मैडम ने अपने बैग में देखा कि अगर उनके पास पैड हो तो वे सुधा को दे दें, लेकिन आज उनके बैग में पैड नहीं था। अब मैडम समझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें। उधर सुधा रो-रोकर और शर्म के कारण बहुत असहज महसूस कर रही थी।
मैडम ने उसे समझाने की कोशिश की और कहा, “इसमें घबराने या शर्माने की कोई बात नहीं है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है, जो हर लड़की को एक उम्र के बाद होती है।”यह बात सुनकर कई बच्चियाँ घबरा गईं। जिन बच्चियों को अभी तक माहवारी शुरू नहीं हुई थी, उन्हें भी डर लगने लगा कि एक दिन उनके साथ भी ऐसा ही होगा।
बच्चियों की यह स्थिति देखकर मैडम बहुत दुखी हुईं। उन्हें महसूस हुआ कि यहाँ बच्चियों को इस विषय में जरूरी जानकारी भी नहीं दी गई है।मैडम ने सुधा से पूछा, “क्या तुम्हें इसके बारे में कभी तुम्हारी माँ ने या स्कूल में किसी टीचर ने नहीं बताया?”सुधा ने कहा, “नहीं मैडम, यहाँ तो इसके बारे में बात भी नहीं करते और न ही किसी को पता लगने देते। अब मैं घर जाऊँगी तो माँ बहुत डाँटेंगी कि मैंने कपड़े गंदे कर लिए।”
यह सुनकर मैडम बहुत दुखी हुईं। उन्होंने सोचा कि क्या आज 21वीं सदी में भी बच्चियों को इतना सहना पड़ रहा है, जहाँ इस विषय पर बात करना भी मानो अपराध माना जाता है।मैडम ने सुधा को अपना दुपट्टा दिया ताकि वह उसे बाँध सके, और फिर वे उसके साथ सुधा के घर की ओर चल पड़ीं।आज सुधा को भी वही महसूस हो रहा था, जो कुछ दिन पहले स्नेहा को हो रहा था, और शायद वहाँ की हर उस लड़की को होता होगा, जिसके साथ यह स्थिति पहली बार होती है।मैडम रास्ते में सोचती जा रही थीं — शहरों में इतने बदलाव आ गए हैं, लेकिन अभी भी गाँवों में इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जा सकती। यह कैसा विकास है?रास्ते में चलते-चलते मैडम ने देखा — सुधा बार-बार अपने कपड़ों को नीचे खींचकर देख रही थी, जैसे उसे हर पल डर हो कि कहीं कोई दाग दिख न जाए। उसके कदम धीमे थे, और हाथ काँप रहे थे। मैडम ने उसका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लिया — जैसे कहना चाहती हों, “तुम अकेली नहीं हो।”
सुधा के मन में एक ही बात चल रही थी —
काश… किसी ने पहले बता दिया होता… काश आज स्कूल में मुझे ऐसे शर्मिंदा न होना पड़ता…
उसे याद आ रहा था — घर में जब कभी इस बारे में बात होती थी तो सब धीरे बोलते थे… या बात ही बदल देते थे। उसे हमेशा लगा था कि शायद यह कोई बहुत बड़ी गलती होती होगी।
उधर स्नेहा, जो कुछ दूरी से यह सब देख रही थी, उसके मन में भी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उसे अपना पहला दिन याद आया — डर, शर्म, अकेलापन… और सबसे ज्यादा यह एहसास कि जैसे उसके साथ कुछ ऐसा हो गया है जिसे छिपाना जरूरी है।
उस दिन पहली बार स्नेहा को लगा —
अगर उस दिन किसी ने मुझे समझाया होता… तो शायद मैं इतना नहीं डरती…
मैडम के मन में एक फैसला आकार ले रहा था। उन्होंने सोचा —
“अगर आज भी हम चुप रहे, तो हर साल नई सुधा… नई स्नेहा… ऐसे ही डरती रहेंगी।”
उन्होंने मन ही मन तय किया —
अब इस स्कूल में कोई लड़की बिना जानकारी, बिना सहारे, बिना समझ के इस दौर से नहीं गुज़रेगी।
