Bhakt Prahlaad - 6 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 6

Featured Books
Categories
Share

भक्त प्रह्लाद - 6

विष्णु भक्त प्रह्लाद का जन्म

रानी कयाधू ने अब तक तीन पुत्रों को जन्म दिया था, जिनके नाम क्रमशः आह्लाद, अनुलाद और संह्लाद थे। बाद में देवर्षि के आश्रम में कयाधू ने अपने सबसे छोटे पुत्र को जन्म दिया, जिसका नामकरण प्रह्लाद के रूप में किया गया।

असुल-कुल में प्रह्लाद का जन्म लेना असुरों के लिए एक बड़ी दुर्घटना सिद्ध हुई। प्रह्लाद का जन्म असुरों के लिए एक ऐसी अनहोनी थी, जिसमें परमेश्वर का एक बड़ा रहस्य छिपा हुआ था। जिस हिरण्यकश्यपु का हृदय विष्णु के प्रति वैर-द्वेष से भरा हुआ था, उसी के यहाँ विष्णु भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ। यह बड़ी ही विचित्र बात थी।

ऐसा माना जाता है कि महान् आत्माएँ आती हैं तो उनके अवतरित होने के लक्षण किसी-न-किसी रूप में दिखाई देने लगते हैं और जो बुद्धिमान होते हैं, वे उन लक्षणों को तुरंत ताड़ लेते हैं। प्रह्लाद के जन्म के विषय में भी यही हुआ। जब प्रह्लाद रानी कयाधू के गर्भ में थे, उस समय कयाधू जी के मुखमंडल पर एक विचित्र से तेज की आभा स्पष्ट दिखाई देती थी। इस आभा को देखकर देवर्षि नारद समझ गए थे कि रानी कयाधू के गर्भ में जो संतान है, वह कोई महान् पुण्यात्मा है।

उन दिनों रानी कयाधू को विचित्र प्रकार के स्वप्न आते थे। कभी उन्हें दिखाई देता कि वे देवताओं से वार्तालाप कर रही हैं तो कभी दिखाई देता कि किसी रमणीय स्थान पर कुछ देवियों के साथ भ्रमण कर रही हैं। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि कोई देवता ही उनके गर्भ में जन्म लेने के लिए आया है। कभी वे सोचतीं कि इस बारे में उन्हें अपने पति हिरण्यकश्यपु को बताना चाहिए। फिर अगले ही क्षण वे यह सोचकर मौन हो जातीं कि उनके पति बड़े ही क्रूर स्वभाव के हैं। यदि उन्हें इस विषय में बताया गया तो कहीं वे उनके गर्भ को नष्ट न कर दें। बस, यही सोचकर वे अपने कदम पीछे खींच लेतीं।

एक दिन कयाधू ने पुरोहित को बुलाया और अपने साथ घटित हो रही विचित्र घटनाओं को उनसे कह दिया तथा इन घटनाओं के फल जानने की इच्छा प्रकट की। यद्यपि पुरोहित रहते तो थे असुरों के बीच, किंतु उनमें आसुरी गुण की प्रवृत्ति तनिक भी न थी। वे हर प्रकार के दुर्गण से बचे हुए थे। उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि वे इष्टदेव के रूप में विष्णु की पूजा-अर्चना किया करते थे, किंतु किसी को भी इसकी भनक तक न थी। सभी असुरों का यह विश्वास था कि वे हमारी भाँति विष्णु के परम बैरी हैं।

जब पुरोहित ने रानी कयाधू के मुख से उनके साथ घटित होने वाली घटनाओं के बारे में सुना तो उनकी आँखों से आँसू छलक उठे। उन्होंने कहा, “आप किसी भी प्रकार की कोई चिंता न करें। आपके गर्भ से परमात्मा की एक महान् विभूति का जन्म होने वाला है। इस संतान के कारण आपका वंश धन्य हो जाएगा। मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप इन बातों को किसी और के सम्मुख प्रकट न करें।”

इस प्रकार रानी कयाधू को सावधान कर पुरोहित अपने घर की ओर प्रस्थान कर गए।

इसी कालक्रम में असुरराज तपस्या करने हेतु चले गए। उनकी अनुपस्थिति में अच्छा अवसर जानकर देवराज इंद्र ने असुर नगरी पर आक्रमण कर कयाधू का हरण कर लिया, किंतु देवर्षि नारद ने कयाधू को मुक्त कराकर अपने आश्रम में शरण दी। यहीं पर प्रह्लाद का जन्म हुआ और वहाँ पवित्र वातावरण में प्रह्लाद के मन में श्रीहरि विष्णु की भक्ति का बीज प्रस्फुटित हुआ। तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने के उपरांत हिरण्यकश्यपु ने देवलोक पर विजय प्राप्ति की और देवर्षि के आश्रम से अपनी पत्नी और पुत्र को प्रसन्नतापूर्वक राजमहल में ले आया।

