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बड़े दिन हो गए थे आना रंजु के दिए हुए कागज़ निकाल ही नहीं पाई थी| थोड़ी सी फुरसत मिली तो उसने उस रबर से बंधे हुए बंडल को एक बार फिर से खोला | उसकी दृष्टि रंजु के लिखे हुए मैटर पर पड़ी | वह आगे पढ़ने लगी जापान का दृश्य जैसे उसकी दृष्टि में साकार हो उठा —
“एक कतार में भागती हुई कारें, उनका एक साथ रुककर फिर से साथ भागऩा--- ऊपर भी, नीचे भी सड़कों के जाल बिछे हुए थे ऐसा लगा कि मैं जादू की नगरी में आ गई हूँ।
रात हम टोकियो में 25वें मंजिल के होटल में रुके और अगली सुबह अपने नये घर के लिए रवाना हुए। रात जितनी चमकीली, तड़क भड़क वाली थी सुबह उतनी ही शांत और सुहानी ! चारों ओर फूल ही फूल खिले थे। दुकानों की सजावट इतनी सुंदर थी कि मेरी नज़र उन पर से हटने का नाम नहीं ले रही थी |सबसे प्यारी बात कि दुकानों पर सब मुस्कराहट के साथ स्वागत कर रहे थे।मुझे ऐसा एहसास हुआ कि मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। इंगलिश तो यहाँ कोई जानता ही नहीं, सब जापानी भाषा में ही बोल रहे थे।
शीनोदा ने जापानी भाषा सीखने के लिए मेरे लिए स्कूल ढूंढ रखा था|अगले सप्ताह से मुझे स्कूल में पढाई करने जाना था। मेरी नई जिंदगी का सफ़र तो अब शुरू होने वाला था।हमने नये घर में प्रवेश किया | जैसे ही मैने अंदर पैर रखा मेरे पति ने कहा,
”नहीं-नहीं जूते बाहर उतारो|”
घर में प्रवेश करने के लिए कुछ ज़मीन है जहाँ थोड़ी सी ऊँचाई पर घर शुरू होते हैं | सब घर लकडी से बने होते हैं पर इस थोड़ी सी ऊँचाई और ज़मीन में बहुत अंतर है |ज़मीन गंदी मानी जाती है। इसलिए आप नंगे पैर नीचे नहीं रख सकते और भूल कर भी जूते ऊपर नहीं रख सकते| इसलिए जूतों से पैर निकालकर सीधे ऊपर रखने होते हैं। जूते पहनते समय भी सीधे जूते में पैर जाने चाहिएँ, पैर ज़मीन पर नहीं रखने होते।
यह सब यहाँ बचपन से सिखाया जाता है इसलिए सब अपने जूते लाइन से उतारकर सीधे रखते हैं जिससे पहनते समय सीधे जूतों में ही पैर डालें। घर के अंदर पहनने वाली चप्पल अलग होती है, उसे शौचालय में नहीं पहन सकते।
एक और महत्वपूर्ण बात कि मेहमानों के लिए अलग चप्पलें होती है। अपनी प्रयोग की गई चप्पल मेहमानों के नहीं दी जाती।”
अनामिका को बहुत सी नई बातें जानने को मिल रही थीं, उसे इन सबको जानना अच्छा लग रहा था|वह आगे पढ़ती रही --
“पुराने जापानी घर ज्यादातर एक मंज़िल के होते थे। कमरों में ‘ततामी’ से फ़र्श बने हुए होते थे |चटाई (मैट) पर नीचे बैठने का रिवाज़ ज्यादा था | उन दिनों एक गोल मेज़ के चारों तरफ कुशन रखकर बैठा जाता था| उन दिनों घरों में सोफ़ा या कुर्सियाँ नहीं होती थीं।
शयनकक्ष में भी पलंग की जगह नीचे बिस्तर बिछाकर सोया जाता था।
कमरों के दरवाजे लकड़ी के फ्रेम में जापानी ‘काकशवाशी’ से बने होते हैं उसे ‘श्योजी’ कहते हैं | दरवाज़े ज्यादातर स्लाइड करके खोले जाते हैं । कमरों में, साँकल नहीं होतीं। घर के प्रवेशद्वार में ही ताले लगाये जाते हैं । धीरे-धीरे वहाँ पर भी और देशों के जैसे ही आधुनिकता का प्रभाव पड़ता गया | सन 1970 में जापान प्रगति कर रहा था उस समय घर के डिज़ाइनों में भी आधुनिक बदलाव शुरू हो गए |जैसे-जैसे शहरों की जनसंख्या बढने लगी, उस समय से मल्टी स्टोरी का निर्माण तेज़ी से बढता गया। घरों के फर्श वुडन के और आधुनिक तरह के रसोईघरों का निर्माण होने लगा।
‘कितनी बातें जानने को मिलती हैं एक-संस्कृति से दूसरी संस्कृति की और आपस में साम्यता है, यह भी पता चलता है --’, अनामिका ने सोचा और रुचि लेती हुई आगे पढ़ने लगी |जैसे वह देख पा रही थी आगे का वर्णन आधुनिक बदलावों का था | अच्छा है, पता चलेगा कहाँ पर कैसे और कितने बदलाव हुए हैं ?