सूरज ढलने लगा था। रास्ते पर लंबी परछाइयाँ बन रही थीं।
लेकिन शायद आज… किसी एक लड़की के मन का अंधेरा थोड़ा कम होने वाला था।अब सुधा और मैडम उसके घर के दरवाजे पर पहुँच चुके थे।
घर का दरवाज़ा आधा खुला था। दादी घर पर नहीं थीं। दादाजी बाहर किसी से बैठे बातें कर रहे थे। माँ शायद घर के अंदर काम में लगी हुई थीं, और पापा रोज की तरह काम पर गए हुए थे।
सुधा दरवाज़े पर ही ठिठक गई। उसके कदम जैसे आगे बढ़ ही नहीं रहे थे। उसे डर था — घर के अंदर जाने के बाद क्या होगा… डाँट पड़ेगी… या फिर वही चुप्पी, जिसमें सवाल पूछने की भी इजाज़त नहीं होती।
मैडम ने धीरे से उसकी तरफ देखा और हल्के से कहा,
“डरो मत… मैं हूँ तुम्हारे साथ।”
सुधा ने पहली बार थोड़ा साहस जुटाया और दरवाज़े के अंदर कदम रखा। उसके दिल की धड़कन तेज थी, लेकिन आज वह अकेली नहीं थी।अंदर जाकर मैडम ने सुधा की माँ को आवाज़ दी।
जैसे ही माँ की नज़र सुधा पर पड़ी, उनके चेहरे का रंग उड़ गया — मानो कोई बहुत बड़ी अनहोनी हो गई हो।
माँ घबराकर तुरंत सुधा के पास आईं, उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और धीमी लेकिन घबराई हुई आवाज़ में बोलीं,
“जल्दी जा… नहा ले… कहीं माँजी (दादी) न आ जाएँ।”
सुधा माँ की आँखों में डर साफ देख पा रही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि उससे गलती क्या हुई है — लेकिन माहौल ऐसा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।
मैडम यह सब देख रही थीं। उनके मन में कई सवाल उठ रहे थे —
क्या आज भी इतने घरों में बेटियाँ डर और चुप्पी के साथ बड़ी हो रही हैं?सुधा नहाने चली गई।
तब मैडम ने धीरे से सुधा की माँ से कहा,
“आप ऐसा क्यों कह रही हैं? इसमें सुधा की क्या गलती है?”
सुधा की माँ कुछ पल चुप रहीं। उनकी आँखों में झिझक भी थी और डर भी।
गाँव की कई औरतों की तरह उनके मन में भी इस विषय को लेकर गहरा डर बैठा हुआ था — मानो यह कोई सामान्य बात नहीं, बल्कि ऐसा कुछ हो जिससे हमेशा छिपकर ही निपटना पड़ता है।
मैडम को महसूस हो रहा था कि समस्या सिर्फ जानकारी की कमी नहीं है,
बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा डर, शर्म और चुप्पी भी है।माँ ने धीमी आवाज़ में मैडम से कहा,
“क्या करें मैडम… ये चीज़ ही ऐसी है। जब भी किसी लड़की को होती है, शर्म से सिर झुक ही जाता है। और रही औरत जात… हम क्या ही बोल सकते हैं इसमें? जैसे हमने अपने बचपन में सहा था, वैसे ही इन्हें भी सहना होगा।”
यह कहते हुए उनकी आवाज़ में मजबूरी साफ झलक रही थी —
जैसे वह खुद भी कभी खुलकर समझ नहीं पाईं, बस जैसा देखा और सहा, वैसा ही आगे बढ़ा दिया।
मैडम के दिल में एक कसक उठी।
उन्हें लगा — अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो हर पीढ़ी की बेटियाँ बिना समझे डरती ही रहेंगी।मैडम ने उस समय कुछ नहीं कहा,
लेकिन मन ही मन ठान लिया — अब वह इन बच्चियों को बिना समझे डर और शर्म में जीने नहीं देंगी।
फिर उन्होंने सुधा की माँ से धीरे से कहा,
“यहाँ आस-पास कोई दुकान है क्या? वहाँ से आप एक पैड का पैकेट ला दीजिए… सुधा को उसकी ज़रूरत पड़ेगी।”
माँ ने हैरानी से पूछा,
“पैड? ये का होता है, मैडम?”