हिरण्यकश्यपु को वैसे तो अपने सभी बच्चों से अपार स्नेह था, किंतु वह प्रह्लाद को अधिक लाड़-प्यार करता था। प्रह्लाद में ऐसी आकर्षण शक्ति थी कि माता-पिता ही नहीं, बल्कि जो भी उसे देखता, वह उसकी ओर खिंचा चला आता था। गुलाब के समान गाल, गोरा रंग, घुँघराले बाल और अधिकांश समय होंठों पर खिली रहने वाली मुसकान, ऐसा था प्रह्लादजी का बाल व्यक्तित्व।

प्रह्लाद को एकांत अधिक प्रिय था। वे अन्य बच्चों की भाँति खेलने-कूदने की बजाय एकांत में समाधि लगाकर बैठना अधिक पसंद करते थे। फूलों की ओर देखते तो अपने आपसे ही प्रश्न करने लगते कि इन्हें किसने और क्यों बनाया? वे जो भी चीज देखते, उसके बारे में उनके मन में यही प्रश्न उठता। उनके मन में छोटी सी वस्तु के बारे में जानने-समझने की जिज्ञासा दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही थी।

जब प्रह्लाद के मन की विकलता बढ़ती गई तो एक दिन उन्होंने नारद का ध्यान किया। अभी वे ध्यानमग्न ही थे कि 'नारायण' का जाप करते हुए देवर्षि वहाँ पधार गए।

देवर्षि के आगमन का आभास पाते ही प्रह्लाद ने आँखें खोलीं और उठकर उन्हें अभिवादन किया। शीश पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए देवर्षि बोले, “वत्स प्रह्लाद! कहो, क्या कष्ट है ?”

“भगवन्! प्रायः मन असमंजस की स्थिति में जकड़ा हुआ है। कुछ भी निर्णय कर पाना मेरे लिए असंभव सा लगता है।” प्रह्लाद मन की गाँठे देवर्षि के सामने खोलते हुए बोले, “ऐसा क्यों होता है कि कोई भी बात न उचित लगती है और न ही अनुचित, बल्कि वही बात कभी उचित होते हुए भी अनुचित लगती है। इसके विपरीत कभी कोई बात स्पष्ट रूप से अनुचित होने पर भी उचित मानने की इच्छा होती है। ऐसा क्यों होता है, भगवन् ? यह मेरे साथ भाग्य का कौन सा खेल है ? कृपा करके मुझे इस उलझन से निकालिए।”

“वत्स! यह भाग्य का कोई खेल नहीं, कोई विडंबना नहीं, बल्कि मन के आवेग हैं, जो समय और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। इन्हें योगाभ्यास के द्वारा ही पराजित किया जा सकता है, अन्यथा ये आवेग बढ़ते हुए कभी-कभी निराशा हताशा और गहन अवसाद की स्थिति को भी आमंत्रित करने लगते हैं।” देवर्षि नारद प्रह्लाद को समझाते हुए बोले, “किंतु यह तो बताओ, तुम्हारे सामने ऐसी स्थिती कब-कब उत्पन्न होती है ?”

“केवल तभी, जब मैं प्रकृति की गोद में विचरण कर रहा होता हूँ, जब मैं प्राकृतिक वस्तुओं को देखकर अभिभूत हो रहा होता हूँ।” प्रह्लाद ने अपने मन के आवेग को स्पष्ट करते हुए कहा, “भगवन्! एकाएक तभी कोई मेरे भावावेग में व्यवधान डालते हुए समझाने लगता है कि उपवन में जो निराली छटा बिखरी हुई है, वह भगवान् हिरण्यकश्यपु अर्थात् मेरे पिता की देन है, मोर में जो तारावालियाँ प्रदीप्त होकर मेरा मन हर्षाने लगती है और मैं एकटक उन्हें देख रहा होता हूँ, तो फिर कोई कहता है कि तारावालियों में जो प्रकाश प्रतिबिंब हो रहा है, उसका स्रोत मेरे पिता हैं और सूर्योदय होने पर चिड़ियों की चहचहाहट से जब मन आह्लादित होकर नृत्य करने को होता है, तो सूर्योदय का कारण तथा चिड़ियों की चहचहाहट की मृदुलता में भी मेरे पिता के प्रताप का ही गुणवान किया जाता है, किंतु... ।” “किंतु क्या वत्स ?” देवर्षि के अधरों पर महीन सी मुसकान अठखेलियाँ करने लगी, “इन सभी तथ्यात्मक विषयों के बारे में कैसा संदेह ? कैसा अविश्वास ? तुम्हें अपने विवेक से प्रश्न करना चाहिए कि जो कुछ तुम्हें बताया समझाया जाता है, वह उचित है अथवा अनुचित!”

