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“कैसे हो दीदी ?” रंजु का फ़ोन कोटा से आता रहता | उसका बात करने का यही स्टाइल और शुरुवात के ये ही शब्द होते थे | शब्दों में अपनापन लगता था और आना के चेहरे पर खुशी की चमक छा जाती थी |
वह बच्ची के बारे में, उसके व उसके माता-पिता के बारे में पूछती जैसे नॉर्मली बातें होती हैं, ऐसे ही बातें होतीं |
“क्या बात है ?ठीक हो?”आना ने उससे पूछा |उधर से कुछ ठंडी सी आवाज़ थी इस बार |
“हाँ, सब ठीक है दीदी –बस—शीनोदा सान आने वाले हैं | एक बार अहमदाबाद आकर अब तो उनके साथ जाना होगा |
“हाँ, आया था यहाँ भी उसका फ़ोन–अब कभी तो जाना ही है–”
“वैसे भी आप लोगों को पूछे बिना वो कोई काम कहाँ करते हैं ?” रंजु कुछ उखड़ी हुई सी लग रही थी |
“कुछ हुआ है क्या रंजु ?तुम लोगों के बीच में सब ठीक है न ?” आना को अजीब सा ही लगा था पूछते हुए लेकिन उसकी आवाज़ का खुरदुरापन कुछ शिकायत तो कर रहा था|
“हमारे बीच में क्या होने वाला है जब तक कोई और ---“उधर से आवाज़ बंद हो गई | अजीब सा लगा माना को, पहले ही विवेक रंजु के पेरेंट्स के व्यवहार से कुछ क्षुब्ध थे, दरसल वे उखड़ से ही गए थे उन लोगों से |
“आपने वो–मेरा लिखा हुआ जो आपको दिया था, वह पढ़ लिया क्या ?” विषय बदल गया था |
“अभी सारा नहीं पढ़ पाई हूँ, इंटेरेस्टिंग है |अपनी संवेदनाओं की अच्छी तरह व्याख्या की है तुमने |”
“पूरा पढ़कर बता दीजिए, छपने लायक है या नहीं ?”
“समय की बड़ी कोताही है, धीरे-धीरे पढ़ूँगी ---”
“इंफॉरमेटिव है, जापान के बारे में कुछ नई बातें पता चलेंगी |”
“यह तो बहुत अच्छा है | एक देश की सभ्यता-संस्कृति दूसरे देश को जाननी ही चाहिए|” आना ने उसका उत्साह वर्धन किया | फिर न जाने उसके मुँह से कैसे और क्यों निकला;
“फिर भारत के बारे में भी लिखना | शीनोदा बता रहा था कि तुमने कितने कम समय में जापानी सीख ली है | बहुत अच्छी बात है, तुम जैसे लोग ही इस प्रकार से संस्कृति का प्रचार-प्रसार करेंगे न ?”आना खुशी से बोली –
“ऐसा तो है क्या भारत में जिसका प्रचार-प्रसार किया जाए ?’
आना का चेहरा पीला पड़ गया, दो दिन लड़की को वहाँ गए हुए हुए नहीं कि सिर पर सींग उग आए ! वह ऐसी थी तो नहीं ? मन ने कहा, उसे क्या पता वह कैसी थी ?
“सुन रही हैं आप मुझे?”
