सुल्तानपुरी में ही रहता है। घर में बस वो दो बूढ़े माँ-बाप हैं। लड़के की उधर क्वार्टरों के पास गोली-टॉफी बेचने की दुकान है। तू जहाँ काम करती थी न... उससे थोड़ा आगे चलके लकड़ी का एक खोखा-सा है न... बस वही...।"​"वो...? उस पर तो एक अपाहिज-सा एक... बन्दा... उसके दोनों पैर लकवे के मारे हैं।"​"हाँ वही।"​"क्या? उस अपाहिज से मेरी शादी होगी? मौसी आप होश में तो हैं?"​"तेरा भाग्य ही ऐसा है तो... अपाहिज मत कह उसे। कुछ भी थोड़ी-बहुत कमीबेशी है तो क्या फर्क पड़ता है? उसका घर भी बस जायेगा। तुझे भी सहारा मिल जायेगा...।"​"सहारा कि बोझ...?"​"जरा ठंडी रह के सोच... अपनी तरफ तो देख... किसे नहीं पता कि तेरे साथ दस-दस जनों ने...? कहीं मुँह दिखाने लायक भी है तू? तेरे ये जो दाग लगा है उसका क्या?"​"नहीं-नहीं... मुझे नहीं करनी शादी..." बहुत बेबस और लाचार-सा होकर रोते हुए कहा था उसने।​लेकिन उसे बार-बार याद दिलाया जा रहा था कि अब वह एक दागी लड़की है। अब वह सामान्य नहीं रही है।​पूरे दिन बिना कुछ खाए-पिए पड़ी-पड़ी रोती रही थी वह। शाम को आईने में उसने अपना चेहरा देखा था। उसे कहीं कोई दाग या कालापन नजर​यह कहानी पितृसत्तात्मक समाज की उस क्रूरता को दर्शाती है जहाँ एक पीड़ित महिला को ही 'दागी' कहकर उसकी पूरी पहचान और गरिमा को खत्म करने की कोशिश की जाती है।​​नहीं आया था। जिस्म पर लगी छुटपुट खरोंचें भर चुकी थीं। हुआ क्या है उसके? पहले जैसी ही तो है वह?​मीना का घर से निकलना बन्द कर दिया गया था। एक हफ्ते से काम पर नहीं जा पा रहा था बाप। रोटी के लाले पड़ गये थे, ऊपर से एकाएक शादी? बापू इधर-उधर से पैसों के इन्तजाम में मारा-मारा फिर रहा था। माँ और मौसी शादी की तैयारियों के नाम पर दो-चार कपड़े बनाने में जुट गयी थीं।​लाल-सी साड़ी पर चमकीले-से सितारे टाँकती हुई माँ के हाथ से साड़ी छीनकर मीना ने परे फेंकते हुए पूछा था, "शादी की जल्दी क्या है? कहाँ हैं मेरे दाग? ऐसी क्या आफत है? ठीक-ठाक तो हूँ मैं? नहीं करनी मुझे शादी।"​जवाब में माँ बस रोने लगी थी। मौसी ने उसे झिड़कते हुए कहा था, "तुझे नहीं पता क्या हुआ है? हम तो मान भी लेंगे कि तेरे कोई दाग नहीं, पर दुनिया? वो तो नहीं समझती है? वो तो यही कहेंगे कि इसके साथ दस-दस जनों ने मुँह काला किया, बस... कौन सुनेगा कि इसमें तेरा कोई कसूर नहीं है और वह एक मामूली-सी दुर्घटना थी, डरावने सपने की तरह। ...लेकिन दुनिया नहीं मानेगी... तू इतना समझ ले, अब तो ठीक-ठाक सामान्य वर नहीं मिलेगा... दुनिया ही नहीं जीने देगी।"​"दुनिया? दुनिया? जिनके साथ जुल्म हो वह दागी... जो करे उसे कुछ नहीं? औरत को ही क्यों लगता है दाग?"​"बेटी हम तेरे दुश्मन नहीं हैं, तेरे भले के लिए ही तो..."​"तभी आप मेरी शादी करके पीछा छुड़वाना चाह रहे हो?"​"ताकि तुम मुँह छिपाए बिना जी सको और हम भी...।"​बापू रेहड़ी गिरवी रखकर किसी से तीन हजार का कर्ज उठा लाया था। होनी को कौन टाल सकता है? किसी-न-किसी तरह सिर पर पड़ी इस आफत को तो निपटाना ही पड़ेगा। बापू के लटके हुए चेहरे को देखकर वह तड़फकर रह गयी थी।​मौसी ने छुटपुट सामान की लिस्ट बापू को देकर कहा था कि शादी के वक्त इसकी जरूरत पड़ेगी। लिस्ट लेकर बापू ज्यों ही बाहर जाने को हुआ, मीना ने आगे बढ़कर बापू के हाथ से लिस्ट छीन ली थी और खीझकर मौसी से बोली, "मौसी! इस हादसे के बाद मेरे शरीर में कुछ नुक्स आ रहा है क्या? मैं लँगड़ी-लुंडी-अपंग हो गयी हूँ क्या?"​"नहीं तो..."​"जब मैं अपंग-अपाहिज नहीं हुई हूँ तो... फिर मेरी शादी एक अपाहिज से क्यों कर रहे हो?"​कुछ जवाब नहीं दे पाई मौसी। उसने माँ और बापू को भी झिंझोड़-झिंझोड़कर पूछा था लेकिन वे भी बुत बने रहे थे।​वह और भी खीझ उठी थी, "तो ठीक है फिर... कान खोलकर सुन लो... मैं यह शादी नहीं करूँगी।"​"तो क्या बाप की छाती पर बैठकर मूँग दलेगी?"​"चाहे कुछ भी हो जाये... मैं शादी नहीं करूँगी..."​"कैसे नहीं करेगी? करनी पड़ेगी।"​"जबरदस्ती करोगे तो मैं घर से भाग जाऊँगी या जहर खा लूँगी... मरना मंजूर है मुझे, पर..."