“भगवन्! मैं ऐसा विवेक कहाँ से लाऊँ ?”

“वत्स! हर प्राणी के मन की गहराइयों में परमेश्वर निवास करता है। उन्हीं गहराइयों से होकर जिस प्रश्न का उत्तर बाहर आता है, वह देखने में मनोरम, सुनने में कर्णप्रिय और चखने में मृदुल होता है। वही सत्य है, परम है और प्रिय है। प्रश्न भले ही कैसा भी क्यों न हो, यदि उसका उत्तर मन की गहराइयों से निकलकर बाहर आएगा, तो कभी निराश नहीं करेगा। मन की इसी गहराई का नाम विवेक है, वत्स!” देवर्षि प्रह्लाद को समझाते हुए बोले, “और विवेक एवं मन की गहराइयों को कहीं से लाया नहीं जाता। यह प्रत्येक प्राणी के साथ परमात्मा-प्रदत्त बहुमूल्य उपहार है। इसे अभ्यास के द्वार, निरंतर प्रयोग के द्वारा तेज, धारदार और जाग्रत् तो किया जा सकता है, किंतु कहीं अन्यत्र से उत्पन्न नहीं किया जा सकता। यदि इसका प्रयोग कम हो जाए तो धीरे-धीरे यह कुंद, कुंठित और सुसुप्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है और अंततः प्राणी विवेकहीन होकर सभी निर्णय अनुचित लेने लगता है। उसके विवेक पर माया, मोह और लिप्सा का गहन कुहासा आच्छादित हो जाता है। अतः वत्स! विवेक ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा उचित-अनुचित का निर्णय होता है, परमेश्वर की प्राप्ति होती है और अंततः जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाकर प्राणी परमधाम की यात्रा संपन्न करता है।”

“भगवन्! आपने वात्सल्यपूर्वक विवेक का जो ज्ञान मुझे प्रदान किया, उसके लिए मैं आजीवन आपका परम आभारी रहूँगा।” प्रह्लाद ने करबद्ध होकर शीश झुकाते हुए कहा, “कुछ समय से मन के किसी कोने में एक जिज्ञासा बलवती हो रही है। कृपया उसे शांत करके मेरा मार्गदर्शन कीजिए।”

“हाँ-हाँ, कहो वत्स!” देवर्षि प्रहलाद के बालमन को प्रोत्साहित करते हुए बोले, “क्या पूछना चाहते हो ?” प्रह्लाद ने इस बार एक जिज्ञासु की भाँति प्रश्न किया, “भगवन्! मुझे जो यह सब दिखाई दे रहा है, क्या है ? इसका उद्देश्य क्या है ? इसका आदि व अंत कहाँ है?”

देवर्षि ने मुसकराते हुए कहा, “वत्स! तुम्हारे मन में जो इस तरह की जिज्ञासा है, उसका भेद पाना इस समय संभव नहीं। सृष्टि की रचना, उसकी स्थिति और विनाश-सबकुछ भगवान् की इच्छा से ही होता है। इस सबके बारे में जानने-समझने के लिए तुम्हें भगवान् की शरण में जाना होगा, क्योंकि वे ही तुम्हारी प्रत्येक समस्या का समाधान कर सकते हैं।”

इतना कहकर और प्रह्लाद को आशीर्वाद देकर देवर्षि नारद वहाँ से प्रस्थान कर गए। प्रह्लाद के मन में उनकी बात भली-भाँति बैठ गई। उन्होंने निश्चय कर लिया कि अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए वे भगवान् की शरण में अवश्य जाएँगे।

दूसरी ओर देवलोक पर आधिपत्य स्थापित करने के बाद भी हिरण्यकश्यपु का प्रतिशोध शांत नहीं हुआ था। श्रीहरि विष्णु का नाम उसकी आँखों, कानों और हृदय में तीक्ष्ण शूल की भाँति चुभ रहा था। इस शूल की चुमन की पीड़ा रह-रहकर निरंतर असुरराज के तन-मन को व्यथित कर रही थी। वह किसी भी प्रकार विष्णु से अपने भ्राता हिरण्याक्ष के वध का प्रतिकार चाहता था। उसके प्रतिशोध का ज्वालामुखी तभी शांत हो सकता था, जब वह देवलोक की भाँति श्रीहरि विष्णु को भी परास्त करके अपना संपूर्ण वर्चस्व स्थापित कर पाता। वह प्राय: इसी ऊहापोह में रहता कि किस प्रकार ऐसा अवसर प्राप्त हो, जिससे विष्णु को परास्त किया जा सके। वह इस बात को अपने लिए बड़ी चिंता का विषय मानता था कि आज तक उसका कभी भी विष्णु से सामना नहीं हुआ था। वह प्रायः यह सोच-सोचकर चिंतित रहता था कि विष्णु को कहाँ खोजे, किस प्रकार उनसे युद्ध का आह्वान करे और उस युद्ध में उन्हें परास्त करे।

