बाघ के पंजे
कमल चोपड़ा
सजग के माँ-बाप उसे कभी किसी काम के लिये नहीं टोकते थे। सजग भी ऐसा कुछ भी नहीं करता था जिसके लिये उसे पछताना पड़े या माँ-बाप के सामने शर्मिन्दा होना पड़े।रोजाना की तरह स्कूल से लौटने के बाद उसने खाना खाया, कुछ देर आराम किया, फिर उठकर खेलने के लिये निकल गया। मुहल्ले के बीचों-बीच एक खाली ग्राउण्ड था जहाँ रोजाना शाम को कुछ लड़के क्रिकेट खेलते।ग्राउण्ड के चारों तरफ दो-मंजिला, तीन-मंजिला मकान थे। सजग का क्रिकेट खेलने का मन होता तो वह मन मसोस कर रह जाता। वह रोजाना शाम को इस ग्राउण्ड पर आता और मकान की थड़ी पर बैठकर लड़कों का खेल बहुत बारीकी से देखता, उसे उनका खेल देखना बहुत अच्छा लगता। खेलते-खेलते लड़कों का आपस में कोई विवाद हो जाता तो सजग अपनी राय देकर उनका विवाद सुलझा देता।आज सजग क्रिकेट ग्राउण्ड की तरफ न जाकर बाजार की तरफ निकल गया। चलते हुए वह बड़े ध्यान से इधर-उधर देखता जा रहा था। उसके कानों में सरला दीदी की आवाजें गूँज रही थीं- 'अपने आस-पास की हर चीज पर नजर रखो, ऊपर से मामूली-सी दिखनेवाली कोई चीज, बात या घटना के पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है।' सजग की नजर बंद दुकान के बाहर लगे फट्टे पर बैठे एक नौ-दस साल के लड़के पर पड़ी। उसकी एक बाँह पर लम्बे-लम्बे तीन-चार जख्म बने हुए थे। जख्म में हो रही दर्द से वह बुरी तरह बिलबिला रहा था। लड़के ने अपने दूसरे हाथ से जख्मवाली बाँह को दबा रखा था, ताकि दर्द कम हो। वह बुरी तरह रो रहा था। सजग ने उसके पास ही फट्टे पर बैठते हुए बहुत हमदर्दी से पूछा- “क्या हुआ? कैसे लग गई यह चोट?” दर्द के मारे लड़के का बुरा हाल था। रोते-बिलबिलाते हुए उसने कहा- “चोट तो कई दिन पहले लगी थी मुझे। मैं इधर से गुजर रहा था कि एक साइकिलवाला साइड मारकर भाग गया। चोट पर दोबारा चोट लग गई।” सजग ने हैरान होकर पूछा कि चोट कई दिन पहले लगी थी, कलाई पर इतने लम्बे-लम्बे जख्म हैं... कोई पट्टी-वट्टी नहीं करवाई तुमने?” सजग ने आगे कहा- “देखो जख्मों से मवाद के साथ-साथ खून भी निकलने लगा है लेकिन यह चोट तुम्हें लगी कैसे थी?”दर्द से कराहते हुए लड़के ने कहा- “बाघ के पंजे ने खाल फाड़ दी है... नहीं-नहीं, वो बाघ के पंजे नहीं वो तो मेरे मुँह से निकल गया। हाँ, ये जख्म मजाक-मजाक में सब्जी काटनेवाले चाकू से लग गये हैं।” उसके हकलाने से साफ जाहिर था कि वह कुछ छिपा रहा है।सजग ने उससे और पूछना उचित नहीं समझा। सजग ने हमदर्दी से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? क्या काम करते हैं? तुम्हारे माँ-बाप ....“मेरा नाम रामू है। मेरे माँ-बाप बहुत गरीब हैं। मैं लाला मगनलाल के पास काम करता हूँ। मेरे बापू ने लाला मगनलाल से दस हजार रुपये लिये थे जिसकी एवज में मुझे लाला के पास काम करना पड़ रहा है।”