​"तेरे जैसियों को मौत भी कहाँ आती है? मर जाये तो पिंड न छूटे।" गालियाँ बकता हुआ बापू आपे से बाहर होकर उसे पीटने लगा। रोती-झींकती हुई माँ उसे बापू से छुड़वाने की कोशिश करने लगी थी।​मीना उस शादी के लिए नहीं मानी थी। दिन-रात क्लेश चलता रहा था उनके घर। सिर्फ उसका छोटा भाई धीरू ही उसका पक्ष ले रहा था। बाकी सभी तो जैसे जबरदस्ती करने पर तुले हुए थे।​भरसक प्रताड़ित करने के बावजूद वे लोग उसे उस शादी के लिए मना पाने में अपने-आपको असमर्थ पा रहे थे।​बेहद क्रोधित होकर बापू ने उसे बाहर धकेलते हुए कहा था, "शादी नहीं करनी तो निकल जा हमारे घर से..."​बापू को पीछे धकेलकर धीरू आगे आ गया था, "फिर मैं भी दीदी के साथ जाऊँगा। कोई जबरदस्ती नहीं चलेगी। हम दोनों भाई-बहन कहीं और किराये पर झुग्गी लेकर रह लेंगे।"​दीदी का हाथ पकड़कर चल दिया था वह। पीछे से बापू के चीखने की आवाजें आ रही थीं—जाओ-जाओ! मेरी इज्जत तो मिट्टी में मिल गयी। मैं अपने-आपको बेऔलाद समझ लूँगा। मैंने तो अपनी रोजी-रोटी तक दाँव पे लगा दी और ये...? आज ही कर्ज वापस करके आता हूँ...।​अपने साथ काम करनेवाले एक मिस्त्री की मदद से धीरू को जहाँगीरपुरी में किराये पर एक झुग्गी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी।​वहाँ भाई के साथ अकेला रहना उसके लिए नयी जिन्दगी शुरू करने जैसा लग रहा था लेकिन लोगों की उनमें कुछ अधिक ही दिलचस्पी और शक...​​बहुत बुरा लग रहा था उसे—लोगों को अपना फटा हुआ क्यों नहीं दिखता? दूसरों को छोटा और गन्दा सिद्ध करने में क्या मिलता है लोगों को?​फिर भी यहाँ खुश थी वह। यहाँ कम-से-कम उस अपाहिज के बोझ से तो बच गयी। खुद वह किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। अपने भाई पर भी नहीं। धीरू काम पर जाता ही था। झुग्गी का किराया और खाने का खर्च उसकी तनख्वाह से पूरा हो जाता था। पर वह बैठकर कब तक खाएगी? काम की भी कमी नहीं थी। पास ही के दो-एक दर्जियों के यहाँ से वह काज-बटन और कढ़ाई का काम लाकर करने लगी थी।​कुछ दिन बाद माँ भी उन्हीं के साथ रहने चली गयी थी, पर बापू उसके लिए तो जैसे वे मर ही चुके थे। धीरे-धीरे बापू का गुस्सा भी शांत हो जायेगा उसने सोचा।​जिस बुजुर्ग दर्जी के यहाँ से मीना काम लेकर आती थी, वह उन्हीं की जाति का था। जब से उसे यह पता चला था वह मीना को बेटी कहकर पुकारने लगा था।​बुजुर्ग दर्जी ने एक दिन धीरू और माँ को बुलाकर कहा, "मेरी नजर में मीना के लिए एक योग्य लड़का है किशन, थ्रीव्हीलर चलाता है। थ्रीव्हीलर किस्तों पर ले रखा है। कुछ ही किस्तें बाकी हैं। समझो गाड़ी उसीकी है। उसके माँ-बाप तो हैं नहीं। एक भाई शादीशुदा, वो बाहर कहीं रहता है। लड़का शरीफ है। मेरे पास कपड़े सिलवाने आता है। लेन-देन का कोई भी सवाल नहीं है। तुम चाहो तो बात चलाऊँ?"​गीली-सी चमक उभर आयी थी उनकी आँखों में।​और एक सप्ताह के अन्दर बापू ने गुस्सा छोड़कर फिर से अपनी रेहड़ी गिरवी रख के पैसों की व्यवस्था की। माँ और मौसी ने मिलकर कपड़े तैयार किये और पास ही के शिव मन्दिर में सादे तरीके से शादी निपटा दी गयी थी। वे हैरान थे कि यह सब इतने कम समय में कैसे हो गया था?​उस पर दाग लगे होने की बात शादी के वक्त तो छुपा ली थी उन्होंने लेकिन यह भेद खुलने में पन्द्रह दिन भी नहीं लगे थे। नयी-नयी शादी हुई, किशन उसे अपने ऑटो में बिठाकर शहरभर में घुमाता रहा था। सुल्तानपुरी में रहनेवाले किशन के एक जानकार थ्रीव्हीलरवाले ने उसे मीना के साथ घूमते देख लिया था। अगले दिन ही किशन उसे अकेला मिल गया तो उसने मीना के बारे में सारी बात बता दी।​काम से किशन वापस लौटा तो उसके तन-बदन में जैसे आग लगी हुई ​थी। उसके माँ-बाप और भाई से लेकर रिश्ता करवानेवाले दर्जी को माँ-बहन की गालियाँ बकता हुआ वह मीना से पूछने लगा कि क्या उसे गुण्डे खराब कर चुके हैं? क्या वह दागी है? क्या वह उस गुण्डे से गिरी हुई है। मीना ने यह तो सहज ही मान लिया था कि उसके साथ जबरदस्ती हुई थी लेकिन उसके कहीं भी कोई दाग नहीं लगा हुआ है और वह गिरी हुई नहीं है। मैं अच्छे चाल-चलन चरित्र की थी, हूँ और रहूँगी...