“हाँ, सुन रही हूँ, तुम जब आओगी तब बात करेंगे—“ आना ने फ़ोन रख दिया |मन कहीं गोल-गोल घूम रहा था |
शीनोदा पत्नी व बच्ची को लेकर अहमदाबाद आया तब उसके इन-लॉज़ भी साथ थे | बिना किसी लाग-लपेट के उसने अपने श्वसुर से कहा;
“दिस इज़ फॉर यू पापा –रिटायरमेंट के बाद आप दोनों और बॉबी (छोटा बेटा)यहीं रहेंगे| यह आप लोगों का घर है, हमारा सबका घर !जब मैं या हम लोग आएंगे तब मैं भी आपके पास ही रहूँगा|”
शीनोदा का इस प्रकार कहना सबको संवेदनशील बना गया | शायद इतना तो उनके बेटे भी नहीं सोच पाते जितना उनके विदेशी दामाद ने उनके लिए सोच लिया क्या, कर ही दिया था | कितना परेशान थे दोनों अपनी बेटी को इतनी दूर आँखों से ओझल करते हुए | स्वाभाविक था, यद्धपि उनका बड़ा बेटा अनिल उसका सहपाठी क्या एक कमरे में रहने वाला सहनिवासी भी था |आना के परिवार को भी वे भली प्रकार देख, पहचान चुके थे, सब कुछ ठीक ही दिखाई देने वाले सरल, सहज शीनोदा के व्यक्तित्व की अच्छाइयों से भी वे भली प्रकार परिचित हो चुके थे फिर भी उनके भीतर एक कमज़ोर धड़कन सदा उछलती रहती | कुछ गलत हो गया तो क्या ? कौन खबर लेगा उनकी बेटी की ? बेशक उसकी शादी नहीं हो रही थी, पंजाबी परिवार शादी में दहेज़ और देखा-देखी ऊँची उड़ान का विवाह ! रंजु ने अपने आप ही शादी के लिए मना कर दिया था|यानि माँ-बाप के पास इतना पैसा न हो तो वे उधार लेकर बेटी के हाथ पीले करें?यह बात उसके गले नहीं उतरती थी |
शीनोदा ने आना व विवेक से सलाह की और अपने करीबी दोस्तों को आमंत्रित करके एक छोटा सा यज्ञ अपने नए मकान में करवाकर उन्हें एक पार्टी भी दी | आखिर वह पहली बार बेटी का पिता बना था|
सब काम करके शीनोदा बेटी व पत्नी के साथ जापान लौट गया |उसके इन-लॉज़ और छोटा साला बॉबी कोटा लौट गए थे |जब कुछ होना होता है, वह अपने आप ही होता चला जाता है और हम आश्चर्य से देखते रह जाते हैं कि दरसल यह हुआ कैसे ? शीनोदा ने अहमदाबाद का घर अपनी पत्नी व श्वसुर के नाम पर लिया था कि भारतीय रीति-रिवाजों व परंपराओं के कारण उन्हें किसीकी कोई छोटी बात न सुननी पड़े, लोग तो ताक में रहते ही हैं कि उन्हें मौका मिले और वे किसी को छोटा दिखा सकें |जहाँ शीनोदा के श्वसुर बेटी का विवाह भी करने में समर्थ नहीं थे, वहीं बेटी को देखकर वे प्रसन्न थे साथ ही एक खासे बड़े बंगले के मकान-मालिक भी बन गए थे |उन्होंने शीनोदा से बहुत मना किया, उसे समझाया कि वे इस प्रकार उसके मकान में नहीं रह सकते लेकिन वो तो था शीनोदा ! भला क्यों नहीं?अगर उनका बेटा अनिल उनके लिए मकान बनाता तो क्या वे उसमें भी नहीं रहते?यदि रहते तो उसके और अनिल के बीच में यह दुराव क्यों ?वैसे भी उस बंदे को समझाना सदा से एक टेढ़ी खीर ही रहा था | कोई था तो विवेक और आना जिनकी बातें न जाने कैसे वह एक बार में नहीं तो बैठाकर सही प्रकार से चर्चा करने पर समझ जाता |इस मामले में तो विवेक व आना को पड़ने की कोई ज़रूरत नहीं थी |न जाने क्यों अनिल की माँ को यह बात पसंद न आती कि उनका दामाद आना की बात आँख मूंदकर मानता है | उन्हें लगता कि आना अपना घर भरने के लिए शीनोदा पर इतनी छाई रहती है | जितने दिन रंजु उनके पास रही थी उन्होंने आना व उसके परिवार के विरुद्ध उसे भड़काकर गौड परिवार के इतना विरुद्ध कर दिया था कि कभी-कभी आना को अपने रिश्ते को बचाने की चिंता होने लगती |यह सब जब विवेक को महसूस होने लगा उन्होंने अपनी पत्नी से कहा;
“देखो ! शीनोदा कितनी ज़िद कर रहा था कि हम साथ में ही मकान खरीदेंगे और साथ ही रहेंगे | कितना अच्छा हुआ ---”आना चुप हो गई, सच बात थी वाकई बहुत अच्छा हुआ था| ऐसा काम ही क्यों हो कि संबंधों में खटास पैदा हो?वैसे कोई संबंध भी नहीं था और वैसे इतना गहरा संबंध कि चटकने के अहसास से ही जैसे मन में सूनापन पसरने लगे|
जो भी हो जाए, आप हो जाए यानि रफ़्तार में होता जाए, युद्ध करने की जीवन में ज़रूरत न हो पर होता है, करता है इंसान युद्ध अपने भीतर ही भीतर----और यह तो हम सब जानते हैं कि हर इंसान को अपना युद्ध अपने आप करना होता है!!
