Lal daag - 3 in Hindi Women Focused by ARTI MEENA books and stories PDF | लाल दाग़ - 3

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लाल दाग़ - 3

धीरे-धीरे Sneha की आँखों में नींद उतर आई।
सुबह जब उसकी नींद खुली, तो उसने देखा कि उसके बिस्तर पर खून के दाग लगे हुए थे।
रात भर जो सवाल उसके मन में घूमते रहे थे, सुबह उठते ही फिर सामने खड़े हो गए।
उसने चुपचाप अपनी चादर उठाई और उसे धोने के लिए ले गई। अपने कपड़े भी साथ में धोए… और फिर खुद को संभालने के लिए नहा ली।
माँ ने जो कपड़ा दिया था, उसे उसने अच्छे से धोया और सबकी नज़रों से बचाकर सुखा दिया।
अभी उसे सब कुछ पूरी तरह समझ नहीं आया था… लेकिन एक ही दिन में जो उसके साथ हुआ था, उससे वह इतना ज़रूर समझ गई थी कि यह कोई छोटा बदलाव नहीं है।
उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—
क्या अब ये हमेशा होता रहेगा?
क्या हर बार मुझे मंदिर से दूर रहना होगा…
और रसोई के पास भी नहीं जाना होगा?
आज जब स्कूल जाने का समय हो रहा था, तो उसका बिल्कुल मन नहीं था जाने का।
कल स्कूल में जो उसका मज़ाक बना था, उस शर्मिंदगी से वह अभी तक उबर नहीं पाई थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज वह सबकी नज़रों का सामना कैसे करेगी।
उसे लग रहा था, जैसे आज भी हर नज़र उसी पर टिक जाएगी…
लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वह कमज़ोर थी।
वह बस इस डर से स्कूल नहीं जाना चाहती थी कि कहीं फिर से कपड़ों पर दाग न लग जाए।
माँ ने भी उसे मना कर दिया—
“2–3 दिन आराम कर ले, फिर चली जाना स्कूल।”
अब वह 2–3 दिन घर में चुपचाप रहने लगी।
न किसी के साथ खेलना… न किसी से ज़्यादा बात करना।
जो Sneha दो दिन पहले घर में उछलते-कूदते दौड़ती थी,
हँसी-ठहाके लगाती थी…
आज वह बिल्कुल मौन हो गई थी।
मानो उसे कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई हो —
या कम से कम उसे ऐसा ही महसूस कराया जा रहा हो।
2–3 दिन बीत गए। अब सब सामान्य हो चुका था।
उसे फिर से स्कूल जाना था।
वह तैयार तो हो गई, लेकिन मन अभी भी तैयार नहीं था।
उसके भीतर हज़ारों सवाल थे —
क्या सब उसे घूरेंगे?
क्या फिर से उसका मज़ाक बनेगा?
अब वह अपने छोटे भाई के साथ स्कूल जा रही थी।
रास्ते में भाई ने मासूमियत से पूछा—
“दिदी, आप इतने दिन से स्कूल क्यों नहीं जा रही थीं? आपको क्या हो गया था?”
उसके इस सवाल पर Sneha कुछ पल चुप रह गई।
अगर उसे खुद ही सब समझ आया होता…
तो शायद आज वह इतनी चुप और उलझी हुई महसूस नहीं कर रही होती।
अब वे स्कूल पहुँच चुके थे।
चारों तरफ सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था—
बच्चों की चहल-पहल, बातें, हँसी…
मानो कुछ भी नहीं बदला हो।
लेकिन Sneha के अंदर बहुत कुछ बदल चुका था।
लेकिन उसे अपनी कक्षा में जाने से डर लग रहा था।
शर्म और झिझक अभी भी उसके मन में थी।
वह बस यही चाह रही थी—
काश सब लोग उसे भूल जाएँ…
काश आज कोई उसकी तरफ देखे भी नहीं।
वह धीरे-धीरे कक्षा में गई
और चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गई।
लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ, जैसा वह सोच रही थी।
शायद सब कुछ पीछे छूट चुका था… क्योंकि बच्चे अक्सर बातों को ज़्यादा दिनों तक याद नहीं रखते।
यह महसूस होते ही उसके दिल का बोझ थोड़ा हल्का हुआ।
वह धीरे-धीरे अपनी सहेलियों से बात करने लगी
और जो पढ़ाई उससे छूट गई थी, उसके बारे में जानने लगी।**“समय के साथ सब धीरे-धीरे सामान्य हो गया।
उसकी ज़िंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने लगी —
रोज़ स्कूल जाना, घर आकर खेलना, हँसना…
घर में उसकी उछल-कूद और हँसी फिर गूँजने लगी थी।”**“कुछ दिन बाद स्कूल में एक नई टीचर के आने की खबर मिली।
जब वह पहली बार स्कूल में आईं, तो सबकी नज़रें उनकी तरफ चली गईं।
लंबा कद, सधा हुआ व्यक्तित्व, हल्के लंबे बाल…
सूट-सलवार में वह बेहद सादगी और आत्मविश्वास से भरी हुई लग रही थीं।”कुछ ही समय में सबको उनका नाम पता चल गया — माया मैम।
बच्चों के चेहरे पर उन्हें देखकर अलग-सी खुशी थी,
क्योंकि वह उनके स्कूल की पहली महिला टीचर थीं।
खासकर लड़कियों को ऐसा लग रहा था,
जैसे अब स्कूल में कोई ऐसा है जो उन्हें बेहतर समझ सके| "Sneha तब छठी कक्षा में पढ़ती थी।
ग्रामीण माहौल के बच्चों की तरह, उनकी दुनिया सीमित थी —
वे वही जानते थे, जो घर और स्कूल उन्हें सिखाते थे।
फिर भी पढ़ाई के मामले में सभी बच्चे बहुत लगन से पढ़ते थे।”“समय के साथ सभी बच्चे माया मैडम से घुलने-मिलने लगे।
वे उनसे बेझिझक सवाल पूछते,
और उनकी हर बात को ध्यान से सुनते थे।
माया मैडम भी बच्चों को बहुत प्यार और धैर्य से पढ़ाती थीं।”“कुछ समय बाद कक्षा 7 की सुधा के जीवन में भी वही बदलाव आया।
महीनों की शुरुआत होते ही वह घबरा गई,
क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है।”“शायद यही सबसे बड़ी मुश्किल है…
ग्रामीण इलाकों में आज भी इस विषय पर खुलकर बात करने से लोग झिझकते हैं।
चुप्पी इतनी गहरी है कि सही जानकारी बच्चों तक पहुँच ही नहीं पाती।”**“जैसे ही माया मैडम को सुधा की हालत के बारे में पता चला,
वह तुरंत उसके पास पहुँचीं।
सुधा चुपचाप बैठी रो रही थी।
शर्म से उसका सिर झुका हुआ था…
वह किसी की आँखों में देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थी।”