शाम ढलते ही जब भूपेंद्र और काया घर लौटे, तो घर की हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। भूपेंद्र के चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति और सुकून था जो महीनों बाद दिखा था, वहीं काया की चाल में अब वह मर्यादा और दबदबा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा आत्मविश्वास था। उसकी आँखों में एक चमक थी—ऐसी चमक जो किसी युद्ध को जीतने के बाद आती है।
वंशिका हॉल में बैठी सोफे पर अपनी फाइल देख रही थी। जैसे ही उसने इन दोनों को घर में प्रवेश करते देखा, उसकी पारखी नज़रों ने एक ही पल में सब कुछ भांप लिया। काया के उलझे हुए बाल, उसके चेहरे की वह लाली और भूपेंद्र का उसे देखकर मुस्कुराना—वंशिका को अपनी रूह तक कांपती हुई महसूस हुई।
काया रसोई की तरफ बढ़ी, तो रास्ते में वंशिका का पैर टेबल से थोड़ा बाहर था। पहले काया रुककर माफी माँगती थी, पर आज वह सीधे पैर बचाकर निकल गई और पलटकर एक ऐसी नज़र डाली जैसे कह रही हो, "अब ये जगह मेरी भी है।"
वंशिका का पारा चढ़ गया। उसने आवाज़ ऊँची की, "काया! मसाला पिसवाने में, सब्जी लाने में पूरा दिन लगा दिया? और ये क्या तरीका है बात करने का?"
काया ने पलटकर जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था कि भूपेंद्र बीच में आ गया। "बस करो वंशिका! थक कर आई है वो, दिन भर बाज़ार में धक्के खाए हैं। उसे अपना काम करने दो, तुम हर बात पर टोकना बंद करो।"
भूपेंद्र के स्वर में अब पति वाला प्यार नहीं, बल्कि एक रक्षक वाली कड़वाहट थी। वंशिका सन्न रह गई। उसने सासू माँ मनोरमा की ओर देखा कि शायद वे कुछ बोलेंगी, पर मनोरमा ने आज खामोशी की चादर ओढ़ ली थी। उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि उनके बेटे ने अब पूरी तरह पाला बदल लिया है। शिखा, जो अब तक वंशिका का साथ दे रही थी, चुपचाप अपने कमरे में चली गई। उसे पता था कि काया अब उसे भी अकेले में तंज कसने से नहीं चूकेगी।
वंशिका का दम घुटने लगा था। उसे लगा कि अब पानी सिर के ऊपर से गुज़र चुका है। वह अपने कमरे में गई और कांपते हाथों से अपने भाई और पिता को फोन लगाया। उसे उम्मीद थी कि उसका मायका हमेशा की तरह उसके पीछे ढाल बनकर खड़ा होगा।
"पापा... यहाँ सब खत्म हो रहा है। भूपेंद्र का उस नौकरानी के साथ चक्कर चल रहा है। माँ जी भी चुप हैं। मुझे आपकी मदद चाहिए," वंशिका फोन पर फूट-फूटकर रो पड़ी।
लेकिन दूसरी तरफ से जो जवाब आया, उसने वंशिका के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। उसके पिता ने ठंडे स्वर में कहा, "वंशिका, इस बार हम दखल नहीं देंगे। पहली गलती तुम्हारी है। तुमने उसे घर में घुसने ही क्यों दिया? और सच कहूँ तो, हम अब थक चुके हैं। पिछली बार जब तुम्हारा झगड़ा हुआ था, तो दो साल तक तुमने हमें और भूपेंद्र को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाए थे। हमारी बहुत बदनामी हुई थी।"
उसका भाई फोन लेकर बोला, "दीदी, बार-बार हम समाज में तमाशा नहीं बन सकते। तुमने अपनी आज़ादी और जिम के चक्कर में घर की डोर ढीली छोड़ दी। अब जो रायता फैला है, उसे तुम्हें खुद ही समेटना होगा। हमारे पास मत आना।"
फोन कट गया। वंशिका का आखिरी सहारा भी टूट चुका था। उसे अहसास हुआ कि जिस मर्यादा की वह दुहाई दे रही थी, उसी मर्यादा के नाम पर उसके अपनों ने ही उससे पल्ला झाड़ लिया था। वह अब इस घर में बिल्कुल अकेली थी—सामने एक ताकतवर सौतन, एक उदासीन पति और एक षड्यंत्रकारी सासू माँ।
वंशिका अभी फोन रखकर बैठी ही थी कि काया बिना दरवाज़ा खटखटाए कमरे में दाखिल हुई। उसके हाथ में पानी का गिलास था।
