Divine Portion (An Invisible Rise) - 2 in Hindi Motivational Stories by Anil singh books and stories PDF | दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 2

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दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 2

अतीत के घाव और वो तीन केले



बलुआ पत्थर की ठंडी सीढ़ियाँ रुद्रांश की रीढ़ में सिहरन पैदा कर रही थीं, लेकिन उसने सिकुड़ने की कोशिश नहीं की। हवा में सुबह की ओस और रात की बुझी हुई आरती की राख की महक घुली थी। उसकी नज़रें स्थिर थीं। उसने एक नज़र नीचे बसे उस गाँव की ओर देखा, जहाँ उसका घर था—नहीं, वह 'घर' नहीं, बल्कि ईंट-गारे और ताने-उलाहनों से बुना एक ऐसा पिंजरा था जहाँ उसका बचपन घुट-घुट कर मर चुका था। उसने अपनी गर्दन घुमाकर पीछे मंदिर के शांत प्रांगण को देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे कहाँ सुकून मिलता है। न नीचे की दुनिया उसे अपनाती थी, न ऊपर वाला अब तक उसकी सुन रहा था।

वह अनमने मन से वहीं सीढ़ी पर टिका रहा। उसका शरीर भले ही वर्तमान में था, लेकिन उसका मन अतीत की उन पथरीली गलियों में नंगे पैर भटकने लगा था, जहाँ सिवाय चुभन के और कुछ नहीं था।
"सोलह साल..." उसके सूखे होंठों से यह शब्द एक थकी हुई सांस के साथ बाहर गिरे। सोलह साल हो गए थे उस मनहूस घड़ी को बीते। रुद्रांश को आज भी धुंधला-सा याद है, जब माँ की चूड़ियों की खनक पूरे घर में गूंजती थी, तो वह इस घर का कोई फालतू सामान नहीं, बल्कि एक 'राजकुमार' था। तब पिता दीनानाथ की आँखों में उसे देखकर वह चमक आती थी जो किसी गरीब को गड़ा हुआ खजाना मिलने पर आती है। घुटने छिलने पर जब खून की एक बूंद भी निकलती, तो माँ के चेहरे की हवाइयाँ उड़ जाती थीं। पिताजी अगर कभी ऊंची आवाज़ में डांट भी देते, तो माँ अपने आंचल का घेरा बनाकर शेरनी की तरह बीच में आ जाती थीं।
"दीनानाथ जी! खबरदार जो मेरे बेटे को कुछ कहा," माँ की वह झिड़की और फिर हाथों से मसला हुआ दाल-चावल का निवाला—सब एक टूट चुके सपने जैसा लगता था।
लेकिन फिर नियति ने अपनी बिसात बिछाई। माँ के जाते ही जैसे किसी ने रुद्रांश के हिस्से की धूप ही छीन ली। माँ की चिता की राख में अभी गर्माहट बाकी ही थी कि पिता का व्यवहार बर्फ की तरह ठंडा पड़ने लगा। दीनानाथ के मन में यह बात घर कर गई थी कि अगर रुद्रांश न होता, या वह बीमार न पड़ता तो शायद उनकी पत्नी का ध्यान नहीं बंटता और वह आज ज़िंदा होतीं। यह एक ऐसा खोखला तर्क था जिसे शोक में डूबे एक कमज़ोर इंसान ने अपनी ढाल बना लिया था।
और फिर आई 'वह'—शीला, उसकी सौतेली माँ।
शुरुआत के कुछ महीने तो खामोशी में बीत गए, लेकिन धीरे-धीरे शीला के मन का जहर उसकी जीभ पर आने लगा। थाली में रोटियों की गिनती कम होने लगी, सर्दियों में उतरन स्वेटर मिलने लगे और फिर एक दिन चुपचाप उसके हाथों में स्कूल के बस्ते की जगह जूठे बर्तन पकड़ा दिए गए। राख और मिट्टी से मांज-मांज कर उसकी हथेलियों की लकीरें तक घिसने लगी थीं। रुद्रांश की सोच का दायरा घर के दूसरे हिस्से की ओर मुड़ा। वहाँ दादा-दादी थे। उनके चेहरों पर झुर्रियां और आँखों में एक ऐसी लाचारी थी जो उन्हें ज़िंदा लाश बना देती थी। वे पूरी तरह से छोटे चाचा पर आश्रित थे। चाचा का मिजाज बारूद जैसा था और दीनानाथ से उनकी ज़मीन की मेड़ को लेकर हमेशा ठनी रहती थी।
दादा-दादी को डर था कि अगर वे रुद्रांश के पक्ष में बोले, तो छोटे बेटे की चौखट से भी निकाल दिए जाएंगे। रुद्रांश को याद आया, एक रात जब दादी कांपते हाथों से उसे अपने पल्लू में छिपाकर गुड़ की एक ढेली दे रही थीं, तो उनकी आँखों के कोरों से पानी बहकर झुर्रियों में समा गया था। बुढ़ापे की उस बेबसी ने उनकी ममता का गला घोंट दिया था।