सजग ने उसे टोकते हुए पूछा- “काम करते हुए लग गई होगी चोट? फिर लाला ने तुम्हारी पट्टी क्यों नहीं करवाई?” रामू एकदम चुप लगा गया।सजग बोला- "पहले तू मेरे साथ चल। तेरी पट्टी-दवाई करवाता हूँ।"रुआँसा होकर रामू ने कहा- "पर .........! मेरे पास पट्टी-वट्टी के लिये पैसे कहाँ हैं? पैसे होते तो............?""तू चल तो सही.......!"थोड़ी ही दूरी पर एक अस्पताल था। वहाँ सजग के मामा डॉक्टर लगे हुए थे। उन्होंने रामू की पट्टी की व इंजेक्शन लगाया और खाने के लिये भी दवाई दी और कहा- "अच्छा किया जो यहाँ आ गये, देर करते तो जख्म बढ़ता ही जाता और हाथ काटने की नौबत भी आ सकती थी। अब से रोजाना यहाँ आकर पट्टी करवाते रहना।"कुछ ही देर में रामू को दर्द से राहत मिल गई थी। उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। वह खुद ही बताने लगा- "लाला मगनलाल ने मेरे बापू को दस हजार रुपये क्या दिये थे, लाला ने तो मुझे जैसे खरीद ही रखा है। मुझसे दिन-रात काम करवाता रहता है। उस दिन जल्दी-जल्दी काम करते मुझसे काँच का एक गिलास टूट गया, इसके लिये लाला ने मुझे बहुत पीटा भी, उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उसने पास ही पड़ा हुआ बाघ का एक पंजा उठाकर उसके नाखून मेरी कलाई में घुसाये और जोर से खींच दिया। मेरा मांस फट गया। खून निकलने लगा। दर्द के मारे मैं कुछ देर बेहोश हो गया। कुछ देर बाद होश आया। मुझे बर्दाश्त से बाहर दर्द हो रहा था। मैं लाला से पट्टी-वट्टी करवाने के लिये बहुत गिड़गिड़ाया पर लाला ने एक नहीं सुनी। फिर मैंने खुद ही वहीं कोई मैले-कुचैले कपड़े की चीर ढूँढ़कर बाँध ली। तब कहीं जाकर खून बंद हुआ पर दर्द बंद नहीं हुआ।" सजग ने पूछा, “तेरे लाला के पास बाघ का पंजा कहाँ से आया? वह काम क्या करता है?”कुछ क्षण सोचने के बाद रामू ने कहा, “देखो, किसी को बोलना मत, लाला मगनलाल बाघ और चीते के पंजे और खाल वगैरह बेचने का काम करता है।”“असली शेर, बाघ और चीते के?”“हाँ, एकदम असली! जानवरों को मारकर उनके अंग देश-विदेश के लोगों को बेचता है। जानवर की खाल से कोट आदि बनते हैं, जो कई लाखों में बिकते हैं। बाकी के छोटे-मोटे अंग चीन, कोरिया आदि देशों में बेचे जाते हैं। शायद वे दवाइयों और खाने के काम आते हैं। उत्तराखण्ड के कुछ शिकारी हैं, उन्हीं शिकारियों से लाला मगनलाल शेर, बाघ, चीते आदि के पंजे मँगवाता है।”“लाला मगनलाल से कौन खरीदता है?”“इधर के कई ढोंगी साधु व तांत्रिक हैं जो लाला से पंजे खरीद लेते हैं और यजमानों को बेचते हैं और उनसे कहते हैं—यजमान! तुम बाघ का असली पंजा अपनी तिजोरियों में रख लो, कुछ ही दिनों में तुम्हारी तिजोरी करोड़ों से भर जायेगी। कुछ ही वर्षों में तुम अरबोंपति बन जाओगे। किसी को कहते हैं—पंजे को घर में रख लो, तुम पर कभी कोई मुकदमा नहीं होगा। तुम्हारी जीत होगी। झूठ-मूठ ही कह देते हैं—वह जो खंडानी-तंडाणी लाला हैं ना वो पहले भूखे