Maharana Pratap - 1 in Hindi Spiritual Stories by Narayan Menariya books and stories PDF | महाराणा प्रताप - अध्याय 1

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महाराणा प्रताप - अध्याय 1

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महाराणा प्रताप

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"जो मिट्टी के लिए जीया, वो इतिहास बना।

जो स्वाभिमान के लिए लड़ा, वो प्रताप बना।"

 

अरावली की पहाड़ियों में आज भी जब सूरज उगता है,

तो उसकी पहली किरण हल्दीघाटी की उस भूमि को चूमती है,

जहाँ प्रताप का संकल्प आज भी मिट्टी के हर कण में धड़कता है।

यह गाथा किसी राजा की नहीं,

उस विचार की है –

जो कहता है,

"मैं मिट सकता हूँ, पर झुक नहीं सकता।"

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लेखक: नारायण लाल मेनारिया

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समर्पण

यह पुस्तक समर्पित है मेरे आराध्य महाराणा प्रताप को - जिन्होंने हमें सिखाया कि स्वाभिमान ही सबसे अमूल्य धन है, और मातृभूमि की स्वतंत्रता से बढ़कर कोई धर्म नहीं।

यह समर्पण है उन अमर वीरों और अज्ञात नायकों को, जिनके त्याग और बलिदान से मेवाड़ और भारत की गौरवगाथा अमिट बनी रही। जिन्होंने रणभूमि में रक्त से इतिहास लिखा, और जिनकी गाथाएँ आज भी आत्मा को जागृत करती हैं।

यह पुस्तक समर्पित है उन माताओं को, जिन्होंने अपने आँचल में शौर्य को पाला, और ऐसे पुत्रों को जन्म दिया जिन्होंने राष्ट्र के लिए जीवन अर्पित कर दिया।

यह श्रद्धांजलि है मेरे पूर्वजों को, जिन्होंने बचपन से ही प्रताप की गाथाएँ सुनाकर मेरे अंतर्मन में स्वाभिमान और मातृभूमि-प्रेम की लौ प्रज्वलित की।

और अंततः, यह पुस्तक समर्पित है आपको – जो भारत के स्वर्णिम इतिहास को न केवल पढ़ना चाहते हैं, बल्कि उसे अपने हृदय में जीवित रखना चाहते हैं।


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भूमिका

महाराणा प्रताप पर एक पुस्तक लिखना निश्चय ही सरल कार्य नहीं है। भला उन वीरों के बारे में मैं क्या ही लिख सकता हूँ, जिनके त्याग और शौर्य के कारण सम्पूर्ण मेवाड़ स्वतंत्र रहा। जिन्होंने सिंहासन नहीं, स्वाभिमान चुना - और इतिहास को अपने रक्त से रचा।

मेरा जन्म भी उसी पावन मेवाड़ की भूमि पर हुआ है, जहाँ महाराणा प्रताप और उनके साथियों का रक्त बहा था। बचपन से उनकी गाथाएँ सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ। शायद इसी कारण यह मेरी एक विनम्र कोशिश है - कि उनकी वीरता, संघर्ष और स्वाभिमान को शब्दों में पिरो सकूँ।

यदि कहीं भी मुझसे कोई त्रुटि हुई हो, तो मैं हृदय से क्षमा प्रार्थी हूँ।

यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जिसमें पाठक स्वयं को उन क्षणों में उपस्थित महसूस करेगा। आप कभी हल्दीघाटी के रणक्षेत्र में वीरता का प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे, तो कभी आप स्वयं को उस क्षण में पाएँगे, जब महाराणा प्रताप घास की रोटियाँ खा रहे थे - और आपको ऐसा लगेगा मानो आप भी उनके साथ बैठे हों, उन्हीं रोटियों का स्वाद चख रहे हों, और उस हर कौर में त्याग, पीड़ा और स्वाभिमान की तपिश महसूस कर रहे हों।

हर पल आपको ऐसा लगेगा मानो आप उनके साथ ही संघर्ष कर रहे हों, उनके साथ ही साँस ले रहे हों।

महाराणा प्रताप की अमरता के पश्चात किस प्रकार उनके पुत्र और पौत्रों ने अपने कर्तव्य निभाए और उस स्वाभिमान की ज्योति को प्रज्वलित रखा - यह पुस्तक उसी गाथा का विस्तृत वर्णन है।

यह केवल अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा भी है। महाराणा प्रताप का त्याग और स्वाभिमान आज भी हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र और सम्मान से बड़ा कोई धर्म नहीं।

आइए, इस यात्रा का हिस्सा बनें और उन स्वर्णिम क्षणों को आत्मसात करें - जब स्वाभिमान, मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान ही सबसे बड़ा धर्म था।

अमेज़न पर प्रकाशित मेरी पुस्तक 'प्रताप: अंतिम स्वाभिमानी' का प्रथम अध्याय कुछ इस प्रकार है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। पूरी पुस्तक अमेज़न पर निःशुल्क उपलब्ध है, वहाँ जाकर आप उसे पढ़ सकते हैं।

 

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अध्याय 1: हल्दीघाटी की गूँज और युद्ध की गर्जना

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"स्वतंत्रता की कीमत होती है, और मैं इसे चुकाने के लिए तैयार हूँ!"