चाचा के बच्चे भी उस जहर को पीकर ही बड़े हो रहे थे जो बड़ों ने हवा में घोल रखा था। आँगन में खेलते वक्त वे जानबूझकर रुद्रांश के पैरों में अड़ंगी लगा देते। और जब रुद्रांश धूल झाड़ते हुए पलटता, तो वे झूठा रोना शुरू कर देते। फिर क्या था? चाचा और चाची पैर पटकते हुए आते, "अरे देखो! इस मनहूस ने हमारे फूल जैसे बच्चों को मारा है!" यह बात दीनानाथ और शीला तक पहुँचती। बिना कोई सवाल किए, दीनानाथ के हाथ की मोटी चमड़े की बेल्ट रुद्रांश की पीठ पर तब तक बरसती जब तक उसके रोने की आवाज़ सिसकियों में नहीं बदल जाती। वह अँधेरे कमरे के कोने में घुटनों में सिर देकर सुबकता रहता, लेकिन कोई उन पपड़ी जमे आंसुओं को पोंछने नहीं आता।
ननिहाल की याद आते ही उसके सीने में एक भारीपन सा उठा। माँ के जाने के बाद मामा-मामी का आना भी कम होते-होते शून्य हो गया था। कभी जो मामा उसे हवा में उछाल कर हंसाया करते थे, अब उनके लिए वह शायद एक बोझिल याद बन गया था। शायद वे दीनानाथ की कड़वाहट से बचना चाहते थे। सालों बीत गए, उस चौखट से कोई चिट्ठी तक नहीं आई।
"अकेला... मैं हमेशा से अकेला ही तो था," उसने मुट्ठी इतनी कस ली कि गादिया सफेद पड़ गए।
लेकिन आज कुछ अलग था। इन पुरानी दर्दनाक यादों के नाखूनों को खुरचने के बावजूद, उसे वह पुराना, सड़ा हुआ डर महसूस नहीं हो रहा था। आम तौर पर, रात भर बाहर रहने के बाद सुबह घर का खयाल ही उसके हलक को सुखा देता था। उसे शीला की गंदी गालियों और पिता की बेरुखी का खौफ होता था। लेकिन आज? आज उसके सीने में एक अजीब सी गहरी शांति थी। रात गुफा में जो हुआ, वह उसे पूरी तरह याद तो नहीं था, लेकिन उसकी रगों में बहने वाला खून जैसे अपनी तासीर बदल चुका था। वह खुद को किसी मार खाए हुए कुत्ते की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे योद्धा की तरह महसूस कर रहा था जो बस कुरुक्षेत्र में उतरने से पहले अपना गांडीव कस रहा हो।
तभी उसके पेट के अंदर एक तेज़ ऐंठन उठी—जैसे किसी ने अंदर गीला तौलिया निचोड़ दिया हो।
रुद्रांश की विचारों की तंद्रा टूटी। उसने बेसाख्ता अपने पेट पर दोनों हाथ दबा लिए। कल दोपहर की दो जली हुई रोटियों के बाद से अन्न का एक दाना हलक के नीचे नहीं गया था। रात की पिटाई के बाद दर्द ने भूख को दबा दिया था, लेकिन अब सुबह की ताज़ी हवा ने जठराग्नि को भड़का दिया था।
उसने अपनी पैंट की सिलाई उधड़ी हुई जेब टटोली। वही पुराना सन्नाटा।
"घर गया तो शायद लातें ही मिलें, और यहाँ... आज तो मंगलवार भी नहीं है जो प्रसाद बंट रहा हो," वह अपने होंठ चबाने लगा।
वह अभी खाली पेट को शांत करने के लिए पानी पीने की सोच ही रहा था कि पीछे से एक भारी, लेकिन चंदन सी शीतल आवाज़ आई।
"रुद्रांश? बेटा, यहाँ ठंड में सिकुड़े बैठे हो?"
रुद्रांश ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। पंडित हरिओम जी खड़ें थे। चेहरे पर सफेद दाढ़ी और आँखों में वह ठहराव जो किसी गहरे कुएं के पानी में होता है। पूरे गाँव में शायद यही एक शख्स थे जो उससे बात करते समय उसे 'अछूत' नहीं समझते थे। रुद्रांश अक्सर मंदिर के पीतल के घंटे और दीये मांजने में उनकी मदद कर दिया करता था।
पंडित जी के हाथ में पीतल की छोटी सी थाली और झोला था। उनके पास आते ही चंदन और गेंदे के फूलों की एक भीनी महक रुद्रांश की नाक से टकराई।
"मैं कब से देख रहा हूँ, तुम यहाँ पत्थर की मूरत बने बैठे हो," पंडित जी पास की सीढ़ी पर बैठ गए, उनके घुटनों से एक हल्की सी 'कड़क' की आवाज़ आई। "तुम्हें पता है, नीचे तुम्हारे दादा-दादी बहुत परेशान हैं। सुबह-सुबह वे इधर ही आ रहे थे, पर घुटनों के दर्द ने जवाब दे दिया। उनकी जान अटकी है तुममें, बेटा।"
रुद्रांश ने एक फीकी, कड़वी मुस्कान के साथ कहा, "वे परेशान तो हैं पंडित जी, पर लाचार हैं। बाकी किसी को क्या फर्क पड़ता है कि मैं रात भर किस गटर में पड़ा था।"
पंडित जी की पारखी नज़रों ने रुद्रांश के धंसे हुए गालों और आँखों के नीचे के काले घेरों को एक पल में पढ़ लिया। उन्होंने पूछा, "रात भर कहाँ थे? घर नहीं गए?"
