अध्याय 3: नियति का उपहास और काली परछाइयां
शून्य-प्रस्थ के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर मोहिनी के वे पाषाण-हृदय सिपाही कई ऋतुओं से भटक रहे थे। उन्होंने उन तमाम देशों को अपने पैरों तले रौंदा था जहाँ मोहिनी का भय नमक की तरह हवा में घुला था। पर जैसे ही उन काली परछाइयों ने 'रजत-गिरि' की पावन सीमा पर अपना पहला कदम रखा, एक अजीब सी हलचल हुई। उस भूमि की मिट्टी का स्पर्श होते ही, उन शक्तिशाली सैनिकों के पैर किसी जलती हुई लकड़ी की तरह चटकने लगे। बिना किसी तलवार या बाण के, वे अजय योद्धा नीली लपटों में घिर गए और देखते ही देखते राख के एक ढेर में बदल गए।
कंचन धरा का वह मुख्य दरबार, जहाँ कभी हज़ारों दीपकों की लौ और मंत्रोच्चार की गूँज थी, आज केवल एक भारी, नम सन्नाटे में डूबा था। छत की एक दरार से काला पानी रिसा और नीचे फर्श पर बने काले धब्बे पर गिरा... टप.....टप.....टप। सन्नाटे को चीरती यह आवाज़ किसी मरते हुए व्यक्ति की धड़कन जैसी जान पड़ रही थी। मोहिनी अपने सिंहासन पर बैठी थी, उसकी उँगलियाँ पत्थर के हत्थे को इतनी ज़ोर से भींच रही थीं कि पत्थर में दरारें पड़ने लगीं। सिपाहियों की राख की खबर ने उसके भीतर एक ऐसा दावानल दहकाया कि उसकी आँखों की पुतलियाँ लाल हो उठीं। उसका अहंकार तड़प रहा था। उसने समूची दुनिया को एक तुच्छ खिलौना समझ रखा था, पर आज उसे अपनी सत्ता की दीवारों में पहली दरार दिखाई दी। वह गुस्से में इस तरह फुफकार रही थी जैसे किसी ने तपते हुए लोहे पर ठंडे जल की बूंदें डाल दी हों।
समय बीतता रहा। अगले दो वर्षों तक मोहिनी ने कई प्रपंच रचे, पर रजत-गिरि की शुद्धता ने उसकी हर माया को निष्फल कर दिया। अब दरबार और भी डरावना हो चला था। काली दीवारों पर जाले नहीं, बल्कि मोहिनी के क्रोध की परछाइयाँ झूलती थीं। उसने अंततः अपनी दो सबसे प्रिय 'छाया-योगिनियों' को पुकारा— 'अधमरा' और 'विशालिका'।
वे दोनों सन्नाटे को चीरती हुई प्रकट हुईं। उनके चेहरे किसी पुरानी राख की तरह सफ़ेद थे और उनके होंठ नीले पड़ चुके थे। उन्होंने फटे हुए काले पंखों से बुने लबादे पहन रखे थे, जो उनके हिलने पर सूखी हड्डियों के टकराने जैसा शोर करते थे। वे दोनों एक-दूसरे को देखकर कुटिलता से मुस्कुराईं, मानो यह अभियान उनके लिए किसी उत्सव से कम न हो। मोहिनी ने उन्हें दो 'रक्त-मोती' दिए। उन मोतियों के भीतर एक खौलता हुआ लाल द्रव थिरक रहा था—ये मोती उस बालक के संपर्क में आते ही किसी जलती मशाल की तरह धधक उठते।
वे दोनों रजत-गिरि के वैभवशाली बगीचे में पहुँचीं। वहाँ की हवा में मल्लिका के फूलों का इत्र घुला था और झरने का पानी किसी संगीत की तरह गिर रहा था। उस पवित्र वातावरण में ये दोनों योगिनियाँ फल और खिलौने बेचने वालियों का भेष धरकर इस तरह रेंग रही थीं जैसे किसी मंदिर के गर्भगृह में दो काले बिच्छू घुस आए हों।
बगीचे के एक कोने में सात वर्ष का हेमंत और राजकुमार विक्रमादित्य अपनी ही मस्ती में डूबे थे। विक्रमादित्य एक लकड़ी की तलवार लिए हवा में हाथ-पाँव चला रहा था, जबकि हेमंत ज़मीन पर बैठे पत्थरों से एक मीनार बना रहा था। तभी खिलौनों का लालच लिए वे दोनों योगिनियाँ उनके पास पहुँचीं। विक्रमादित्य उत्साह में उनकी ओर भागा और अनजाने में ही अधमरा से ज़ोर से टकरा गया। धक्का इतना तीखा था कि अधमरा के हाथ से वह रक्त-मोती छिटककर घनी हरी घास में जा गिरा।
उसी हड़बड़ी में विक्रमादित्य का भारी खड़ाऊँ विशालिका के दूसरे मोती पर जा पड़ा। सन्नाटे में एक तीखी आवाज़ गूँजी— "कटा….क...!"
