अध्याय 1: सुनहरी राख का सवेरा
शून्य-प्रस्थ के क्षितिज पर जब सूर्य अपनी पहली किरणें बिखेरता है, तो वह केवल प्रकाश नहीं, बल्कि एक जादुई उत्सव होता है। यहाँ का प्रकाश हल्का केसरिया है, जो हवा में तैरते बारीक स्वर्ण-कणों से टकराकर पूरे आकाश को एक चमकते हुए रत्न में बदल देता है। यहाँ समय की धारा भी अलग ही वेग से बहती है; निवासियों के लिए बीस चक्रों का समय केवल एक ऋतु बीतने जैसा है। यौवन यहाँ सहस्रों वर्षों तक स्थिर रहता है, मानो आयु स्वयं इन लोगों के तेज से थम गई हो। गगनचुंबी पर्वतों से गिरते नीलमणि के रंग के झरने नीचे की घाटी में बने ऊँचे शंखनुमा पुष्पों पर गिरकर एक मधुर संगीत पैदा कर रहे थे। हवाओं में पारिजात और एक शीतल चंदन जैसी सुगंध घुली थी। इस असीम शांति और वैभव के बीच, स्वर्ण-शिलाओं से निर्मित 'कंचन धरा' का विशाल किला किसी अजय रक्षक की भाँति गर्व से खड़ा था। महल के भीतर के ऊँचे गलियारों में अगरबत्तियों का गाढ़ा धुआँ नक्काशीदार खंभों से लिपट रहा था। धूप और सुगंध का यह संगम अद्भुत था, पर आज इस सौंदर्य में एक अजीब सा भारीपन था, मानो यह समस्त सौंदर्य अपनी अंतिम साँसें ले रहा हो।
इसी वैभवशाली महल के मुख्य कक्ष में सम्राट सिद्धार्थ खड़े झरोखे से बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर एक ऐसी गंभीरता थी जो केवल आने वाले बड़े तूफानों से पहले दिखती है। वह जानते थे कि आज नियति ने उनके लिए कुछ और ही लिखा है। तभी रानी मैनावत ने कक्ष में प्रवेश किया। उनके तन पर रेशम और दुर्लभ तंतुओं से बुना हुआ एक लंबा 'उत्तरीय' था, जो फर्श पर किसी बहती नदी की तरह सरसरा रहा था। उनकी कटि पर रत्नजड़ित स्वर्ण की मेखला सजी थी और बाहुओं में मयूर पंख की आकृति वाले बाजूबंद उनकी राजसी गरिमा को बढ़ा रहे थे। उनकी गोद में नन्हा हेमंत सोया हुआ था। उस बालक की त्वचा कुंदन जैसी साफ़ थी और उसके मुख पर एक अलौकिक तेज था।
मैनावत को अपनी ओर आता देख सिद्धार्थ के चेहरे की कठोरता एक पल में पिघल गई। उन्होंने आगे बढ़कर बड़े प्रेम से मैनावत के माथे को चूमा। "आज तुम इस सुनहरी धूप से भी अधिक सुंदर लग रही हो, मैनावत," सम्राट ने अपनी आवाज़ को संयत रखते हुए कहा। उनकी आँखों में प्रेम और विदाई का एक मिला-जुला भाव था जिसे वह अपनी मुस्कान के पीछे छिपा रहे थे।
तभी, उस पवित्र शांति को चीरती हुई एक ऐसी गर्जना हुई कि शून्य-प्रस्थ का आकाश कांप उठा। एक भीषण चक्रवात उठा, जिसने देखते ही देखते कक्ष की नक्काशीदार खिड़कियों को झकझोर दिया। महल के बाहर खड़े प्राचीन विशाल वृक्ष तिनकों की तरह कांपने लगे। इसी हाहाकार के बीच एक सुरीली मगर तीखी हँसी गूँजी— "हा...हा...हा...हा!"
सिद्धार्थ के चेहरे का रंग उड़ गया, उन्होंने अपनी पत्नी को खुद के पीछे छुपाते हुए कहा, "यह... यह तो मोहिनी की हँसी लग रही है!"
हवा के एक झोंके के साथ महल की दीवारों के भीतर से वह गूँज उठी— "सही पहचाना सिद्धार्थ! मुझे कितना समझते हो तुम।" धुएं और धूल के गुबार के बीच से मोहिनी प्रकट हुई। माही देश की वह रानी, जिसकी शक्ति पिछले कुछ वर्षों से एक काले साये की तरह शून्य-प्रस्थ के देशों को निगल रही थी। उसकी सुंदरता किसी घातक रत्न जैसी थी; उसकी त्वचा में एक ठंडी चमक थी और आँखों में एक ऐसी क्रूरता जो किसी भी योद्धा का रक्त जमा दे। उसने काले मोतियों और सूक्ष्म सर्प-त्वचा से बना एक विचित्र परिधान पहन रखा था। आज वह कंचन धरा के पतन का उत्सव मनाने आई थी।
"मैनावत, जाओ! हेमंत को लेकर गुप्त मार्ग से अभी निकल जाओ!" सिद्धार्थ ने चिल्लाकर कहा।
"नहीं! मैं आपको इस स्थिति में छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी!" मैनावत ने दृढ़ता से कहा, उनकी आँखों में आंसू और गुस्सा दोनों थे। "हम साथ लड़ेंगे।"
"यह लड़ाई शस्त्रों की नहीं है, मैनावत! अब यहाँ हमारी शक्तियाँ भी काम नहीं कर रही है, तुम्हें जाना ही होगा। तुम्हें इस बालक के लिए जीना होगा। हेमंत ही कंचन धरा का भविष्य है, इसकी रक्षा करो!" सम्राट ने पहली बार कठोर स्वर में आदेश दिया और उन्हें उस गुप्त द्वार की ओर धकेला जो केवल संकट काल के लिए बनाया गया था,इसके बारे में मोहिनी को कुछ भी आता नहीं था। मैनावत ने एक अंतिम बार पीछे मुड़कर अपने पति को देखा और फिर अपने बच्चे को कसकर सीने से लगा लिया।
तीन दिन और तीन रातों के निरंतर सफर के बाद, मैनावत एक सुदूर घाटी में पहुँचीं। उनके वस्त्र धूल से भरे थे और वह पूरी तरह थक चुकी थीं। वह एक ऊँचे वृक्ष की जड़ के पास हेमंत को लेकर बैठ गईं। सामने का दृश्य अत्यंत मनमोहक था; एक छोटी सी नदी जिसके पत्थर जुगनुओं की तरह चमक रहे थे और पेड़ों पर लगे फल चाँदनी की तरह रोशनी बिखेर रहे थे। यहाँ की प्रकृति इतनी शांत और प्यारी थी कि मैनावत के भीतर मचे उथल-पुथल के साथ उसका एक अजीब विरोधाभास पैदा हो रहा था। उन्होंने हेमंत के मासूम चेहरे को देखा, जो इस बात से बेखबर था कि उसने अपना पिता और अपना साम्राज्य खो दिया है।
मैनावत ने लंबी साँस ली और घाटी के उस शांत सौंदर्य को निहारा। उन्हें नहीं पता था कि यह शांति उनके जीवन के सबसे कठिन अध्याय की केवल एक शुरुआत है।