​सुनते ही किशन तो जैसे पागल हो गया था—इतना बड़ा धोखा? एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी? हद है बेशर्मी और नीचता की... अच्छे चाल-चलन की है तू... चोरी, ऊपर से चतुराई... छोड़ूँगा नहीं मैं तुम सबको। अक्ल ठिकाने कर दूँगा तेरे परिवारवालों की... गुण्डों ने तुझे खराब किया और तू कहती है मैं...?

​"हाँ, मैं पाक-साफ़ हूँ। बताओ कहीं से खराब हूँ? पन्द्रह दिन से यहाँ तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें मुझमें कोई खराबी नजर आयी?"

​जवाब में वह लात-घूँसे जो बन पड़ रहा था, चलाने लगा था।

​दो-तीन दिन पिटने के बाद रोती हुई वह अपने भाई के पास जहाँगीरपुरी लौट आयी। माँ भी वहीं आयी हुई थी। घर में रोना-पीटना मच गया था। रोना-कुरलाना सुनकर आसपास के लोगों को आ-आकर जुटता देखकर मीना खीझ उठी थी, "माँ! तुम भी ये रोना-धोना बन्द करो। कुछ भी तो नहीं हुआ है। सही-सलामत तो हूँ मैं... कोई मौत तो नहीं आयी मुझे?"

​वहाँ जमा लोगों की तरफ मुड़कर मीना ने कहा, "यहाँ कोई तमाशा हो रहा है क्या? जाओ यहाँ से...।" और उसने झुग्गी का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया।

​माँ को चुप कराने की कोशिश में मीना के भी आँसू निकल आये। माँ तड़फड़ाकर रह गयी—इसी बात का डर था मुझे, इसीलिए तो कहा था कि उस अपाहिज से शादी कर ले। कोई सही-सलामत वर तुझे मिलने से रहा। हुई न वही बात। एक दाग तो पहले का लगा हुआ था 'छोड़ी हुई' होने का, ये दूसरा दाग और लगवा लिया तूने।

​खीझ उठी वह, "कोई दाग-वाग नहीं लगा मुझे!"