शीनोदा की सास की समझ में कभी यह नहीं आया या उन्होंने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि रिश्ता केवल काम निकलने तक ही नहीं रहता, रिश्ता ताउम्र का होता है या फिर उम्र भर के लिए समाप्त हो जाता है |जब कोई काम होता वे फ़ोन कर देतीं या फिर अपने पति को भेज देतीं किन्तु उसके बाद तू कौन?मैं कौन? विवेक इस बात से अब चिढ़ने लगे थे यद्धपि वे उनका काम कर देते और उन्हें कुछ कह भी न पाते किन्तु आना के सामने बड़बड़ तो करने ही लगते |
आदमी अपना काम निकल जाने के बाद दोस्तों को या जिन्होंने उस काम को करवाया है, उसे भूलने लगता है | उसे यह भी याद रखने की ज़रूरत नहीं होती कि किसके कारण वह सब हुआ था ?ईश्वर तो सब काम करवाते ही हैं लेकिन वे धरती पर तो उतर नहीं आते, किसी माध्यम से ही करवाते हैं न ?अभी तो उनका छोटा बेटा पढ़ाई कर रहा था, उसे पढ़ने के लिए कहीं विदेश जाना था जिसका इंतज़ाम अगर किसी तरह उसके पिता करते तो खाली तो हो ही जाते, कर्ज में भी डूब जाते |वह कर्ज़ तब तक न उतरता जब तक उनके बेटे कहीं ठीक प्रकार व्यवस्थित न हो जाते और सारा कर्ज़ उतार न देते |जीवन में इस प्रकार की व्यवहारिक समस्याएँ काफ़ी थीं लेकिन शीनोदा में कभी कोई परिवर्तन नहीं आया | वह जैसा था, वैसा ही बना रहा |
अपने सेवा मुक्त होने के बाद रंजु के पिता और मायके का पूरा परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो ही गया तभी तो अनिल की माँ के मन में उठने वाले नकारात्मक विचार सामने आने लगे थे |बॉबी यानि रंजु के छोटे भाई की पढ़ने की समस्या भी शीनोदा ने ऐसे चुटकियों में हल की कि किसी को कानोंकान खबर ही न होने दी | चुपचाप बॉबी से मिलकर यू.के की यूनिवर्सिटी में उसका प्रवेश करवा दिया और उसके लिए ज़रूरत के पैसे का पूरा इंतज़ाम कर दिया |यहाँ तक कि बड़े भाई अनिल तक को भी शीनोदा ने खबर नहीं लगने दी थी|जब उसका जाने का समय हुआ तभी सबको पता चला |वह अपने इन-लॉज़ को छोटा नहीं दिखाना चाहता था इसलिए जहाँ ज़रूरत पड़ती उनके हस्ताक्षर करवा लेता और काम आगे बढ़ा देता|केवल बॉबी ही जानता था या फिर गौडस ! ज़रूरत पड़ने पर जहाँ कहीं हस्ताक्षर लेने की ज़रूरत पड़ती, वह न जाने कैसे करवा लेता|
वहाँ जापान में भी शीनोदा का अपना घर था ही | बच्ची की दादी उससे बार-बार मिलना चाहतीं, उसकी प्रतीक्षा करती रहतीं|उनकी बूढ़ी आँखों में उनकी पोती घूमती रहती!वे अपनी पोती से मिलकर बहुत खुश हो जाती थीं लेकिन जैसा शीनोदा और रंजु का मन था कि माँ उनके पास रहें, उन्हें बच्चे का मोह भी अपने बेटे के पास नहीं रोक पाया |वे अपने बेटे-बहू के पास आती-जाती रहीं लेकिन ठहरती होटल में ही रहीं और शीनोदा अपने प्रोजेक्ट्स लेकर भारत आता-जाता रहा और अपने ससुर व पत्नी के लिए बनाए हुए घर में परिवार के साथ ठहरता रहा |
अब शीनोदा की सास का मन आना के परिवार के लिए बिलकुल बदल चुका था | हद तो तब हो गई जब उनका अपना बड़ा बेटा अनिल भी यह कहने लगा कि वह विवेक जी और आना दीदी की पसंद से विवाह करेगा, उसको अमेरिका से ऑफ़र आ चुकी थी और वह आना के घर रोज़ आकर लड़की देखने की एक प्रकार से ज़िद करता|अधिकतर सब स्थानीय लोग गौडस से अनिल के रिश्ते को जानते थे, वे उसके लिए लड़कियों के रिश्ते बताते | कभी आना को अनिल के साथ जाना होता, कभी लड़की का परिवार ही आ जाता | इस सबसे विवेक और आना अब थकने लगे थे |
