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विद्यापीठ में एक लगभग पच्चीस वर्ष का गुजराती लड़का था जो किसी गाँव से पढ़ने आया था | पास के गाँव के स्कूल में अध्यापक था वह !छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए काफ़ी थी उसकी शिक्षा जितनी भी थी |आख़िर फिर से विद्यार्थी बनने की कहाँ ज़रूरत थी ?कभी उसे लगता उसके मन में यह विचार तो उठना ही नहीं चाहिए |वह अपनी उम्र तो देखे ! क्या कर रही है ? वह तो इस उम्र में बच्चों व गृहस्थी के साथ पढ़ रही है -----उसे खुद की सोच पर अफ़सोस हुआ लेकिन जब परेशानी ओढ़नी पड़ती तब कोई न कोई ऐसे विचार मन में गोल-गोल चक्कर काटने लगते !वह भी क्या करती, एक आम बंदी ही तो थी !
विद्यापीठ इतना महान संस्थान कि किसीको भी वहाँ आराम से प्रवेश मिल जाता | देखा उसने!उसका खुद का 'टी.सी' नहीं आया था और उसे प्रवेश मिल गया था | वह बात अलग है कि बाद में जल्दी ही विवेक ने आगरा विश्वविद्यालय से उसका टी.सी मँगवाकर जमा करवा दिया था |
जिस लड़के से वह दुखी होने लगी थी, वह शनिवार, रविवार की कक्षाओं में 'एज़ एन एक्स्ट्रा स्टूडेंट'आता | शनिवार, रविवार को ऐसे विद्यार्थियों के लिए विशेष कक्षाएँ होतीं किन्तु उन्हें आम दिनों में भी कक्षा में बैठने की आज्ञा थी |
वह मास्टर लड़का कक्षा में तो ठीक प्रकार से पढ़ता नहीं था, उसे कुछ समझ ही न आता| इधर-उधर मुंडी घुमाकर देखता रहता कक्षा में !बाद में गुरूजी की नहीं अनामिका की जान खाता | गुरु जी भी पूरे फन्ने-खाँ मिले थे ! एक लेक्चर के बाद कक्षा में यह कहना न भूलते ;
"देखिए, हम यहाँ पर आपको कितनी देर पढ़ाते हैं और आकाशवाणी में एक घंटा बोलने के हमें डेढ़ सौ रूपये मिलते हैं --|"
अब तक उसको भी आकाशवाणी के कार्यक्रमों में निमंत्रित किया जाने लगा था, उसे पचास रुपए ही मिलते थे किन्तु उसमें और गुरु जी में तो अंतर था न !उस ज़माने में डेढ़ सौ रूपये की कीमत काफ़ी होती थी|
और सब तो बोल न पाते किन्तु एक कन्नड़ लड़की उसके साथ पढ़ रही थी, भारती ! वह वाचाल, दबंग लड़की चुप न रह पाती ;
'सर! यहाँ से भी तो आपको तनख़्वाह मिलती है और आकाशवाणी से अलग घंटे के हिसाब से पैसे मिलते हैं, दोनों जगह से ही ---" गुरु जी एक तीक्ष्ण दृष्टि उस पर फेंककर अपने सामने खुली पुस्तक में दृष्टि गड़ा देते और अपने छात्रों को कोई भी कहानी पढ़ने के लिए कह देते, इस आशय से कि बाद में उस पर चर्चा की जाएगी जो कभी भी नहीं होती थी |ख़ुद टेढ़ी दृष्टि नीची करके कनखियों से इधर-उधर देखने लगते | न जाने क्यों, वे उस मुँहफट लड़की से बहुत घबराते थे |
श्यामवर्ण की भारती के चेहरे पर कुछ अजीब से फूले हुए फोड़े जैसे थे | एक बार तो उसे देखकर घबराहट होने लगती | वैसे काफ़ी बुद्धिमती व चालाक थी वह ! लोग शुरू-शुरू में उससे मित्रता करते हुए संकोच करते लेकिन वह पूरी तरह 'कॉन्फिडेंट' थी |कुछ ऐसे कि –
‘हम जैसे हैं , वैसे हैं ----‘सच बात तो थी, किसीको कोई अधिकार नहीं था उसे कुछ कहने का ! लेकिन न कहो, मन में रखो–तो बात तो वही हो गई न ?मन में किसी के प्रति कुछ गलत सोच भी तो ठीक नहीं !कई दिनों बाद अनामिका उसके चेहरे पर नज़र रखकर बात करने में सफ़ल हो सकी थी | खुद से वितृष्णा भी होती, अगर ईश्वर उसे ऐसा बनाकर भेजता तो ----? ख़ैर-- एक कक्षा में ये दो ही महिलाएँ थीं ---हाँ ! वह भी कोई बहुत छोटी उम्र की तो नहीं थी लेकिन अविवाहित थी, और अनामिका ख़ासे बड़े अफ़सर की पत्नी थी, दो किशोर बच्चों की माँ थी ----सो, फ़र्क तो था ही !