​"फिर वही बात। तेरे कहने से क्या होगा। दुनिया समाज तो देख-सुन रहा है, खामखाह का तमाशा बनाने का फायदा?"

​"मेरा दुःख तमाशा है उनके लिए? एक तो मेरे साथ ज्यादती, ऊपर से...?"

​"अब क्या होगा?"

​"शादी ही तो नहीं होगी ना... कोई जरूरी है? शादी करनी भी नहीं मुझे..."

​कभी भी मेहनत करके दो रोटी इज्जत की कमा लूँगी। खामखाह की अधीनता मुझे करनी भी नहीं।"

​दो-दो दाग लग जाने की बात यहाँ जहाँगीरपुरी की झुग्गियों में भी फैल गयी थी, लेकिन अब उसे परवाह नहीं थी। धीरे-धीरे लोगों के तानों-इशारों और हँसी को बेपरवाही से उड़ा देना सीख लिया उसने।

​धीरू अपने दोस्तों के साथ किशन के पास उसे समझाने-मनाने गया तो वह उसकी बहन के लिए वाही-तबाही बकने लगा। बर्दाश्त नहीं कर सका वह और उन्होंने किशन को बुरी तरह पीटा और वापस लौट आये। बाद में पता चला कि अपना थ्रीव्हीलर फाइनेंसवालों को वापस सौंपकर वह यह शहर ही छोड़कर बाहर कहीं भाग गया था।

​उसी बुजुर्ग दर्जी से काम लाकर करने में मीना को अब बहुत झिझक हो रही थी। यों उधर दो-एक दर्जी और थे जिनसे वो काम लाकर करने लगी थी। पर अब उसका मन नहीं लग रहा था।

​किरियानेवाले की दुकान या रास्ते में अक्सर मिल जानेवाली बुढ़िया ने एक दिन उसे बताया कि इन्दिरा पार्क की एक कोठी में काम करती थी। उसका काम छूट गया है। वो लोग नयी कामवाली ढूँढ़ रहे हैं।

​मीना अगले दिन ही वहाँ जा पहुँची और उसे काम मिल गया था। छोटा-सा परिवार था—दो बच्चे थे। बड़ी-बड़ी क्लासों में पढ़नेवाले।

​सुबह काम पर निकलने और दिन ढले घर लौट जाती। घर में दिन भर वह और मालकिन अकेले ही रहते। मालिक, ज्यादातर बाहर ही रहते। बच्चे स्कूल चले जाते, काम भी कोई ज्यादा नहीं था। अपने घर जैसा ही लगता था उसे। बहुत खुश थी वह यहाँ।

​उसके वो दाग पिछले दो सालों में मालकिन को तो दिखे नहीं थे, पर बर्तन बेचनेवाली औरत ने यहाँ आकर मालकिन को उसका पिछला इतिहास बताकर वो दाग दिखला दिये थे।

​उसे मालकिन से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि पता चलने पर इतना बदल जायेगी कि उसे अन्दर तक नहीं घुसने देगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जुल्म मेरे साथ हुआ है। मालकिन को क्या? मालकिन को तो काम से मतलब है। मैंने मालकिन को क्या धोखा दे दिया? क्या जीवनभर हर जगह से मैं यों ही बेइज्जत होकर निकाल दी जाती रहूँगी? अन्दर तक आहत हो आयी थी वह।

​तभी मालकिन ने आकर उसके आगे दो सौ रुपये फेंकते हुए कहा,

​"उठा पैसे, तेरा-हमारा हिसाब बराबर। हमें ऐसी गन्दी, धोखेबाज कामवाली नहीं चाहिए।"

​थरथराते हुए पूछा, "कैसा धोखा बीबीजी? मैंने कोई धोखा नहीं दिया आपको!"

​"बात नहीं छुपाई तूने? बड़ी पाक-साफ बन रही है?"

​"मैं हूँ पाक, पवित्र... काम की कमी नहीं है। आप पाक-साफ हो?"

​कोई जलती हुई लकड़ी छुआ दी जैसे मालकिन को किसी ने, "तेरा नास जाये कुतिया, मुझसे पूछती है... आप पाक-साफ हो? मुझसे? हे राम! कितनी दुष्ट औरत है? तुझे क्या हुआ है?"

​"होना क्या है, मामूली घटनाएँ तो होती रहती हैं।"

​"कौन-सी घटना...?"