अनिल की माँ अब आना और विवेक के साथ बहुत संबंध रखना नहीं चाहती थी लेकिन उनका बड़ा बेटा उस परिवार को छोड़ नहीं सकता था |शीनोदा किसी की बात में कोई दखल न देता, वह उसी तरह से इस परिवार से जुड़ा रहा जैसे पहले जुड़ा हुआ था | थोड़ी बहुत कोशिश भी की गई उसे समझाने की लेकिन उसकी समझ में न कुछ आना था, न आया | उसका आना के परिवार से वही व्यवहार रहा जो शुरू में था बल्कि हर वर्ष वह रक्षाबंधन पर आना के पास आने की कोशिश करता रहा |विवेक उसके लिए मित्र व मार्गदर्शक थे | वह जो भी करना चाहता पहले विवेक से ज़रूर साझा करता | जिस बात से शीनोदा की सास बहुत परेशान रहतीं और कुछ न कुछ कोशिश करती रहतीं, बेटी तो जब आती, माँ के प्रभाव में आ रही थी लेकिन उसके पति शीनोदा पर कोई असर ही नहीं पड़ता था| उसको जो करना होता, वह चुपचाप कर लेता था | सबको पता बाद में चलता, जब काम हो जाता |
बेशक किसी पर कोई असर नहीं पड़ता था फिर भी प्रयास तो ज़ारी रहते ही| अनिल ने आना और विवेक के साथ अपने विवाह के लिए लड़कियाँ देखनी शुरू कर ही दीं थीं|यह भी जब कभी शीनोदा व रंजु की शादी की बात चल रही थी तब उसके माता-पिता ने ही कहा था कि दीदी से ही कहना अनिल के लिए लड़की देखेंगी | लेकिन यह तब की बात है जब उनकी शादी हो रही थी |बाद में दामाद और मकान पाने के बाद तो माँ के दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गए | शीनोदा व रंजु जापान में एक तरह से सैटल हो ही चुके थे| शीनोदा अपने प्रोजेक्ट के सिलसिले में भारत आता रहता और आना व विवेक से अनिल की सहायता करने की बात करता |विवेक घुमा-फिराकर शीनोदा को समझाने की कोशिश भी करते कि उसके ‘इन-लॉज’ को अनिल के लिए लड़की तलाश करना पसंद नहीं आएगा | बेहतर है कि वह उनसे ही अनिल के रिश्ते के बारे में बात करे |
“बट व्हाई ---?” बार-बार उसके इस प्रश्न का उत्तर देना टेढ़ी खीर थी और अनिल क्या चाहता था, एक दोस्त होने के नाते शीनोदा को मालूम था इसीलिए वह अक्सर विवेक से अनिल की सिफ़ारिश करता रहता|
अब वे उसे क्या बताते कि स्वार्थ मनुष्य के संस्कार में होता है, फिर व्यवहार में ढल जाता है|बारिश के थम जाने के बाद इंसान को बरसाती और छाता भी बोझ लगने लगते हैं |
विवेक को कई बार इस बात से परेशानी होती कि अनिल के माता-पिता के वहाँ रहते उन्हें आखिर इस चक्कर में पड़ने की क्या ज़रूरत है ? वह हर लिहाज़ से ठीक थे, बेटा उनका था, उन्हें उसके निर्णय लेने का अधिकार भी था लेकिन उस लड़के का क्या करते जो बोलता तो अधिक नहीं था लेकिन आना के कंधे पर सिर रखकर बच्चे की तरह रोने लगता था |इतनी सारी लड़कियाँ देखने के बाद आना को जो उसके लिए लड़की पसंद आई थी, वह उसी से विवाह करना चाहता था लेकिन माँ बिफर गई थीं |उनके पास कोई हरिद्वार का रिश्ता आया था और वे उसमें रुचि दिखा रही थीं | अनिल न बोलते हुए भी अपने व्यवहार से सब कुछ बोल गया था और उसने अपने मौन शब्दों से डिक्लेयर कर दिया था कि वह उससे ही शादी करेगा जिसको आना ने उसके लिए पसंद किया था | फिर तो माँ का पारा और भी आसमान पर चढ़ गया लेकिन हुआ वही जो होना था | अनिल ने आना की पसंद की हुई लड़की से विवाह किया और माँ के हाथ से हरिद्वार वाली प्रॉपर्टी निकल गई | वह तो जुगाड़ करके अमरीका उड़ गया जहाँ उसका जॉब फ़िक्स हो ही चुका था|
