सुबह की शुरुआत एक अलग ही कोलाहल के साथ हुई। बच्चों के स्कूल जाने का समय था। कल तक जो बच्चे आँख खुलते ही 'काया-काया' पुकारते थे, आज वे अपनी दादी मनोरमा और बुआ शिखा को सामने देख कर खुशी से झूम उठे। उनके लिए यह एक नया बदलाव था, एक नया उत्साह था।
विहान अपनी दादी की गोद में जा बैठा और नन्ही अवनी शिखा बुआ के गले लग गई। काया रसोई के दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई हो। कल तक जो बच्चे उसके आँचल से लिपटे रहते थे, आज वे उसे नज़रअंदाज़ कर रहे थे।
शिखा ने एक शाही अंदाज़ में सोफे पर बैठते हुए वंशिका को आदेश दिया, "भाभी, आज मैं बच्चों को स्कूल से आने के बाद मॉल घुमाने ले जाऊँगी। आप जल्दी से इन्हें तैयार कर दीजिये और इनके बढ़िया वाले कपड़े निकाल कर रखिये।"
वंशिका ने बस एक संक्षिप्त मुस्कान दी और कमरे की ओर बढ़ने लगी। काया ने अपनी अहमियत दिखाने के लिए फुर्ती से आगे बढ़कर कहा, "बुआ जी, मैं कर देती हूँ बच्चों को तैयार, मुझे पता है उन्हें क्या पहनना पसंद है..."
तभी मनोरमा ने वहीं से कड़कती आवाज़ में टोका, "रहने दो काया! तुम्हें कितनी बार कहा है कि घर के अंदरूनी मामलों में अपनी टांग मत अड़ाया करो। बच्चों की माँ और बुआ मौजूद हैं, तुम बस अपनी रसोई संभालो और जाकर नाश्ता लगाओ। अपनी हद में रहना सीखो।"
काया तिलमिलाकर रह गई। उसका चेहरा अपमान से लाल हो गया, लेकिन वह कुछ न कह सकी। रसोई की दीवार के पीछे जाकर उसने गुस्से में मुट्ठियाँ भींच लीं।
नाश्ते की मेज पर मनोरमा और शिखा ने वंशिका को भी निशाने पर लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे वंशिका को नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास कर रही थीं।
शिखा ने परांठा तोड़ते हुए कहा, "मम्मी, देखिये न भाभी ने घर का क्या हाल बना रखा है। अगर ये काया न होती, तो शायद भैया को भूखा ही दफ्तर जाना पड़ता। भाभी को तो बस अपने जिम की पड़ी रहती है।"
मनोरमा ने चाय का घूँट लिया और वंशिका की ओर देख कर तंज कसा, "सच कह रही है शिखा। वंशिका, मैंने तो आज तक नहीं देखा कि कोई बहू अपने घर को नौकरानी के भरोसे छोड़कर सारा दिन बाहर घूमती हो। ये काया तो बेचारी ऐसी है कि इसने घर को इस तरह संभाल रखा है जैसे यही इस घर की मालकिन हो। सारा सलीका इसे ही आता है, तुम्हें तो शायद ये भी नहीं पता होगा कि रसोई के किस डिब्बे में क्या रखा है।"
वंशिका शांत रही, लेकिन उसे मज़ा आ रहा था। वह जानती थी कि ये ताने दरअसल काया के लिए मौत की घंटी हैं। सासू माँ और ननद काया की तारीफ उसे नीचा दिखाने के लिए कर रही थीं, लेकिन अनजाने में वे काया को मालकिन का दर्जा देकर उसे और भी ज़्यादा अहंकारी बना रही थीं ।
जब वंशिका ऊपर कमरे में चली गई, तो भूपेंद्र अपनी माँ के पास आकर धीरे से बैठ गया। उसे काया का इस तरह अपमानित होना अच्छा नहीं लग रहा था।
"माँ, आप लोग बेकार में वंशिका को सुना रही हैं। उसे तो अपने जिम से फुर्सत ही नहीं मिलती। घर की स्थिति तो वाकई बहुत खराब हो जाती अगर काया न होती। वह तो भला हो काया का, जिसने पिछले डेढ़ साल से इस घर और बच्चों को माँ बनकर संभाला है," भूपेंद्र ने भावुक होकर कहा।
मनोरमा ने अपने बेटे को देखा, "बेटा, तू बहुत सीधा है।"
भूपेंद्र ने आगे कहा, "नहीं माँ, हकीकत देखिये। बेचारी बहुत कम रुपयों में दिन-रात खटती है। वंशिका तो कभी रसोई में घुसना अपनी शान के खिलाफ समझती है।
काया ने जिस तरह मेरी और बच्चों की सेवा की है, उसका कर्ज हम नहीं उतार सकते। आप लोग उस पर इतना गुस्सा मत किया कीजिये।"