मोती के चूरे होते ही विशालिका की देह किसी कटी हुई पतंग की तरह फड़फड़ाने लगी। उसकी सारी जादुई शक्तियाँ पल भर में धुआँ हो गईं। उधर, हेमंत ने घास में चमकते हुए उस दूसरे मोती की ओर हाथ बढ़ाया। जैसे ही उसकी उंगलियां उस मोती के पास पहुँचीं, मोती किसी ज्वालामुखी की तरह धधक उठा। हेमंत का सात्विक तेज इतना प्रचंड था कि उन योगिनियों के नकली मानवीय मुखौटे पिघलने लगे। उनकी खाल जलने लगी।
विक्रमादित्य ने अपना पैर उठाकर उस टूटे हुए मोती के चूरे को बड़े गौर से देखा। उसने अपना माथा खुजलाया और मासूमियत से बोला, "अरे हेमंत! देखो, इन बूढ़ी काकी का कंचा टूट गया। ये तो बहुत कच्चा था! शायद इन्होंने इसे मिट्टी से बनाया था। अब ये खेलेंगी कैसे? ये तो रोने लगेंगी!"
हेमंत ने घास में बुरी तरह जल रहे उस दूसरे मोती को देखा और उसे एक गंदा पत्थर समझकर अपनी टहनी से दूर झाड़ियों में उछाल दिया। "छोड़ो विक्रम, शायद ये कंचा खराब था। चलो, हम उधर वाले झरने के पास चलते हैं।"
वे दोनों बच्चे अपनी धुन में वहाँ से निकल गए। उनके पीछे वे दोनों योगिनियाँ अपनी जलती हुई खाल को संभालते हुए, तड़पती हुई वहाँ से गायब हो गईं। उन बच्चों की मासूमियत ने उस गहरे संकट को एक मज़ेदार खेल बना दिया था। उन दोनों के चेहरों पर अहंकार का लेश मात्र भी नहीं था, बस एक सहज शांति थी।
कंचन धरा के मुख्य दरबार में फिर वही आवाज़ गूँजी— टप.....टप.....टप।
मोहिनी के सामने अधमरा और विशालिका घुटनों के बल पड़ी थीं। उनके शरीर से धुआँ निकल रहा था। मोहिनी ने अपनी गद्दी से उठकर उनकी ओर देखा। उसकी मुस्कान इस बार इतनी डरावनी थी कि उन योगिनियों का बचा-कुचा साहस भी जवाब दे गया।
"तो... मेरे रक्त-मोती उस बालक के कदमों की धूल बन गए?" मोहिनी ने मधुर स्वर में पूछा, पर उस मधुरता के पीछे कत्ल की बू थी।
उसने अपनी हथेली हवा में घुमाई। अधमरा और विशालिका की चीखें महल की छतों से टकराने लगीं। वे दोनों किसी मोमबत्ती की तरह धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर पिघलने लगीं। उनकी हड्डियाँ गल रही थीं और मांस काले कीचड़ की तरह फर्श पर बह रहा था। एक लंबी, रूह कंपा देने वाली आवाज़ गूँजी— "आ….आ…आ…आह.............!" और फिर सब कुछ शांत हो गया। फर्श पर केवल दो काली लकीरें बची थीं।
अब मोहिनी का धैर्य पूरी तरह समाप्त हो चुका था। उसने एक प्राचीन 'काला पात्र' (कटोरा) उठाया और उसमें बुराई का का जल भरा। जैसे ही उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया, महल मे चारों तरफ डरावनी और ना समझ आने वाली मंत्रोचारण क़ी आवाज़ गुंजने लगी, पात्र के भीतर का जल खौलने लगा और उसमें हेमंत की स्पष्ट आकृति उभर आई।
मोहिनी ने अपना काला लबादा ओढ़ा और महल से बाहर निकली। उसका चेहरा आज अलौकिक रूप से सुंदर लग रहा था, पर वह सुंदरता किसी ठंडी चिता जैसी निर्जीव और भयावह थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी बिजली कौंध रही थी। उसके चलते ही कंचन धरा की सूखी ज़मीन फटने लगी और उसके चारों ओर एक ऐसा काला मंडल था जो उजाले को भी निगल रहा था। हवाएँ अब गर्म होकर चलने लगी थीं, जैसे वे किसी को चेतावनी दे रही हों। वह काला कटोरा उसके हाथ में था, जिसके पानी में हेमंत का चेहरा अब लगातार कांप रहा था।
मोहिनी अब स्वयं आ रही थी। और उसके हर कदम के साथ शून्य-प्रस्थ का भाग्य बदलने वाला था।