उन दिनों गुरूजी आकाशवाणी में रेडियो पर गुजराती विद्यार्थियों के लिए 'हिंदी-शिक्षण' के पाठ पढ़ाते थे |उत्तर भारतीय डॉ.त्यागी बरसों से गुजरात में निवास कर रहे थे अत: गुजराती पर उनकी ख़ासी पकड़ थी, वैसे भी हिन्दी के एम.ए में एक प्रश्न-पत्र गुजराती का होता था, उसे भी पढ़ना पड़ा, परीक्षा भी देनी पड़ी | आख़िर गुजरात प्रदेश में गुजराती तो आनी चाहिए थी न ! हम किसी भी प्रदेश में क्यों न रहें वहाँ की भाषा को सम्मान देना हमारा कर्तव्य है | गुरु जी को एक दिन छोड़कर हर दूसरे दिन रेकॉर्डिंग के लिए आकाशवाणी जाना होता औरआत्माभिमान के आनंद की अनुभूति में निखरे रहते वे! ख़ैर ----
भारती के इस प्रकार कुछ न कुछ बोलने से गुरु जी के चेहरे पर क्रोध फुदकने लगता और अनामिका होठों में भरी हँसी को रोकने की कोशिश में अपना चेहरा ज़मीन में गड़ाने की कोशिश करती !किशोरावस्था के बच्चों की माँ को भला कैसे शोभा दे सकती थीं, इस प्रकार की बातें!
पहले वर्ष में ही विद्यापीठ में सबको पता चल गया था कि वह गीत लिखती और कंपोज़ करके प्रस्तुत भी करती है | कक्षा में कई बार जब अध्यापक महोदय का पढ़ाने का मूड न होता, गीत-गज़लों का सैशन शुरू हो जाता |ठीक-ठाक आवाज़ होने के कारण सभी उसे सुनना पसंद करते |
संगीत की अध्यापिका श्रीमती विमला बहन मेहता प्रतिदिन उस बड़े से हॉल में बने बड़े से मंच पर बैठकर तानपुरा ले माइक से दरी पर बैठे छात्र / छात्राओं, अध्यापकों /कर्मचारियों को प्रार्थना करवातीं | सब आँखें मूँदकर उनकी मीठी, सुरीली आवाज़ में डूबकर एक अलौकिक आनंद का रसपान करते | बड़ी प्यारी आवाज़ थी विमला बहन की –जब कभी वे छुट्टी पर होतीं, हॉल में बेसुरे सुरों में होने वाली सम्मिलित प्रार्थना से बाहर पेड़ों पर फुदकती गिलहरियाँ व पक्षी भी जैसे कोटर में दुबक जाते जो विमला बहन के सुरों के जादू से हॉल के बड़े-बड़े दरवाज़ों तक पहुँच जाते थे जैसे उनके मीठे सुरों को सुनने के लिए लालाइत हों |उस समय जैसे नाद से वातावरण पावन हो उठता था |
अनामिका के बारे में जानने के बाद उसे विमला बहन की अनुपस्थिति में प्रार्थना करवाने की आज्ञा मिलने लगी | उसे बहुत अच्छा लगा, अपनी किशोरावस्था में उसने यही सब तो किया था, बेशक उत्पात करती रही हो लेकिन आवाज़ में माँ शारदे का वरदान था जिसके लिए उसको ईश्वर का धन्यवाद देना अच्छा भी लगता था और उसका कर्तव्य भी था लेकिन कहीं न कहीं शुरू-शुरू में मंच पर जाते हुए उसका दिल तो धड़कता ही था | बहुत दिनों बाद जो उसे स्टेज पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ था लेकिन भीतर से उसे कहीं सुकून मिलता था |
एक–दो बार प्रार्थना करवाने के बाद वह विमला जी की तरह भजन भी गाने लगी और उपस्थित लोगों के मन में उसकी जगह भी बनने लगी | कभी वह मीरा का कोई भजन सुना देती तो कभी कबीर-वाणी में से कुछ दोहों को सस्वर सुनाती | कभी विमला बहन अपनी उपस्थिति में ही उसे मंच पर भेजतीं व प्रार्थना के बाद उससे उसके स्वलिखित भजन सुनाने को कहतीं | धीरे-धीरे उसका मनोबल बढ़ा और विद्यापीठ में उसका सम्मान भी ! विमला बहन से उसकी सहज मित्रता हो गई, वे आकाशवाणी में संगीत के कार्यक्रम देने जाती थीं, अनामिका को भी कई बार साथ ले गईं और उसका वहाँ परिचय करवा दिया था |इसीलिए अनामिका को कभी-कभी आकाशवाणी का निमंत्रण मिलने लगा था |
