Shunyprasth - 2 in Hindi Fiction Stories by Nitu books and stories PDF | शून्यप्रस्थ: एक अंतहीन महागाथा - 2

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शून्यप्रस्थ: एक अंतहीन महागाथा - 2

अध्याय 2: नियति का नया खेल

​शून्य-प्रस्थ की वादियों में आज एक उत्सव की गूँज थी। कंचन धरा की उस भीषण तबाही से दूर, 'रजत-गिरि' की भूमि अपनी चाँदी जैसी चमकती चट्टानों और बर्फीली हवाओं के लिए जानी जाती थी। यहाँ के सम्राट राजसिंधु का विशाल रथ, जो श्वेत अश्वों द्वारा खींचा जा रहा था, नगर की गलियों से गुज़र रहा था। रथ पर स्वर्ण की बारीक नक्काशी थी और उस पर लगे ध्वज हवा में लहरा रहे थे। सम्राट स्वयं अपनी प्रजा के बीच आए थे ताकि वे अपने इकलौते पुत्र 'विक्रमादित्य' के दूसरे जन्म-दिवस के महा-उत्सव का निमंत्रण दे सकें। ढोल-नगाड़ों की आवाज़ के बीच जनता अपने सम्राट पर नीले रंग के सुवासित पुष्प बरसा रही थी। पर इसी उत्सव के शोर से दूर, एक पुराने वृक्ष की शीतल छाया में मैनावत बैठी थीं। उनकी आँखों से बहते आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। आज ही के दिन, ठीक एक वर्ष पहले, कंचन धरा में खुशियाँ मनाई गई थीं जब हेमंत का जन्म हुआ था। आज हेमंत एक वर्ष का हो चुका था, पर उसके पास न उसका पिता था, न राज्य, और न ही वह सुनहरी धूप।

​उत्सव की भीड़ से दूर, सम्राट राजसिंधु की दृष्टि उस अकेली बैठी स्त्री पर पड़ी, जिसके फटे-पुराने वस्त्रों के भीतर भी एक अजीब सी गरिमा और राजसी आभा झलक रही थी। सम्राट ने अपना रथ रुकवाया और पैदल ही उस वृक्ष की ओर चल दिए। मैनावत को अचानक अपने पास किसी की उपस्थिति का अहसास हुआ, तो उन्होंने तेज़ी से अपने आँसू पोंछे और हेमंत को अपनी गोद में और कस लिया।

​"तुम कौन हो देवी? और इस निर्जन स्थान पर इतनी उदास क्यों बैठी हो?" राजसिंधु ने अत्यंत विनम्रता से पूछा।

​मैनावत का हृदय ज़ोर से धड़का। क्या वे सच बता दें? नहीं! अगर मोहिनी को भनक भी लग गई कि कंचन धरा की रानी जीवित है, तो वह पूरे शून्य-प्रस्थ को श्मशान बना देगी। उन्होंने अपनी आवाज़ को संयत किया और नज़रें झुकाकर कहा, "मैं एक साधारण दासी हूँ महाराज। मेरे राज्य पर बाहरी शक्तियों ने हमला किया और मैं अपने इस छोटे से बालक के साथ प्राण बचाकर यहाँ पहुँची हूँ।" राजसिंधु एक दयालु शासक थे। उन्होंने मैनावत को सहारा दिया और अपने साथ महल ले आए। रजत-गिरि के भव्य महल में रानी रत्नप्रिया ने जब मैनावत को देखा, तो उनकी आँखों में संशय था, पर सम्राट के आदेश पर उन्होंने मैनावत को शरण दे दी। मैनावत को महल की अन्य दासियों के साथ काम पर लगा दिया गया। कल तक जो रानी आदेश देती थी, आज वह स्वयं सेवा में लग गई थी—सिर्फ अपने बेटे के भविष्य के लिए।

​समय की धारा शून्य-प्रस्थ में अपनी जादुई गति से बही और देखते ही देखते पाँच वर्ष बीत गए।

​रजत-गिरि के ऊँचे प्रांगण में अब दो बालक साथ खेलते हुए दिखाई देते थे। एक था राजकुमार विक्रमादित्य और दूसरा दासी का पुत्र हेमंत। दोनों की मित्रता ऐसी थी मानो एक ही आत्मा दो शरीरों में बसती हो। वे अजीब से जादुई खिलौनों के साथ खेलते थे—मिट्टी के बने छोटे-छोटे पक्षी जो पंख फड़फड़ाकर सच में थोड़ी दूर उड़ सकते थे, और लकड़ी के ऐसे लट्टू जो ज़मीन पर घूमते हुए संगीत पैदा करते थे। विक्रमादित्य का कद थोड़ा ऊँचा था और उसका चेहरा अपने पिता की तरह शांत था, जबकि हेमंत की आँखें किसी जलती मशाल की तरह तेज़ थीं। उसका शरीर अभी से सुगठित होने लगा था और उसके हर कदम में एक स्वाभाविक नेतृत्व झलकता था। वे दोनों अक्सर महल की ऊँची मीनारों पर चढ़ जाते और दूर क्षितिज को देखते, जहाँ से कंचन धरा का रास्ता जाता था।

