सर्वभूतेषु
कमल चोपड़ा
देवियाँ थीं कि प्रगट नहीं हो रही थीं। हलवा-पूड़ी-छोले सब-कुछ तो तैयार कर चुकी थी विमला। इन्तजार था तो बस कन्याओं का। मुहल्ले में से पूजन के लिए नौ कन्याएँ जुटाना मुश्किल हो रहा था, लेकिन...उसके पति गुप्ताजी कभी इसके घर, कभी उसके घर जा-जाकर कन्याओं को आमन्त्रित कर रहे थे। गिने-चुने घरों में कन्याएँ थीं, जो थीं वो भी छोटी-छोटी लाल-लाल चूड़ियाँ पहने कभी इसके घर, कभी उसके घर आ-जा रही थीं। नवरात्रों का अन्तिम दिन था आज।आसपास के सभी घरों से टेपरिकॉर्डरों पर माता की भेंटों की ऊँची-ऊँची आवाजें आ रही थीं। पूरा माहौल श्रद्धा और भक्ति में डूबा हुआ था।पाँच कन्याएँ आ चुकी थीं। सामनेवालों की लड़की रिंकी को विमला ने आवाज देकर बुला लिया। शर्माजी की दोनों बेटियों को गुप्ताजी स्कूटर पर बिठाकर ले आये थे।"ये हुईं कुल आठ...होनी चाहिए नौ। एक और आ जाये तो...।""अब एक कहाँ से आये? पूजा ही तो करनी है।""नहीं, पूरी नौ होनी चाहिए।""छोड़ो, क्या फर्क पड़ता है?""बाद में कुछ हो-हवा गया तो...मुझे खामखाह का वहम रहेगा?""एक के हिस्से का परशाद निकालकर रख दो, बाद में किसी को दे देना, और नहीं तो मन्दिर भिजवा देना।""लेकिन...।"तभी रिंकी बोली, "आंटी...मैं एक लड़की को बुलाकर लाऊँ!""हाँ-हाँ...जा बुला ला।"कुछ देर में रिंकी नौवीं कन्या को बुलाकर ले आयी थी। एकसाथ नन्ही-नन्ही नौ देवियों को अपने घर आया देखकर विमला का चेहरा खिल उठा था। घर में बने छोटे-से मन्दिर में रखी माता की मूर्ति की पूजा करने लगी थी विमला।फ़र्श पर बिछी साफ़ चादर पर नन्ही देवियाँ आपस में फुसफुसा रही थीं, “मुझे ना, सिमरन आंटी ने ना ये चूड़ियाँ दीं...देखो...और साथ में पाँच रुपये भी!”“मुझे भी...और बैंकवाली आंटी ने भी मुझे दस रुपये दिये...।”“मेरे पास तो कुल बीस रुपये जमा हो गये।”“और मेरे पास सत्ताईस...खी...खी...।”उनकी खिलखिलाहट विमला की पूजा में संगीत का-सा आनन्द दे रही थी। थोड़ी पूजा करने के बाद विमला ने जयकारा लगाया, “बोल, सांचे दरबार की जय...बोल सच्चियाँ जोताँवाली माता तेरी सदा ही जय हो...!”जयकारा लगाते हुए कन्याएँ खिलखिला रही थीं। विमला और उसके पति ने मिलकर एक-एक करके सभी कन्याओं के पैर धोये और उन्हें एक लाइन में बैठा दिया। ‘जय माता दी, जय माता दी’, कहते हुए सभी कन्याओं के हाथ पर धागे बाँध, बारी-बारी से सबके सिरों पर छोटी-छोटी लाल चुनरियाँ ओढ़ाईं।रह-रहकर कच्ची धूप-सी पवित्र और मासूम-सी खिलखिलाहट गूँजने लगती। एक की हँसी थमती, तो दूसरी कन्या खिलखिलाने लगती।कन्याओं को तिलक लगाकर विमला ने नारियल फोड़ा। उसकी गरियाँ सभी कन्याओं को थमाईं और फिर सभी कन्याओं के आगे हलवा और पूड़ी-छोले रखने लगी—“लो परशाद ग्रहण करो, देवियो...।”कन्याएँ छोटे-छोटे टुकड़े तोड़कर खाने लगीं। बिना बात हँसी छूट रही थी कन्याओं की। और भी घरों से हलवा-पूड़ी खा चुकी थीं। देवियों को एकाध दाना और छोटा-छोटा पूड़ी का टुकड़ा खाता देखकर विमला ने कहा, “खाओ वई, परशाद खाओ।”