एक दिन उसने अपने सेनापति से कहा, “इल्वल! देवताओं का रक्षक विष्णु कहीं दिखाई क्यों नहीं दे रहा है? देवताओं से युद्ध के समय भी वह उनकी रक्षा के लिए नहीं आया।”

“महाराज! ऐसा प्रतीत होता है कि विष्णु आपकी शक्ति से भयभीत होकर कहीं जा छिपा है।” इल्वल परिहास करते हुए बोला।

“परंतु हम विष्णु को इतनी सरलता से छिपने नहीं देंगे।” हिरण्यकशिपु दाँत किटकिटाते हुए बोला, “उसने हमारे भाई हिरण्याक्ष का वध किया है, जिसका प्रतिशोध हम अवश्य लेंगे।”

कुछ देर तक वातावरण शांत रहा, फिर एकाएक भयंकर गर्जना करते हुए हिरण्यकश्यपु बोला, “इल्वल...।” “जी महाराज!” इल्वल धीरे से बोला।

“संपूर्ण सृष्टि में गुप्तचरों का जाल फैला दो और यह पता करो कि विष्णु है कहाँ ?” हिरण्यकश्यपु ने हुंकार भरते हुए कहा, “जब तक हम उससे अपना प्रतिशोध नहीं ले लेते, तब तक हम एक क्षण के लिए भी शांत नहीं बैठेंगे।” निकट ही खड़े एक अन्य सेनापति नमुचि ने अपना सुझाव प्रस्तुत करते हुए कहा, “महाराज! विष्णु को ढूँढ़ने का गुप्तचरों के अतिरिक्त एक अन्य मार्ग भी हो सकता है।”

“किस मार्ग की बात कर रहे हो, नमुचि?” हिरण्यकश्यपु उत्तेजित स्वर में बोला।

“आप यह तो भली-भाँति जानते ही हैं कि विष्णु अपने भक्तों से बड़ा प्रेम करता है। ऐसा माना जाता है कि जब भी उसके भक्तों पर कोई अत्याचार किया जाता है तो वह दौड़कर उनकी रक्षा के लिए आ जाता है।” “हाँ, सुना तो यही जाता है, किंतु नमुचि!” हिरण्यकशिपु गंभीर स्वर में बोला, “जब हमने देवलोक पर आक्रमण किया, विष्णु के परमप्रिय देवताओं को युद्ध में परास्त किया, उन्हें विभिन्न प्रकार के दंड एवं आरोप लगाए, तब भी विष्णु उनकी रक्षा हेतु सामने नहीं आया।”

“आपका कथन सत्य है, महाराज!” सेनापति इल्वल हिरण्यकशिपु के कथन के प्रति स्वीकारोक्ति प्रकट करते हुए बोला, “किंतु हमें देवभक्तों और सनातन धर्मप्रेमियों पर अनाचार और अत्याचार की बाढ़ लानी होगी। उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताडित करना होगा। उनके पवित्र अन्न-जल और दूध-दही को नष्ट करके आसुरी खाद्य पदार्थ रक्त-मांस का प्रसार तथा देवालयों को मदिरालयों में परिवर्तित करना होगा। ऐसा करने से संभवतः विष्णु पर एक गुप्त एवं भारी प्रहार होगा, जो उसे निश्चय ही अपने गुप्त निवास से बाहर आने के लिए प्रेरित करेगा।”

“वाह इल्वल, वाह! हिरण्यकशिपु प्रशंसात्मक स्वर में बोला, “हम मान गए तुम्हारी महत्त्वाकांक्षी योजना को! इस योजना के द्वारा तुमने एक तीर से दो अचूक लक्ष्यों का बेधन किया है। देवभक्तों और सनातन धर्मप्रेमियों को प्रताड़ित कर असुरी प्रवृत्ति का वर्चस्व तो फैलेगा ही और यदि इससे आवेशित होकर हमारा परम शत्रु विष्णु हमारे सम्मुख आ गया तो आनंद ही आ जाएगा। ऐसा ही करो, ताकि असुरलोक के साथ-साथ पृथ्वीलोक और देवलोक में भी आसुरी प्रवृत्तियों का ही तांडव हो।”

“ऐसा ही होगा, महाराज!” सेनापति इल्वल और नमुचि ने शीश झुकाकर असुरराज का आदेश शिरोधार्य किया।