​"कुछ नहीं, उस दिन आपने जल्दबाजी में तो केक खा लिया था जिस पर दुनिया भर की चींटियाँ और कीड़े-मकोड़े चढ़े हुए थे, बाद में आपने कितनी उल्टियाँ कर-करके अपना भीतर-बाहर साफ कर लिया था। दो-चार दिन बाद वह आप थू-थू करती रही थीं। लाल दवाई के कुल्ले भी किये थे आपने? अब तो आपका मुँह पाक-पवित्र है, आप उसी से खाना खाती हैं?"

​"फिर? क्या मतलब तेरा? वो बात और ये बात एक ही है? वो मामूली-सी घटना और...?"

​"वो भी मामूली बात ही थी। धोने-साफ करने से कौन-सी चीज पवित्र नहीं होती, रोज नहाती हूँ मैं... मैं तो पाक-पवित्र हूँ। आप जैसों ने ही इसे बहुत बड़ी और बुरी घटना बना दिया है।"

​अवाक् रह गयी मालकिन। शायद उसे लगा था यह गलत नहीं कह रही थी। वैसे भी जो हुआ उसमें उसका क्या दोष है?

​खामोश खड़ी रहीं दोनों कुछ देर। वह जाने को मुड़ी। मालकिन ने उसे नहीं रोका।

​एकाएक मीना फिर मुड़ी और धीरे-से बोली, "बीबीजी, मेरी जगह किसी कुँआरी लड़की को मत रखना, उसके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है। क्या पता उसका आपको पता लग पाए या न लग पाए? और किसी शादीशुदा औरत को भी मत रखना क्योंकि उसके साथ तो वो लगा ही रहता है।"

​एकदम निस्पंद और निरुत्तर-सी खड़ी थी मालकिन।

​बहुत निराश और ना-उम्मीद हो आयी मीना। क्या वाकई वह ऐसी अपवित्र, दागी, गन्दी और घृणित हो गयी है? समाज में कोई उससे किसी तरह का...

​भी सम्बन्ध ना रखे—इतना लम्बा चलेगा रेप? एक ने मुँह काला नहीं किया, यहाँ सबके मुँह काले हैं। अगर नहीं तो लोग उसे ऐसा सोचने या महसूस करने को क्यों बाध्य कर रहे हैं?

​चार-पाँच दिन वह घर से ही नहीं निकली थी। धीरे-धीरे हिम्मत जुटाकर फिर से एक दर्जी से काम लाने लगी थी।

​उस दिन वह जहाँगीरपुरी के बस स्टॉप पर खड़ी थी। पास ही दो लड़के और खड़े थे जो बार-बार मुड़-मुड़कर उसकी ओर देख रहे थे और उस पर हँस रहे थे—दस-दस हा हा...वही तो है जिसके साथ दस-दस हा हा... दस-दस जने... हा हा... ​अपने-आप में सिमटती-सिकुड़ती हुई-सी वह काफी देर तक यह सब बर्दाश्त करने की कोशिश करती हुई उनकी ओर से बेपरवाह हुई-सी खड़ी रही। लड़के अश्लील इशारे और फब्तियाँ कसने पर उतर आये तो वह और अधिक बर्दाश्त नहीं कर पाई। उसने अपनी दोनों चप्पलें उतारकर अपने दोनों हाथों में ले लीं और उन पर टूट पड़ी। उसका चंडीरूप देखकर एक लड़का तो डरकर भाग निकला पर दूसरे को धक्का मारकर उसने नीचे गिरा दिया था और उस पर चप्पलें बरसाने लगी थी।

​भीड़ जुटने लगी थी, "क्या हुआ? क्या हुआ?"

​"मुझे छेड़ रहा था ये गुण्डा... कई दिनों से छेड़ रहा था। जीना हराम कर रखा था इसने।"

​"मारो साले को... गुण्डागर्दी की हद ही हो गयी है।"

​"मारो मारो..."

​"मारो मारो... माँ-बहनों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है।"

​जो आता, पूछता और पता चलने पर खुद भी उसे पीटने लगता। सड़क पर से गुजरनेवाले कार-स्कूटरवाले रुक-रुककर पूछ रहे थे—क्या हुआ? क्या हुआ? पता चलने पर वे पिटते हुए लड़के पर हँसते—हा हा...पीटना चाहिए ऐसे लोगों को... मारो-मारो...

​लोग उसे पीट रहे थे। मीना भीड़ से थोड़ा अलग खड़ी हुई थी। हैरान थी वह—मैं तो सोचती थी दुनिया मेरे खिलाफ है, दुनिया तो मेरे साथ है।