“बस...और नहीं खाया जा रहा...।”“बाकी का घर ले जाके खाएँगे।”कुछ नहीं बोली विमला। गुप्ताजी कन्याओं को देने के लिए इधर-उधर से रेज़गारी इकट्ठी कर रहे थे।कन्याएँ हलवा-पूड़ी की पेपर-प्लेटें घर ले जाने के लिए लेकर उठने लगीं तो विमला ने कहा, “अरे रुको, रुको! दान-दक्षिणा तो लेती जाओ!”बारी-बारी सबको एक-एक दस का नोट और एक-एक रुपये का सिक्का देने लगी। ग्यारह रुपये लेकर हँसते हुए विमला को आशीर्वाद-सा देती हुई फूली नहीं समा रही थीं।नौवीं कन्या को ग्यारह रुपये भेंट करते हुए विमला की नजर उसके चेहरे पर पड़ी। अनजान-सा चेहरा लगा उसे। बड़े प्यार से उसने पूछा, “ये कन्या भवानी कहाँ से आयी है?”कन्या शर्माकर नीचे देखने लगी। विमला ने फिर पूछा, “कहाँ रहती हो कन्या भवानी! इस नन्ही देवी का नाम क्या है?”नौवीं कन्या ने घबराकर रिंकी की ओर देखा। रिंकी की खिलखिलाहट भी एकाएक बन्द हो आयी थी। हैरान थी विमला, इन्हें क्या हुआ?“आंटी, ये ना मेरी सहेली है। पिछली गली के कोनेवाले मकान में ऊपरवाली मंजिल पर रहती है। इधर नये-नये आये हैं किराए पर...मैं तो पहले से जानती हूँ इसको। ये ना मेरे साथ मेरी क्लास में पहले से पढ़ती है इसलिए...”बेहद भोले और मासूम से चेहरे पर नजर डाली विमला ने; प्यार उमड़ आया उस पर।“अच्छा...तो अपना नाम बता दो!”नौवीं कन्या ने बहुत झिझकते और झेंपते हुए कहा, “मेरा नाम नसीम है।”“नसीम?”बिजली का कोई नंगा तार छू गया विमला को। उसे लगा जैसे उसके समूचे वजूद पर कीड़े-मकोड़े रेंगने लगे हैं। क्षणभर को उसे लगा जैसे उससे कोई बहुत बड़ी भूल हो गयी है। कोई महापाप हो गया है जिसका उसे दण्ड भुगतना पड़ेगा...!उसके दिलोदिमाग पर आँधी-तूफ़ान सा चलने लगा था। कई आसमान फटने लगे थे, लेकिन बाहर ऐसा कुछ नहीं हो रहा था।गुप्ताजी का चेहरा भी एकाएक बदरंग हो आया था—ये कैसी भूल हो गयी? ये कैसी परीक्षा है माँ तेरी...मुजरिम की तरह मुँह झुकाए खड़ी थीं रिंकी और नौवीं कन्या। दोनों एक-दूसरे को कनखियों से देख रही थीं।कुछ नहीं सूझा था विमला को। एकाएक वह माता की मूर्ति की ओर मुँह करके एकदम उसके चेहरे को देखने लगी। माँ का चेहरा मुस्कुरा रहा था। माँ हँस रही है, माँ गुस्से में नहीं है। माँ नाराज नहीं खुश है, इसका मतलब जो हुआ उसमें कुछ भी गलत नहीं हुआ। विमला ने फिर से नौवीं कन्या को गौर से देखा। एकदम मासूम और भोला-सा चेहरा। एकदम भोली माँ की तरह एकदम मूर्ति की तरह। माँ की बालरूप मूर्ति पत्थर की नहीं प्राणवान मूर्ति! माँ...माँ...माँ...आँखों से आँसू बहने लगे विमला के। जाने कब उसने पास पड़े फूल उठाकर नौवीं कन्या के ऊपर चढ़ाए और बोली—कन्या भवानी तेरी जय!पवित्र संगीत की तरह नौवीं कन्या की खिलखिलाहट गूँजने लगी। रिंकी ने भी उसकी खिलखिलाहट में साथ दिया तो नौवीं कन्या ने कुछ पुष्प उठाकर विमला पर बरसाते हुए कहा—कल्याण हो!उनकी खिलखिलाहट का पवित्र संगीत पूरे वातावरण को खुशनुमा बना रहा था।