Maharana Pratap - Chapter 3 in Hindi Spiritual Stories by Narayan Menariya books and stories PDF | महाराणा प्रताप - अध्याय 3

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महाराणा प्रताप - अध्याय 3

अध्याय 3: रक्तरंजित हल्दीघाटी
 

सूरज अब सिर पर था। हल्दीघाटी की पथरीली धरती पर रक्त बह रहा था, और हवा में तलवारों की टकराहट, घोड़ों की हिनहिनाहट और घायल सैनिकों की चीखें गूंज रही थीं। यह सिर्फ एक युद्ध नहीं था - यह मेवाड़ की आन-बान-शान की अंतिम परीक्षा थी!

 

रणभूमि में हाहाकार

राजपूतों की तलवारें लगातार शत्रु के खून से लाल हो रही थीं। मुग़ल सेना संख्या में कहीं अधिक थी, लेकिन प्रताप के वीर योद्धाओं ने हल्दीघाटी को उनके लिए नर्क बना दिया था।

"जय एकलिंग!"
"जय मेवाड़!"

इस गर्जना के साथ प्रताप के घुड़सवार दुश्मनों के बीच तूफान की तरह टूट पड़े।

 

रक्त की नदियाँ और चेतक का पराक्रम

चोट लगने के बावजूद,  चेतक बिजली की तरह दौड़ रहा था। उसकी गति इतनी तीव्र थी कि मुग़ल सैनिकों की तलवारें उसे छू भी नहीं पा रही थीं।

प्रताप की तलवार एक बार फिर हवा में चमकी - "शिंक!"
एक झटके में दो दुश्मनों के सिर धड़ से अलग हो गए।

मानसिंह अपने विशाल हाथी पर बैठा देख रहा था। उसकी आँखों में चिंता झलक रही थी। और मन ही मन सोच रहा था, "क्या प्रताप को हराना असंभव है?"

 

तोपों की गड़गड़ाहट और प्रताप की रणनीति

मुग़लों ने पीछे से तोपें दागनी शुरू कर दीं। धुएँ और आग से रणभूमि ढक गई। प्रताप ने तुरंत अपनी सेना को इशारा किया - "घेरो इन्हें! कोई पीछे नहीं हटेगा!"

राजपूतों ने बाज की तरह झपटकर मुग़ल तोपखाने पर हमला बोल दिया। देखते ही देखते, मेवाड़ी वीरों ने तोपों पर कब्जा कर लिया।

 

महाराणा प्रताप का भीषण आक्रमण

प्रताप ने चेतक की लगाम खींची और उसे आसफ खाँ के घोड़े की ओर दौड़ाया। चेतक, लहूलुहान होने के बावजूद, बिजली की गति से आगे बढ़ा, मानो युद्ध के देवता स्वयं उसे गति दे रहे हों। उसकी टापों की गूँज से धरती काँप उठी। मुग़ल सैनिक भय से सहम गए, लेकिन प्रताप के क्रोध की ज्वाला अब रुकने वाली नहीं थी।

"जय एकलिंग!" - प्रताप की गर्जना आसमान में गूंजी और उनकी तलवार वज्र की तरह गिरी - "छपाक!"

एक ही वार में मुग़ल सेनापति और उसका घोड़ा दो टुकड़ों में बंट गए! रक्त की धाराओं ने हवा को लाल कर दिया। चारों ओर भय और चीखें गूंजने लगीं।

 

 

मुग़ल सैनिकों ने जो देखा, वह उनके लिए मृत्यु का संदेश था। रक्तरंजित प्रताप की आँखों में एक अकल्पनीय क्रोध था, मानो काल स्वयं रणभूमि में उतर आया हो।

"भागो! यह कोई मानव नहीं... यह संहार का देवता है!"

महाराणा प्रताप का इतना भयानक आक्रमण देखकर युद्धभूमि पर भगदड़ मच गई। अकबर की सेना में मायूसी छा गई और उनके कदम पीछे हटने लगे। सेना की कई टुकड़ियाँ युद्धभूमि को छोड़कर भागने को मजबूर हो गईं, लेकिन प्रताप का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था।

 

चेतक का अंतिम बलिदान

चेतक ने महाराणा प्रताप को युद्धभूमि से निकालने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी। उसके पैर घायल हो चुके थे, लेकिन वह रुका नहीं। अंततः, एक विशाल नाला आया, जिसे पार करना असंभव लग रहा था। लेकिन चेतक ने अंतिम छलांग लगाई!

महाराणा प्रताप सुरक्षित उस पार पहुँच चुके थे, लेकिन चेतक अब और नहीं चल सकता था। प्रताप घोड़े के पास झुके और उसकी गर्दन को गोद में लेकर बोले, "मेरे मित्र, तूने जो किया, वह इतिहास में अमर रहेगा।"

चेतक के प्राण निकलते ही महाराणा प्रताप की आँखों से आँसू बह निकले। लेकिन अगले ही क्षण, उनके भीतर भयानक ज्वाला धधक उठी। उनका क्रोध ऐसा था मानो स्वयं मेघ गरज रहे हों, आकाश कांप रहा हो।

फिर उन्होंने आकाश की ओर देखा और दहाड़े, "अब रक्त की वर्षा होगी …"

 

उनकी गर्जना इतनी भयानक थी कि रणभूमि के सैनिक तक काँप उठे। मानसिंह ने यह दृश्य देखा, और उसके मन में भय की लहर दौड़ गई।

 

मानसिंह का पलायन और युद्ध का अंत

मानसिंह ने अपने चारों ओर देखा - मुग़ल सैनिक कट रहे थे, रणभूमि रक्त से सन चुकी थी, और प्रताप की तलवार अब भी बिजली की तरह कौंध रही थी। उनके क्रोध से प्रज्वलित आँखें मानो मृत्यु का आह्वान कर रही थीं। रक्त से भीगे हुए प्रताप को देख मानसिंह के हृदय में भय की एक ठंडी लहर दौड़ गई।

"यह कोई साधारण मनुष्य नहीं... यह युद्ध का देवता है! अगर अभी नहीं भागा, तो मेरा भी यही हाल होगा!"

 

मानसिंह की सांसें तेज़ हो गईं। उसके हाथ पसीने से भीग चुके थे। प्रताप की तरफ देखने का साहस भी उसमें नहीं बचा था। उसने अपनी सेना को कांपती आवाज़ में आदेश दिया – “पीछे हटो! सेनाएँ तुरंत पीछे हटें!”

लेकिन मुग़ल सेना अब नियंत्रण में नहीं थी। सैनिक दिशाहीन होकर भागने लगे। कुछ एक-दूसरे को कुचलते हुए गिर पड़े, कुछ अपने घायल साथियों को पीछे छोड़ते हुए भागे। चारों ओर घबराहट और चीखें गूंज रही थीं।

हल्दीघाटी की रणभूमि में अब बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी -

"महाराणा प्रताप की जय!"

"मेवाड़ की जय!"

प्रताप रक्त से सने खड़े थे। उनकी साँसें तेज़ थीं, उनकी आँखों में अग्नि जल रही थी। हल्दीघाटी की धूल में सने, तलवार को कसकर पकड़े हुए, उन्होंने दूर जाते मानसिंह की ओर देखा। यह जीत थी, लेकिन यह अंत नहीं था... असली युद्ध अभी बाकी था!

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