साल 18 जून 1576 - हल्दीघाटी का रणक्षेत्र।

सूरज अपनी प्रचंड गर्मी से पीले रेगिस्तान को और भी तप्त बना रहा था। चारों ओर धूल और बारूद की गंध थी। मेवाड़ की सेना, महाराणा प्रताप के नेतृत्व में, अपनी अंतिम परीक्षा के लिए तैयार थी। रणभूमि पर खड़े महाराणा प्रताप का चेहरा दृढ़ संकल्प से भरा था। उनकी तलवार सूर्य की किरणों में चमक रही थी, जैसे स्वयं काल भी आज उनके आगे झुकने को मजबूर हो। उनके पास चित्तौड़ की रक्षा का प्रण था, अपने पूर्वजों का सम्मान था, और अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र रखने की शपथ थी।

"आज मेरा रक्त बहे या उनका, पर यह धरती गुलामी स्वीकार नहीं करेगी!" ऐसा कह कर महाराणा प्रताप ने अपने घोड़े चेतक की पीठ थपथपाई। तो चेतक भी मानो समझ गया था कि आज का युद्ध असाधारण होगा।

दूसरी ओर, मुगल सेना हजारों की संख्या में, अकबर के सबसे विश्वासपात्र प्रमुख सेनापति आमेर के राजा मान सिंह के नेतृत्व में तैयार थी।

“आज राजपूत गौरव को मिट्टी में मिलाना ही होगा,” -  मान सिंह ने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी ढीली करते हुए मन ही मन सोचा।

उनकी आँखों में मुगल साम्राज्य की महत्त्वाकांक्षा झलक रही थी - यह युद्ध केवल प्रताप को हराने का नहीं, बल्कि राजपूत वीरता को इतिहास के पन्नों में दबाने का था।

तलवारें म्यान से बाहर आ चुकी थीं। घोड़ों की टापों से धरती कांप रही थी। मुगल सैनिकों की संगठित पंक्तियाँ, उनके धधकते मशालों की रोशनी, और उनकी निर्दयता से भरी आँखें - सब संकेत दे रही थीं कि आज का युद्ध केवल रक्त से नहीं, बल्कि भविष्य की लेखनी से लिखा जाएगा।

 

युद्ध का प्रारंभ

एक पल की शांति के बाद, युद्ध का नाद गूंज उठा!

महाराणा प्रताप ने अपनी सेना को इशारा किया, और हजारों राजपूत योद्धा "जय एकलिंग" - का नारा लगाते हुए आगे बढ़े। तलवारें टकराईं, घोड़े दौड़े, और रक्त की पहली बूंद धरती पर गिरी।

महाराणा प्रताप ने स्वयं सबसे आगे बढ़कर युद्ध किया। उनकी तलवार हर वार के साथ एक मुगल सैनिक को परास्त कर रही थी। चेतक, हवा से भी तेज दौड़ रहा था, और हर प्रहार दुश्मन सेना को धूल चटा रहा था। मुगल सैनिकों की आँखों में भय था, उनकी पंक्तियाँ टूट रही थीं।

"आज यह धरती केवल रक्त से रंगेगी, पर मेवाड़ नहीं झुकेगा!" - प्रताप गरजे।

हल्दीघाटी की धूल भरी हवा में तलवारों की चमक और युद्ध के नारों की गूंज रही थी। घोड़ों की टापें, तलवारों की टकराहट और योद्धाओं के जयकारे रणभूमि को गुंजायमान कर रहे थे।

महाराणा प्रताप, अपने प्रिय घोड़े चेतक पर सवार, दुश्मन की सेना को देख रहे थे। उनकी आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास था।

“आज का युद्ध हमारी अस्मिता का युद्ध है! हम मिट सकते हैं, लेकिन झुकेंगे नहीं!” - महाराणा ने अपनी सेना को ललकारते हुए कहा।

सामने मुगल सेना विशाल संख्या में खड़ी थी। मानसिंह तथा आसफ खाँ के नेतृत्व में मुगल घुड़सवार आगे बढ़ रहे थे। उनकी तलवारें सूरज की रोशनी में चमक रही थीं, लेकिन राजपूतों के हौसले उनसे भी ज्यादा तेज़ थे।

 

रणभूमि में भीषण संग्राम

प्रताप ने अपनी तलवार खींची और चेतक को संकेत दिया। क्षणभर में चेतक बिजली की तरह दौड़ पड़ा। राजपूती सेना ने भी उनके साथ युद्ध का जयघोष किया - “जय एकलिंग!”

जैसे ही सेनाएँ आपस में भिड़ीं, धूल का गुबार उठा। तलवारें लहू से रंगने लगीं। प्रताप ने एक झटके में मुगल सेनापति आसफ खाँ के रथ के पहिये काट दिए। चेतक छलांग मारकर आगे बढ़ा और महाराणा ने एक ही वार में दुश्मन के कई सैनिकों को धराशायी कर दिया।

“राणा आ रहे हैं! संभलो!” - मुगल सैनिक भयभीत होकर पीछे हटने लगे। लेकिन तभी, मानसिंह के निर्देश पर तोपें दागी जाने लगीं। धुआँ और आग ने युद्धभूमि को और भी भयानक बना दिया।

चेतक, समझ चुका था कि यह युद्ध असाधारण होने वाला है। अपने स्वामी के इशारे पर बिजली की गति से बढ़ता चला गया। महाराणा की तलवार हर दिशा में नृत्य कर रही थी - हर वार के साथ शत्रु पीछे हट रहे थे, हर प्रहार में प्रताप का प्रचंड संकल्प स्पष्ट था।