मंदिर की ठंडी सीढ़ियाँ उतरते समय रुद्रांश की देह का वजन जैसे हवा हो गया था। कल तक जो लड़का अपनी ही परछाई से कतराकर चलता था, आज उसकी रीढ़ एकदम सीधी थी और चौड़े कंधों में एक अजीब सा ठहराव था। उसकी आँखों में वह पुरानी सहमी हुई धुंध छंट चुकी थी; उसकी जगह एक ठंडी, बेखौफ चमक ने ले ली थी। उसके जूतों के पत्थरों पर पड़ने की आवाज़ में अब कोई हड़बड़ाहट नहीं, बल्कि एक तयशुदा लय थी।
पहाड़ी से नीचे उतरकर जैसे ही उसने गाँव की धूल भरी पगडंडी पर कदम रखा, सामने से उसका चचेरा भाई, राहुल आता दिखाई दिया। राहुल के माथे की नसें तनी हुई थीं। वह पास आया और हाथों को हवा में झटकते हुए झुंझलाते हुए बोला, "अरे वाह! नवाब साहब चले आ रहे हैं। तेरी चाल तो देखो, जैसे कहीं के राजा-महाराजा हों। वहाँ घर पर बुड्ढा-बुड्ढी ने 'नाक में दम कर रखा है' कि जा बड़े भाई को ढूंढकर ला। और तू यहाँ ऐसे टहल रहा है जैसे 'घोड़े बेचकर सोया' हो। तुझे ज़रा भी परवाह है कि बुड्ढा-बुड्ढी कितना परेशान हैं?"
रुद्रांश के कदम नहीं रुके। उसने राहुल की आँखों में सीधे देखा—बिना पलक झपकाए। पहले वह राहुल की तेज़ आवाज़ से सहमकर अपनी उंगलियां चटकाने लगता था, लेकिन आज उसने राहुल को ऐसे देखा जैसे कोई गहरी नदी सतह के शोर को अनसुना कर रही हो। बिना कोई जवाब दिए, रुद्रांश के होंठों पर एक शांत, लगभग सर्द मुस्कान तैर गई और वह राहुल को अनदेखा करते हुए उसके कंधे के पास से खामोशी से गुज़र गया। राहुल का मुंह खुला का खुला रह गया, वह हक्का-बक्का होकर उसे जाते हुए देखता रह गया।
घर के जंग लगे लोहे के दरवाज़े के पास पहुँचते ही रुद्रांश ने देखा कि दादा और दादी सीमेंट के उखड़े हुए चबूतरे पर बैठे थे। दादा जी के कांपते हाथों में उनकी पुरानी लाठी थी और दादी की सूनी आँखें नुक्कड़ को ही घूर रही थीं।
रुद्रांश को देखते ही दादा जी लाठी के सहारे खड़े होने की कोशिश में लड़खड़ाए।
"रुद्रांश!" दादी की आवाज़ गले में ही फंस गई।
वे दोनों लपककर उसके पास आए। दादी ने उसे गले लगा लिया। उनकी सूखी हथेलियों की खुरदरी छुअन रुद्रांश की पीठ पर महसूस हुई। दादी फफक कर रो पड़ीं। "कहाँ चला गया था बेटा? हमारा तो 'कलेजा मुंह को आ गया था'। रात भर इन आँखों की पलकें नहीं झपकीं। अगर तुझे कुछ हो जाता तो हम कैसे जीते?"
रुद्रांश ने दादी के चेहरे पर ढुलकते गर्म आंसुओं को अपनी उंगलियों से पोंछा और शांत स्वर में कहा, "माँ ने मुझे घर से निकाल दिया था दादी। अब आप ही बताओ, जिसका कोई अपना घर न हो, वह कहाँ जाए? बस, ऊपर शिव मंदिर के ठंडे पत्थरों पर ही रात काट ली।"
उसकी बात खत्म भी नहीं हुई थी कि आंगन के अंदर से भारी कदमों की आहट आई। शीला बाहर निकल आई। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में कसकर खोंसा हुआ था और उसकी आँखों में एक अजीब सी चिढ़ थी।
"अजी सुनिए जरा!" शीला ने मोहल्ले की खुली खिड़कियों की तरफ देखकर चिल्लाना शुरू किया। "लाडसाहब आ गए? और आते ही मेरी शिकायतें शुरू? अरे, पूरे गाँव में ढिंढोरा पिटवा दे कि मैं डायन हूँ, मैं तुझे मारती-कूटती हूँ। यह क्यों नहीं बताता कि तूने घर में चोरी की थी? अब मुंह में दही जम गया है?"
दादा जी ने अपनी लाठी ज़मीन पर ज़ोर से पटकी। "बस कर बहु! हमें मत सिखा कि कौन क्या है। तूने इस लड़के की हथेलियां बर्तन मांज-मांज कर घिसा दी हैं और दो वक्त की रोटी देने में भी तेरी जान निकलती है। तुझे शर्म नहीं आती?"