भूपेंद्र की बातों में काया के लिए जो सहानुभूति थी, वह मनोरमा की पारखी नज़रों से छिपी नहीं रही। उसे समझ आ गया कि उसका बेटा इस नौकरानी के प्रभाव में बहुत गहराई तक जा चुका है।
उधर काया, जो हॉल के पर्दे के पीछे खड़ी यह सब सुन रही थी, उसके मन में फिर से उम्मीद की किरण जागी। उसे लगा कि भले ही सास और ननद उसे सता रही हैं, लेकिन साहब आज भी उसके पक्ष में खड़े हैं। साहब का उसे बेचारी कहना और उसकी सेवा को माँ जैसा बताना, काया के गिरते हुए मनोबल के लिए एक संजीवनी जैसा था।
वंशिका ऊपर सीढ़ियों पर खड़ी भूपेंद्र की बातें सुन रही थी। उसने मन ही मन सोचा, 'भूपेंद्र, तुम्हारी यही सहानुभूति ही काया के पतन का कारण बनेगी। माँ और शिखा को अब पता चल गया है कि तुम काया के कितने करीब हो, और अब वे इस मालकिन बनने की चाह रखने वाली औरत को मिट्टी में मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी।'
घर में अब एक ऐसा त्रिकोण बन चुका था जहाँ नफरत, जलन और झूठी सहानुभूति के बीच रिश्तों की मर्यादा दम तोड़ रही थी।
अगले कुछ दिन इस घर के लिए किसी मनोवैज्ञानिक युद्ध की तरह थे। मनोरमा देवी और शिखा ने मानो एक गुप्त समझौता कर लिया था। वे केवल सत्ता जमाने नहीं आई थीं, बल्कि वे इस घर की हर ईंट और उस पर टिके इंसानों को परखना चाहती थीं। विशेषकर काया को, जिसकी तारीफों के पुल उनका राजा बेटा सुबह-शाम बांध रहा था।
शिखा का व्यवहार अब और भी आक्रामक हो गया था। उसने एक नया खेल शुरू किया—अव्यवस्था का जाल। वह जानबूझकर अपने कमरे में चिप्स के पैकेट फैला देती, गंदे कपड़े सोफे पर छोड़ देती और ड्रेसिंग टेबल पर मेकअप का सामान ऐसे बिखेरती जैसे वहां कोई तूफान आया हो। वह चाहती थी कि काया झुंझला जाए, जवाब दे या कम से कम काम चोरी करे। लेकिन काया ने अपनी रणनीति बदल ली थी। साहब की सहानुभूति पाने के बाद उसे समझ आ गया था कि शांति ही उसका सबसे बड़ा हथियार है। शिखा जितना घर फैलाती, काया उतनी ही खामोशी से उसे समेट देती। उसके चेहरे पर न शिकन होती, न ही कोई शिकायत। वह किसी साए की तरह आती, गंदगी साफ करती और चुपचाप रसोई में लौट जाती।
मनोरमा देवी अपनी आँखों पर चश्मा चढ़ाए, सोफे पर बैठी माला फेरने के बहाने घर की हर हलचल को ताड़ रही थीं। उनकी अनुभवी आँखें दो औरतों के बीच बँटी हुई थीं—एक तरफ वंशिका, जो अपने जिम और अपने रसूख में मग्न थी, और दूसरी तरफ काया, जो किसी मशीन की तरह घर को सींच रही थी।
मनोरमा ने गौर किया कि सुबह के चार बजे जब पूरा घर सो रहा होता, तब रसोई से खटर-पटर की आवाज़ें आने लगती थीं। वह दबे पाँव रसोई की ओर गईं और देखा कि काया ओखली में ताज़ा मसाले कूट रही थी।
"इतनी सुबह?" मनोरमा ने पीछे से टोका।
काया ने सकपकाकर सिर ढका और झुककर प्रणाम किया। "जी माँ जी, साहब को ताज़ा मसालों की चाय पसंद है। और बच्चों के टिफिन के लिए परांठे का आटा अभी गूँध लूँगी तो वो नरम रहेंगे।"
मनोरमा ने कुछ नहीं कहा, बस रसोई की टाइल्स और कोनों को उंगली से छूकर देखा। वहां चिकनाई का एक कतरा भी नहीं था। उन्होंने देखा कि काया ने अनाज के डिब्बों को कितनी सावधानी से पोंछकर रखा था। मनोरमा के मन में एक कड़वा सच घर करने लगा—यह औरत वाकई मेहनती थी। यह सिर्फ दिखावा नहीं था, बल्कि उसे इस घर को सहेजने का जुनून था। लेकिन मनोरमा के लिए यह मेहनत ही सबसे बड़ा खतरा थी। उन्हें याद आया कि कैसे पुरानी कहानियों में वफादार नौकर धीरे-धीरे मालिक बन बैठते हैं। उन्हें लगा कि अगर काया इतनी ही परफेक्ट है, तो वह उनके बेटे के दिल से वंशिका का ही नहीं, बल्कि एक दिन उनका (माँ का) वजूद भी मिटा देगी।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
सर्वाधिकार सुरक्षित