"दीदी, पानी पी लीजिये।" सुना है मायके वालों ने हाथ खींच लिए?" काया ने एक ज़हरीली मुस्कान के साथ पूछा। उसने मन ही मन कहा,"साहब सही कहते हैं, जब अपनी ज़मीन खिसकती है, तो सगे भी साथ छोड़ देते हैं। अब इस घर में रहना है, तो मेरी शर्तों पर रहना होगा।"
वंशिका ने काया की आँखों में देखा। वहां अब एक मालकिन खड़ी थी, और वंशिका... वह अब अपने ही घर में एक मेहमान बन चुकी थी।
शाम की धुंधलकी अब रात के स्याह अंधेरे में बदल चुकी थी। घर का वातावरण किसी श्मशान जैसी शांति ओढ़े हुए था, जहाँ हर साँस के साथ एक नई कड़वाहट घुल रही थी। काया अब उस बेसहारा नौकरानी के खोल से बाहर आ चुकी थी। वह भूपेंद्र के सामने तो अब भी वही 'भोली और सताई हुई अबला' बनने का नाटक करती, जिसे दुनिया और वंशिका मिलकर नोच लेना चाहती हैं, लेकिन भूपेंद्र की पीठ घूमते ही उसकी आँखों में एक शातिर मालकिन की चमक कौंध जाती।
मनोरमा देवी, जो खुद को इस घर की सुप्रीम कोर्ट समझती थीं, आज एक मूक दर्शक बनी हुई थीं। उनकी चतुराई उन्हें बता रही थी कि बेटा अब पूरी तरह काया के वश में है। उन्होंने देख लिया था कि भूपेंद्र के लिए अब काया केवल एक ज़रूरत नहीं, बल्कि एक ज़िद बन चुकी है। मनोरमा को अपने बेटे से रिश्ता नहीं बिगाड़ना था, क्योंकि वह जानती थीं कि अगर आज उन्होंने काया का विरोध किया, तो भूपेंद्र उन्हें भी घर से बाहर का रास्ता दिखा सकता है। उन्होंने शिखा को कोने में ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा, "शिखा, तू अभी के अभी अपने घर अपने पति के पास चली जा। यहाँ का माहौल अब तेरे रहने लायक नहीं रहा। काया अब वो काया नहीं रही जिसे तू दबा सके। अब तू यहाँ रुकेगी तो वह तुझे भी नहीं छोड़ेगी, और मैं तेरे भाई के सामने बेबस हो चुकी हूँ।" शिखा ने अपनी माँ की आँखों में पहली बार पराजय देखी। वह समझ गई कि अब यहाँ उसकी दाल नहीं गलने वाली। कुछ ही घंटों में, शिखा अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर चुपचाप घर से निकल गई। अब रणक्षेत्र में सिर्फ वंशिका, काया, मनोरमा, भूपेंद्र और वे मासूम बच्चे बचे थे।
वंशिका अपने अंधेरे कमरे में अकेले बैठी थी। पंखे की आवाज़ उसे किसी पुराने जख्म को कुरेदने जैसी लग रही थी। वह शून्य में ताकते हुए सोच रही थी—'गलती कहाँ हुई? कब और कैसे मेरी सत्ता मेरे ही हाथों से रेत की तरह फिसल गई?'
जबकि जवाब उसे पता था । शुरुआत में जिम जैसा चल रहा था अगर वैसा ही रहने देती तो इतनी दिक्कतें ही नहीं आती । समय ठीक था... मैनेजमेंट बढ़िया था। घर और जिम दोनो सम्भाल लेती थी...! लेकिन जिन में आने वाली रईस घरानों की महिलाओं की बातों में आकर और अपनी बढ़ती महत्वकांक्षाओं के चक्कर में उसने खुद ही लालच किया था। पहले दो लोगों का ही काम रहता था.. बच्चे स्कूल चले जाते थे, भूपेंद्र ऑफिस.. तो काम रहता ही नहीं था। वो आराम से जिम देख लेती थी। फिर दोपहर में बच्चे आते तो उन्हें सम्भाल लेती थी और फिर शाम को भूपेंद्र के आने के बाद वो बच्चे उसके हवाले कर फिर से जिम चली जाती थी। मगर उसे जल्द से जल्द ज्यादा पैसे कमाने थे... इसलिए जिम का टाइम बढ़ा दिया...। काम में दिक्कत कम थी.. लेकिन लोगों को दिखाना था कि वो काम नहीं करती, अपने रुपए से घर चला रही है और एक नौकरानी भी रखी हुई है फुल टाइम हाउस हेल्पर के रूप में। लोगों पर इंप्रेशन झाड़ना था उस समय। अगर वो उस समय ही सचेत रहती और घर काया के भरोसे नहीं छोड़ती तो शायद आज ये दिन नहीं देखना पड़ता।
"सही तो कहा था पापा ने..!" उसने मन ही मन सोचा। "पहली गलती मेरी ही थी। मैने एक नौकरानी को इतना बढ़ावा दिया ही क्यों? सबको उस पर निर्भर कर दिया और खुद भी हो गई।"
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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