शीला ने जानबूझकर अपनी आवाज़ में एक नकली रुलाई घोलते हुए कहा, "अच्छा! तो अब मैं बुरी हो गई? अगर आपको इस मनहूस की इतनी ही चिंता है, तो अपने पास रखिए इसे। मेरे घर के अंदर यह बिल्कुल नहीं आएगा। मैंने तो पहले ही कह दिया था, या तो यह रहेगा या मैं।"
माहौल की हवा एकदम भारी हो गई। रुद्रांश, जो अब तक चुप था, अचानक बोला। उसकी आवाज़ में कोई चीख या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी ठहराव था जिसने सबको सुन्न कर दिया।
"ठीक है। मुझे इस दीवारों के पिंजरे में रहने का कोई शौक नहीं है।"
सब सिकुड़ कर ठिठक गए। रुद्रांश ने सीधे शीला की आँखों में घूरते हुए आगे कहा, "मैं अभी चला जाऊंगा। लेकिन जाने से पहले, मुझे मेरी सगी माँ का सारा सामान चाहिए—उनके जेवर, उनकी साड़ियां और उनकी संदूक। और साथ ही मेरा अपना सामान। वो सब लेकर मैं इस दहलीज के पार हमेशा के लिए चला जाऊंगा।"
दादी के झुर्रियों वाले हाथ कांपने लगे। उन्होंने रुद्रांश की कलाई कसकर पकड़ ली, "बेटा, तू क्या कह रहा है? 'आग में घी क्यों डाल रहा है'? यह तेरा ही घर है, तेरे पिता का घर है। तू कहाँ जाएगा?"
रुद्रांश के होंठों पर एक कड़वी, बेजान मुस्कान आ गई। "पिता का घर? दादी, अगर आपके बेटे को मेरी ज़रा भी फिक्र होती, तो आज मेरी यह हालत न होती। उन्हें तो शायद यह भी फर्क नहीं पड़ता कि मेरी साँसें चल रही हैं या रुक गईं।"
"नहीं बेटा, ऐसा मत बोल," दादा जी ने बचाव किया। "वह तुझसे प्यार करता है, बस तेरी माँ की मौत के सदमे से वह उबर नहीं पाया है।"
"तो इसमें मेरा क्या दोष है?" रुद्रांश की आवाज़ ऊंची हो गई। "क्या मैंने माँ को मारा था? या मेरी किस्मत ही खराब थी कि मैं बच गया?"
बात को संभालने के लिए दादी ने उसका माथा सहलाते हुए पूछा, "तूने कल से अन्न का एक दाना भी हलक से नीचे उतारा है या नहीं?"
रुद्रांश ने व्यंग्य से शीला की तरफ देखा और कहा, "चिंता मत कीजिए दादी, 'माँ' के तानों की कड़वाहट से पेट भर गया है मेरा।"
यह सुनते ही शीला ने ज़मीन पर बैठकर अपनी छाती पीटने का ड्रामा शुरू कर दिया। "हाय! देखो सब लोग, यह लड़का मुझे क्या-क्या सुना रहा है। मैं कुलटा हूँ, मैं दुष्ट हूँ, यही सुनना बाकी रह गया था। मैंने इसे पाला-पोसा और यह 'आस्तीन का सांप' निकला।"
इस शोरगुल के बीच, अंदर वाले कमरे का दरवाज़ा चरमराते हुए खुला। दीनानाथ बाहर निकले। उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित कठोरता थी और माथे पर बल पड़े हुए थे। उनकी ठंडी और उपेक्षा भरी नज़र रुद्रांश पर पड़ी।
"क्या तमाशा लगा रखा है?" दीनानाथ ने गले को साफ करते हुए कड़क आवाज़ में पूछा। "और तुम? रात भर कहाँ आवारागर्दी कर रहे थे? अगर माँ ने थोड़ा-बहुत डांट दिया, तो क्या घर छोड़कर भाग जाओगे? 'राई का पहाड़ बनाना' तो कोई तुमसे सीखे।"
पिता के मुंह से 'माँ' शब्द सुनकर और अपनी रात भर की पीड़ा और भूखे पेट की ऐंठन को महज़ 'थोड़ी सी डांट' बताने की बात ने रुद्रांश के अंदर जमे हुए सब्र के आख़िरी बांध को तोड़ दिया। उसके सीने में जैसे किसी ने खौलता हुआ लावा उंडेल दिया हो।
रुद्रांश ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में अब कोई डर या बेबसी के आंसू नहीं थे, बल्कि एक खौफनाक शून्यता और दहकते हुए अंगारे थे। उसने अपने पिता की आँखों में सीधे देखा—बिना पलक झपकाए। वह नज़र एक मार खाए हुए बेटे की नहीं, बल्कि एक ऐसे स्वाभिमान की थी जिसे बरसों से पैरों तले रौंदा जा रहा था और जो अब फन उठाने को तैयार था।