​पर उसी क्षितिज के पार, 'कंचन धरा' का दृश्य अब किसी भयानक डरावने सपने जैसा हो चुका था। जहाँ कभी सुनहरी धूप नाचती थी, वहाँ अब स्थायी काले बादलों का डेरा था। झरने सूख चुके थे और उनके पत्थरों पर अब काई की जगह काला विष जम गया था। वह स्वर्ण-किला, जो कभी वैभव का प्रतीक था, अब खंडहर बन चुका था। खिड़कियों के कांच टूट चुके थे और नक्काशीदार दरवाजों पर मकड़ियों ने अपने जाले बुन लिए थे। सुगंध की जगह वहाँ अब सड़े हुए माँस और सन्नाटे की गंध आती थी। महल के गुंबदों पर अब सुंदर मयूर नहीं, बल्कि 'छाया-पक्षी' बैठते थे—बुराई के वे प्रतीक जिनके पंख लोहे की तरह सख्त और आवाज़ किसी के रोने जैसी डरावनी थी।

​महल के मुख्य सिंहासन पर, जो कभी सम्राट सिद्धार्थ का था, अब मोहिनी बैठी थी। उसके होंठों पर एक क्रूर मुस्कान थी। वह अपनी अगली योजना बना रही थी कि कैसे शून्य-प्रस्थ की बची हुई शक्तियों को भी अपने पैरों तले कुचल दे। तभी सन्नाटे को चीरते हुए एक भारी फड़फड़ाहट हुई। उसका वफादार पक्षी 'अश्मन' वहाँ आ पहुँचा। अश्मन कोई साधारण पक्षी नहीं था; उसके पंख ताँबे के थे और उसकी चोंच किसी आरी की तरह तेज़ और मुड़ी हुई थी। उसकी आँखें जलते हुए अंगारों जैसी लाल थीं।

​"स्वामिनी..." अश्मन की कर्कश आवाज़ गूँजी। "वह अभी भी जीवित है। कंचन धरा का उत्तराधिकारी, राजकुमार हेमंत मरा नहीं है।"

​मोहिनी की आँखें क्रोध से सुलग उठीं। वह उठकर महल के उस तहखाने की ओर बढ़ी जहाँ सम्राटों की वंशावली 'अमर-दीप' के रूप में सुरक्षित थी। वहाँ हर सम्राट के नाम की एक जादुई मोमबत्ती थी। अगर मोमबत्ती बुझी है, तो वंश समाप्त। मोहिनी ने देखा कि कंचन धरा की वंशावली के स्तंभ पर एक छोटी सी मोमबत्ती अभी भी जल रही थी। वह बुझी नहीं थी, बल्कि उसका प्रकाश पहले से कहीं अधिक तीव्र और उत्साह से भरा था। मोहिनी ने गुस्से में अपना हाथ हवा में लहराया, "इतने वर्षों तक वह मेरी नज़रों से बचता रहा! वह जीवित है... और बढ़ रहा है!"

​उसने तुरंत अपने सबसे क्रूर सैनिकों को बुलाया। ये सैनिक साधारण मनुष्य नहीं थे; उनके शरीर पत्थर की तरह सख्त थे और वे बात नहीं करते थे, केवल मोहिनी के आदेश समझते थे। मोहिनी ने उन्हें एक काले रंग का पुष्प दिया। वह फूल दिखने में मुरझाया हुआ था, पर उसमें से एक रहस्यमयी धुआँ निकल रहा था।

​"जाओ!" मोहिनी ने आदेश दिया। "इसे लेकर शून्य-प्रस्थ के हर कोने में जाओ। जैसे ही तुम उस बालक के पास पहुँचोगे, इस फूल का काला रंग सफ़ेद होने लगेगा और यह पूर्ण रूप से खिल जाएगा। जहाँ यह खिल जाए, समझ लेना वही हेमंत है।"

​सैनिकों का वह दल, अपने काले घोड़ों पर सवार होकर, कंचन धरा की तबाही से निकल पड़ा। उनकी यात्रा की धूल हवा में ज़हर घोल रही थी।

​उधर रजत-गिरि में, शाम का सूरज ढल रहा था। प्रकृति ने अचानक करवट ली। पेड़ों के पत्ते बिना हवा के सरसराने लगे और पक्षी अचानक चुप होकर अपने घोंसलों की ओर भागने लगे। एक अजीब सी बेचैनी वातावरण में फैल गई, मानो प्रकृति चिल्लाकर आने वाले खतरे की सूचना दे रही हो, पर महल के भीतर खेलते हुए हेमंत और विक्रमादित्य इस आने वाले तूफ़ान से पूरी तरह बेखबर थे।