रंजु ने आधुनिक घरों के बारे में लिखा था--
“आधुनिक घर दो मंजिल के होते हैं।ये 4 एलडीके कहे जाते हैं | इनमें नीचे की मंजिल में बैठक, भोजन-कक्ष, रसोई-घर, एक अतिथि-कक्ष जो (ततामी से बना होता है) तथा स्नानघर और शौचालय होते हैं।
जापान में स्नानघर और शौचालय अलग-अलग होते हैं । स्नानघर में बाथटब होता है जिसे ‘ओफूरो’ कहते हैं। यहाँ ज्यादातर रात को स्नान लिया जाता है। नहाने का मतलब होता है अपनी दिन भर की थकान को दूर करना | यहाँ सर्दी भी ज्यादा होती है इसलिए सब रात को घर पर आकर खाना खाने से पहले या बाद में बाथटब में बैठ कर अपनी सारे दिन की थकान दूर करते हैं, बाद में सोते हैं । स्नान लेने के बाद अधिकांश लोग बाहर नहीं जाते।
आजकल तो हाई टेक्नोलॉजी के बाथरुम होते हैं। ओफूरो में बैठे हुए टीवी भी देखा जा सकता है। उसमें ऑटोमेटिक गर्म पानी भर जाता है जिसका तापमान अपने अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।कुछ घरों में बबल से निकलने वाले बाथटब होते हैं जिससे शरीर की मसाज भी हो सकती है।
यदि फेनहीटर होते हैं तो कपड़े भी सुखाए जा सकते हैं|
वैस्टर्न के बाथटब और जापान के ओफूरो में सबसे बडा अन्तर यह है कि जापान में रिलेक्स करने के लिए बाथटब में बैठा जाता है, शरीर को साफ़ करने के लिए नहीं !इसलिए ओफूरो करने के लिए भी कुछ नियम हैं।इसमें पहले शरीर को साबुन या बॉडी लोशन से शरीर साफ़ करके, शावर करने के बाद बाथटब में बैठकर थोड़ी देर रिलेक्स किया जाता है। इसलिए एक भरे हुए बाथटब (ओफूरो) का गर्म पानी सभी सदस्य प्रयोग करते हैं ।ओफूरो जापानियों के जीवन में एक महत्वपूर्ण जगह रखता है।
पुराने समय पानी घरों में पहुंचाना मुश्किल होता था इसलिए जिनके घर पर ओफूरो नहीं होता था वे लोग‘पब्लिक बाथ’ जिसे ‘सेन्टो’ कहते हैं, वहाँ जाते थे।यहाँ पर एक बहुत बड़े टब में गर्म पानी भरा होता है जैसे कि तैरने के पूल पर होता है |वह कम गहरा होता है. पहले सब शावर लेने की जगह में स्नान लेते हैं फिर उस टब में बैठते हैं।इसमें एक साथ 10 से 15 व्यक्ति बैठ सकते हैं।आजकल सेन्टो (पब्लिक बाथ) नहीं मिलते, उनके स्थान पर हॉटस्प्रिंग (ओनसेन) आ गए हैं । इस हॉटस्प्रिंग में प्राकृतिक क्रिया से जमीन में से गर्म पानी निकलता है। इसमें हाइड्रोजन कार्बोनेट, मिनिरल, आइस आदि होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है। जापान में 25000 ओनसेन होने का मुख्य कारण यहाँ पर ज्वालामुखी पहाड़ों की बहुतायत है ।ये लगभग 3000 स्थानों पर हैं।इन सबके अलग-अलग लाभ होने से सब छुट्टियों में ओनसेन जाना बहुत पसंद करते हैं । ओनसेन स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मानसिकता के लिए बहुत लाभदायक है।इससे त्वचा में बहुत निखार आता है | जापानी लड़कियाँ ओनसेन जाना बहुत पसंद करती हैं।
मैं जब पहली बार ओनसेन गई थी तो चकित रह गई थी | स्नान लेने के लिए इतना पानी है और वो भी गर्म! उसमें बैठकर रिलेक्स करने में बहुत आनंद आता है।
ओनसेन जापान में रिसोर्टस जगह है।जो प्रकृति के अंदर बना होता है। सुंदर प्रकृति से स्वाभाविक रूप से निकले गर्म पानी के अंदर बैठकर रिलेक्स करने में ऐसा लगता है मानो स्वर्ग में आ गये हों।
ओनसेन में अलग-अलग प्रकार के बाथटब होते हैं-- जैसे बबल निकलने वाले (सोडा) कुछ इलेक्ट्रिक बाथ इसमें बैठकर हल्का सा करेंट निकलता है और शरीर में जाता है। इससे शरीर की माँसपेशियों को आराम मिलता है। स्टीम मानऊ (बाह्य स्नान) आदि शयन कक्ष, रेस्टोरेंट आदि भी होते हैं।इनमें एक पूरा दिन व्यतीत किया जा सकता है। मेरे शहर में भी एक ओनसेन है जो काफी प्रसिद्ध है। वह त्वचा के निखार के लिए और जिसके हाथ पैर ठंडे रहते हैं उनके लिए बहुत लाभदायक है।मुझे ज़्यादातर ठंडे मौसम में ओनसेन जाना बहुत अच्छा लगता है।जापान में सबकी मनपसंद जगह ओनसेन है।”
अनामिका को यह सब पढ़कर बहुत अच्छा लगा |रंजु ने जो लिखा था. रोचक था, नई बातें पता चली थीं| अभी भी बंडल में काफ़ी पेज थे | इनमें भी ज़रूर कुछ रोचक होगा, उसने सोचा और एक बार फिर से पृष्ठों को रोल करके रख दिया |