मंडी में रामदीन
कमल चोपड़ा
गाड़ी में तरबूज भरे हुए थे। माल देखकर शामलाल दलाल छलांग मारकर गाड़ी से नीचे उतरा। रामदीन से बोला- "देख भाई, मंडी में इतनी मन्दी है कि क्या कहें?"हैरान था रामदीन। 'ट्रक, टेम्पो, रेहड़ी रिक्शा भीड़-भड़क्का मंडी में खड़े होने की तो जगह नहीं है, ये मन्दी है? तो तेज़ी कैसी होती है?'"तरबूज को तो कोई पूछ भी नहीं रहा। खैर.... माल तुम्हारा है तुम बोलो। इनके कितने माँगते हो?""आप ही ठीक-ठीक लगा लो.... छह सात हज़ार मिल जायें बस.. शहर में तो तरबूज दस रुपये किलो बिक रहा है। मेरा ये एक-एक फल पचास से नब्बे रुपये तक बिकेगा।"शामलाल हँसने लगा जैसे अनोखी बात सुन ली हो- "नहीं बिकेंगे... डेढ़ दो हज़ार की बात करो तो...? दो सौ रुपया कमीशन के मैं लूँगा।"कुएँ और खाई के बीच लटक गया था रामदीन। इतनी कम कीमत तो उसे गाँव में ही मिल रही थी। आज़ादपुर मंडी में इसी माल के आठ नौ हज़ार तो आराम से मिल जायेंगे- यह सोचकर आया था रामदीन।यहाँ मेटाडोर से लाने के दो हज़ार रुपये तो किराया लग गया। सौ सवा सौ चाय पानी का। माल के अठारह सौ मिल रहे हैं वो तो मेटाडोरवाला ले लेगा। उस पर लेकर आया था माल। उसकी खून पसीने से उगाई तरबूजे की फ़सल की कीमत कहाँ गई?उधर मेटाडोर वाला उस की जान खा रहा था- "जल्दी बताओ गाड़ी कहाँ खाली करूँ? मुझे और भी काम है। चार घंटे से गाड़ी सड़क पर खड़ी है। ऊपर से पुलिस वाले गाड़ी हटाने के लिए डंडे फटकार रहे हैं। कितना टाईम और लगाओगे?"हाथ पाँव जोड़कर उसने किसी तरह थोड़ी और देर तक रुकने के लिए मनाया। उसे चाय पानी के पैसे भी दिये और फिर से दलालों, आढ़तियों और मंडी के थोक फल व्यापारियों के आगे इधर-उधर गिड़गिड़ाने लगा। पर बात नहीं बन रही थी। वह वापिस गाड़ी के पास आकर खड़ा हो गया। गाड़ी वाला शायद कहीं रोटी खाने गया हुआ था। तभी एक पुलिस वाले ने आकर डंडा फटकारना शुरू कर दिया- “कागज़ दिखाओ। लाइसेंस दिखाओ.... चालान होगा... एक हज़ार रुपया निकालो।”रोता गिड़गिड़ाता देख वर्दी वाले ने उससे एक सौ रुपया ले उसकी जान छोड़ दी।आसमान में बादल गरज रहे थे। बरसात शुरू हो गई थी। रामदीन की रूह काँप रही थी। एक दलाल वहाँ से निकलते हुए रामदीन को कह गया, “बरसात में कौन खायेगा तरबूज? अब तो तुम्हारा माल बिकना नामुमकिन है।”बरसात तेज़ होती जा रही थी। बरसात को रुकता हुआ न पाकर रामदीन हारकर शामलाल के पास गया। उसने शामलाल के पाँव पकड़ लिये। किसी तरह उसे अठारह सौ का माल बेचा और सारे पैसे ले जाकर गाड़ी वाले को दे दिये। रामदीन की आँखों में आँसू देखकर गाड़ी वाले ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर कहा- “मेरे बापू ने भी ऐसे ही हार कर आत्महत्या कर ली थी। बाद में मैंने ज़मीन बेचकर ये गाड़ी बना ली। पर तू हिम्मत ना हारना। सब दिन ऐसे नहीं रहेंगे। किसान के बिना लोग खायेंगे क्या? जियेंगे कैसे? किसानों के भी दिन आयेंगे।”गाँव वापस जाने के लिए रामदीन के पास भाड़ा नहीं बचा था। वापिस जाये तो जाये कैसे? वह सड़क पर खाली हाथ खड़ा था। तभी फल सब्ज़ी व्यापार मंडल का एक आदमी रसीद बुक लेकर आ गया।“तुमने माल बेचा है? इक्यावन रुपये की पर्ची कटवाओ।” खीझ उठा रामदीन- “एक पैसा नहीं बचा है मेरे पास। अब क्या अपने कपड़े उतारकर दूँ? मैंने माल बेचा कहाँ है...? मेरा माल तो यहाँ लूट लिया गया है।”