रुद्रांश की मुट्ठी फिर से कस गई। "घर तो इंसानों का होता है। मुझे तो कल शाम को ही धक्के मारकर निकाल दिया गया था। बस... यहीं भटक रहा था। मंदिर के पीछे..." उसने गुफा का ज़िक्र निगल लिया। कौन यकीन करता उस दिव्य अहसास पर? "यहीं सो गया था।"
पंडित जी ने एक लंबी, गहरी सांस छोड़ी। "दुनिया बहुत कठोर है, मेरे बच्चे। लेकिन याद रखना, काल का पहिया जब घूमता है, तो रंक को राजा और राजा को रंक बना देता है। ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होती।"
उन्होंने अपने झोले में हाथ डाला और तीन बड़े, पीले केले निकाले। उन पर कुमकुम के लाल छींटे पड़े थे।
"ये लो," उन्होंने केले रुद्रांश की ओर बढ़ाए। "महादेव का भोग है। तेरा चेहरा चीख-चीख कर बता रहा है कि पेट में आग लगी है।"
रुद्रांश का हाथ बीच में ही ठिठक गया। उसका स्वाभिमान दीवार बनकर खड़ा हो रहा था, लेकिन अंदर की ऐंठन उसे झुकने पर मजबूर कर रही थी। 'अतिथि देवो भव'—शायद ईश्वर ने खुद इस पुजारी के रूप में उसकी भूख का इंतज़ाम किया था।
"खा ले पगले, महादेव का प्रसाद है," पंडित जी ने उसके रूखे बालों पर अपना खुरदरा हाथ फेरा।
रुद्रांश ने केले लिए। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। पहला निवाला हलक से नीचे उतरते ही उसे लगा जैसे सूखे हुए खेत में पहली बारिश की बूंद गिरी हो। वह बिना ज्यादा चबाए उसे निगलने लगा। खाते-खाते उसकी आँखों की कोरें भीग गईं। एक तरफ वह पिता था जिसका अपना खून होकर भी उसने उसे भूखा सड़क पर फेंक दिया था, और दूसरी तरफ यह इंसान, जिससे कोई नाता नहीं, फिर भी वह उसके चेहरे की भूख पढ़ गया।
केले खत्म करने के बाद, रुद्रांश ने अपनी मैली शर्ट से मुँह पोंछा और सीधे पंडित जी के पैरों पर झुक गया। उसने उनके पैर छुए—यह सिर्फ आदर नहीं, बल्कि एक अनाम एहसान का बोझ था।
"आप सच में अंतर्यामी हैं, पंडित जी," उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कंपन थी। पंडित जी ने उसे कंधों से पकड़ कर उठाया। "अंतर्यामी तो वो कैलाशपति हैं, बेटा। मैं तो बस उनका एक छोटा सा उनका भक्त हूँ। लेकिन एक बात गांठ बांध ले... सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है। तेरी आँखों में आज मुझे जो ठहराव और आग दिख रही है न... वो कल तक नहीं थी। तेरे अंदर का कोई डर आज मर चुका है।"
रुद्रांश के कान खड़े हो गए। क्या इस पुजारी को भी उसके अंदर का वह 'दिव्य अंश' महसूस हो रहा था?
"अब मैं चलता हूँ, पंडित जी," रुद्रांश ने गहरी सांस भरते हुए कहा, "दादा-दादी परेशान होंगे, उन्हें जाकर चेहरा दिखा दूँ। नाहक ही रो-रोकर अपनी आँखें फोड़ लेंगे।"
"जा बेटा, शिव तेरा मार्ग प्रशस्त करें," पंडित जी ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया।
रुद्रांश ने सीढ़ियाँ उतरना शुरू किया। उसके पैरों में अब कल रात वाली वह लड़खड़ाहट नहीं थी। जूतों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। वह उसी ईंट-गारे के नर्क में वापस जा रहा था, लेकिन इस बार वह मार खाने वाला 'बेचारा रुद्रांश' नहीं था। उसके भीतर की आग ने अब एक 'दिव्य अंश' का रूप ले लिया था—एक ऐसी चिंगारी जो अब किसी के पैरों तले नहीं कुचलने वाली थी। कुरुक्षेत्र वही था, कौरव भी वही थे, लेकिन सामने खड़ा योद्धा अब अपनी नियति खुद लिखने को तैयार था।