शीनोदा ने दोस्त का भरपूर साथ दिया था और एम्बेसी में पहचान होने से अनिल का काम भी उतनी ही आसानी से करवा दिया था जैसे उसका अपना हुआ था | अनिल की माँ का मुँह फूलकर इतना कुप्पा हो गया कि विवेक ने विवाह समारोह में जाने से साफ़ मना कर दिया लेकिन आना दीदी तो फँसी हुई थीं | रंजु भी उन दिनों थी वहीं और माँ के प्रभाव में थी| उसने भी भाई को समझाने का बहुत प्रयत्न किया था लेकिन अनिल पर तो आना दीदी और विवेक का रंग ऐसा चढ़ा था जैसे ‘काली कांबली, चढ़े न दूजो रंग’!उसे और विवेक को तो बाद में पता चला कि हरिद्वार की लड़की इकलौती संतान थी और उसके पिता के पास भारी प्रॉपर्टी थी जिसके कारण उसकी माँ की लार टपक रही थी | अनिल किन्ही कारणों से पहले से ही पिता से खुला हुआ नहीं था, वैसे भी मूल रूप से वह कुछ चुप किस्म का लड़का था | बाद में आना को यह भी पता चला कि दरसल अनिल घर से भागकर पढ़ने आया था | पिता माँ की मुट्ठी में थे जो वे कहतीं बस वही फ़ाइनल होता|अब जापानी दामाद और मकान की मालकिन बनने के बाद उनका स्टैंडर्ड हाई हो गया था, और उन्हें लग रहा था कि अच्छा मौका था और भी अमीर बनने का लेकिन इस आना दीदी की वजह से हाथ से निकल गया |अनिल को तो भारत में रहना ही नहीं था|
जब अनिल परिवार से भाग आया था अथवा उपेक्षित व्यवहार से परिवार से बाहर आ गया था तब बहुत वर्षों तक वह परिवार में नहीं गया था | हाँ, जब वह पीएच.डी करने लगा तब घर जाने लगा था और माँ के माथे की लकीरें थोड़ी फीकी पड़ने लगीं थीं कि वे अनिल को कैश करवा सकेंगी और अनिल ---इस बात से शर्मिंदा भी था कि एक ओर तो उसके माता–पिता ने उसकी बहन का विवाह लड़के के पैसे से ही यानि उसके खर्चे पर ही किया था, दूसरी ओर बेटे के विवाह में माँ उसे ही भुनाने के सपने देख रही थीं | खैर किसी न किसी तरह टूँ–टूँ करके शादी हुई और अनिल अपनी पत्नी को लेकर अमेरिका उड़ चला |
रंजु वर्ष में एक बार भारत आने की कोशिश करती और अपने माता-पिता के पास आती रही और पति के कारण उसे आना के घर भी आना पड़ता | चार वर्षों में उसने दो और प्यारी सी बेटियों को जन्म दिया और शीनोदा खुशी से पगलाता, गर्वित होता रहा कि वह बेटियों का पिता है|
इस बार जब रंजु भारत आई, उसकी माँ बीमार थीं, कुछ दिनों के बाद वे इस दुनिया से कूच कर गईं | शीनोदा ने अनिल के साथ मिलकर एक बेटे की तरह ही सारे संस्कार, सारे कर्तव्य किए |बॉबी यू.के था, वह अपनी परीक्षा के कारण माँ के अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं आ पाया |बड़ी बहन उ.प्रदेश से पति के साथ पहुँच गई थी | उस समय विवेक और आना उस परिवार के पास थे जहाँ से उन्हें एक प्रकार से प्रताड़ित किया गया था |किसी एक की मूर्खता के कारण सभी रिश्तों को तोड़ा जाना बुद्धिमानी तो नहीं होती!
अनामिका व विवेक महसूसते कि ये रिश्ते कैसे कैसे होते हैं?क्यों बन जाते हैं ?बनते हैं तो निभाना होता है | कहाँ खरीदे जा सकते हैं ये ?कौनसे बाज़ार में?वह बाज़ार राष्ट्रीय हो सकता है, अंतर्राष्ट्रीय या फिर स्थानीय?उसके और आना के या कहें कि गौड़ परिवार के पास ऐसे बहुमूल्य रिश्ते थे जो न किसी बंधन में थे, न किसी सीमा में, वे उन्मुक्त थे और शीतल पवन में उनका स्नेह, लगाव, आत्मीयता महसूस की जा सकती थी |