आकाशवाणी विद्यापीठ से बहुत समीप था | विद्यापीठ से सटे हुए बैंक में उसके पति विवेक ने उसका एक एकाउंट' खुलवा दिया था जिससे कभी ज़रूरत पर वह वहीं से पैसे निकाल सके |अच्छा ही हुआ, बाद में उसकी यू.जी. सी की स्कॉलरशिप भी उसी में आने लगी थी | इसी बैंक में आकाशवाणी के कई कर्मचारियों का खाता होने के कारण विमला बहन के पहचान वालों के अतिरिक्त उसकी कई और भी लोगों से पहचान हो गई और उसे कविता-पाठ व युववाणी आदि कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आकाशवाणी बुलाया जाने लगा |
वहीं उसकी पहले मुलाक़ात फिर प्रगाढ़ मित्रता साधना बहन से हुई जो उस समय विज्ञापन-प्रसारण सेवा की ‘प्रमुख’ थीं | पहले तो उसे छोटे-मोटे कार्यक्रमों व चर्चाओं में भाग लेने के लिए बुलाया जाता था फिर उसके लिखने का भेद खुलने पर स्व-लिखित गीतों की प्रस्तुति के लिए भी उसे आमंत्रण मिलने लगे |इसके साथ ही डॉ . नावाणी के पास ‘ड्रामा-विभाग’था, उनसे परिचय हुआ और आकाशवाणी दिल्ली के लिए बहुत से नाटकों को खेला गया जिन्हें आकाशवाणी दिल्ली से प्रसारित किया गया |अनामिका रेकार्डिंग के लिए जब भी आकाशवाणी जाती साधना बहन से मिलने विज्ञापन-प्रसारण-सेवा में अवश्य जाती | वहाँ उसे धीरे-धीरे इतने प्यारे मित्र मिले जो जीवन का हिस्सा बन गए |
इसी विभाग में एक लंबे, खूबसूरत से महोदय थे, नाम था–गोपालदास टंडन! बहुत प्यारे, मज़ेदार इंसान और उतने ही प्यारे कलाकार ! वे मुंबई से प्रमोशन पर आए थे, उसे देखते ही चहक जाते ;
‘आइए, अनामिका जी, तैयार हो जाइए –आज तो आपका स्कैच बनेगा ---“ वे कागज़, पेंसिल लेकर जैसे तैयार ही बैठे रहते थे किसीका भी स्कैच बनाकर उसकी खिंचाई करने के लिए !
अनामिका अच्छी-ख़ासी कद-काठी की थी | चेहरे पर मुटापा मुस्कुराता, गर्दन तक आकर वे रुक जाते ;
“अब इतने प्यारे चेहरे पर गर्दन कहाँ बनाऊँ ?” और उनके साथ साधना बहन, वह ख़ुद और उस चैम्बर में कार्यरत सारा स्टाफ़ दाँत फाड़ने लगता !
उन्हीं दिनों में मनुज जी भी ‘स्टेशन डायरेक्टर’ के पद पर आए थे | उनका स्थानांतरण पोर्ट ब्लेयर से अहमदाबाद हुआ था | शॉर्ट टैंपर मनुज जी बहुत अच्छे कवि थे लेकिन यह ‘शॉर्ट-टेंपर’ होना कभी-कभी भारी मुसीबत में डाल देता है आदमी को ! पोर्ट-ब्लेयर जैसे स्थान पर जाना, उनके शॉर्ट टेंपर होने का परिणाम था| ख़ैर, प्रत्येक व्यक्ति की कुछ स्वभावगत मज़बूरी होती है, आसानी से कहाँ वह छूट पाता है उस लाचारी से ! आख़िर में अहमदाबाद जैसे शहर के आकाशवाणी के निदेशक नियुक्त होकर आए थे वे ! उन्होंने ‘नव-परिमल’ नाम से एक संस्था शुरू की और स्थानीय कवियों व साहित्यकारों से जुड़ने का प्रयास किया | तभी इस अहिंदी प्रदेश में एक हिन्दी का दैनिक समाचार-पत्र ’गुजरात-वैभव’ भी शुरू हुआ | विद्यापीठ, विश्वविद्यालय व अन्य स्थानीय चर्चित लेखकों/कवियों को उसके विमोचन वाले दिन आमंत्रित किया गया | इस प्रकार अनामिका जैसे लेखन से जुड़े लोगों की लेखन-क्षेत्र में अधिक चहलकदमी शुरू हुई |