मरते थे फिर मैंने ही उन्हें तंत्र-मंत्र से शुद्ध कर बाघ के पंजे दिये थे। आज देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गये हैं। पैसे का कुछ अंत ही नहीं है। वह भोले-भाले लोगों को बहकाकर उनके अंधविश्वास का फायदा उठाते हैं और एक-एक पंजा पांच-पांच, दस-दस लाख का बेच देते हैं। लाला के पास दो-तीन लड़के और भी हैं जो इधर-उधर माल लाने, फिर ले जाने का काम करते हैं। लाला तांत्रिकों से एडवांस में ही पैसे ले लेता है, तभी पंजा पहुँचाता है....“शास्त्री नगर में जो अफजल मियाँ तांत्रिक हैं ना, उन्हें ही एक पंजा देकर आ रहा हूँ।”उसकी बातें सुनकर सजग हैरान-परेशान हो उठा था। रामू बोला- “अच्छा मैं चलता हूँ। देर हो गई है। लाला मेरी जान खा जायेगा।”“मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ। इसी बहाने लाला का ठिकाना भी देख लूँगा।”रामू ने उसे बहुत मना किया- “लाला बहुत खतरनाक आदमी है। कहीं ऐसा ना हो... तुम भी आफत में फँस जाओ।”“तुम चिन्ता न करो.........!”रामू कहता रहा लेकिन सजग नहीं माना। वह रामू के साथ ही चल दिया। लाला के यहाँ पहुँचकर सजग ने कहा- “लाला जी! आपके इस लड़के को एक गाड़ीवाला साइड मारकर भाग गया था। यह वहाँ बेहोश पड़ा था। मैं इसे अस्पताल ले गया। पट्टी-दवाई करवाई अब इसे छोड़ने आया हूँ।”लाला ने खीज कर कहा- “ठीक है! फूट यहाँ से।”सजग चुपचाप वापस चल दिया। वह जो कुछ देखना चाहता था उसने देख ही लिया था। वहाँ से वह सीधे थाने पहुँचा। थानेदार को सारी बात बता दी। थानेदार गजेन्द्र सिंह ने सजग को सिर से पैर तक देखा। कुछ देर सोचने के बाद थानेदार गजेन्द्र सिंह ने कहा- “वन्य प्राणी को मारना, उनके अंग बेचना-खरीदना अपराध है। छोटे बच्चों से काम करवाना भी अपराध है। हम अभी चलकर सेठ के ठिकानों पर छापा भरते हैं। अगर तुम्हारी इन्फॉर्मेशन गलत निकली तो...?” “मैं अपनी आँखों से देखकर आ रहा हूँ। गलत निकली तो आप मुझे जो चाहे सजा देना.........।”“पक्की बात है न? तो चलो तुम भी बैठो जीप में। रामसिंह, रणवीर सिंह, तुम लोग भी बैठो जीप में और चलो।”पुलिस वालों ने छापा मारकर लाला मगनलाल के घर से जानवरों के कटे हुए अंग, पंजे, खाल और हड्डियाँ बरामद कर लीं और उनके साथियों को पकड़कर बंद कर दिया। पुलिस ने आस-पास के कुछ तांत्रिकों के यहाँ छापे मारे। किसी के यहाँ जानवरों के दूसरे अंग मिले। किसी के यहाँ हड्डियाँ, खोपड़ियाँ मिलीं तो पुलिस ने उन सब ढोंगियों को धर-दबोचा। पकड़े गये ढोंगी तांत्रिकों की संख्या पन्द्रह थी, जिनमें तीन ढोंगी साधु भी थे।अगले दिन सुबह से शाम तक न्यूज चैनलों पर यह खबर दिखाई जाती रही। सजग के घर इंटरव्यू लेनेवालों का ताँता लगा हुआ था। यह इंटरव्यू चैनलों पर दिखाया जा रहा था। पुलिस प्रशासन की ओर से सजग के लिये कई पुरस्कारों की घोषणा की जा रही थी। चारों तरफ सजग की वाह-वाही हो रही थी।