मैडम कुछ पल के लिए चुप रह गईं।
उन्हें एहसास हुआ कि यहाँ सिर्फ डर ही नहीं, जानकारी की बहुत बड़ी कमी भी है —
और शायद यहीं से बदलाव शुरू करना होगा।मैडम ने फिर शांत स्वर में कहा,
“अभी आप उसे एक साफ कपड़ा दे दीजिए… गंदे कपड़े से इंफेक्शन हो सकता है।”
इतना कहकर मैडम घर से बाहर आ गईं।
कुछ देर वहीं खड़ी रहीं और गाँव के माहौल को देखती रहीं।
उनके मन में कई सवाल उठ रहे थे —
क्या आज भी इतनी सारी बच्चियों और महिलाओं को बिना समझे, बिना जानकारी के, इतना कुछ सहना पड़ रहा है?
क्या डर और चुप्पी ही उनकी किस्मत बनकर रह जाएगी?
मैडम ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन सोचा —
“नहीं… अब कुछ बदलना होगा।
अगर बात करना ही पहला कदम है, तो शुरुआत यहीं से होगी।”अब मैडम स्कूल की तरफ चल पड़ीं।
काफ़ी समय हो चुका था — स्कूल की छुट्टी का समय भी हो गया था, और उन्हें अपने घर भी लौटना था।
मैडम रोज़ शहर से बस से स्कूल आती थीं,
और शाम को दूसरी बस से वापस घर जाती थीं।
चलते-चलते आज का पूरा दिन उनके मन में घूम रहा था —
सुधा का डर, उसकी माँ की मजबूरी, और गाँव की वह चुप्पी…
जो पीढ़ियों से चलती आ रही थी।
बस स्टॉप की ओर बढ़ते हुए उन्होंने मन ही मन तय किया —
कल से कुछ अलग होगा।
कम से कम इस स्कूल की बच्चियाँ डर और अनजानेपन में नहीं जिएँगी।मैडम घर पहुँचीं तो सीधे अपनी माँ के पास गईं और बोलीं,
“माँ, आज आपको एक बहुत ज़रूरी बात बतानी है।”
उन्होंने गहरी साँस ली और आगे कहा,
“आज स्कूल में एक बच्ची को पहली बार ये हुआ… और वो बहुत रोने लगी। बाकी बच्चियाँ भी डर गई थीं — जैसे उनसे कोई बहुत बड़ी गलती हो गई हो, जैसे उन्होंने कोई पाप कर दिया हो।”
उनकी आँखों में दिन भर के दृश्य तैर रहे थे —
डर, शर्म, चुप्पी… और जानकारी की कमी।
फिर उन्होंने थोड़ी भारी आवाज़ में कहा,
“क्या आज, जब देश इतना आगे बढ़ रहा है, तब भी गाँवों के लोगों की सोच में बदलाव नहीं आया?
क्या आज भी लड़कियाँ इसी डर और शर्म के साथ बड़ी होंगी?”
थोड़ा रुककर उन्होंने धीरे से पूछा,
“माँ… क्या आपने भी अपने समय में कपड़े का ही इस्तेमाल किया था?”
यह सवाल सिर्फ जानकारी के लिए नहीं था —
यह उन अनकही कहानियों को समझने की कोशिश थी, जो पीढ़ियों से बिना बोले आगे बढ़ती रही थीं।माँ ने मैडम की बात ध्यान से सुनी और धीरे से बोलीं,
“हाँ… उस ज़माने में सब कपड़े का ही इस्तेमाल करते थे। आज जो तुम लोग पैड इस्तेमाल करते हो, वो तो शायद पिछले 10–15 सालों में ज़्यादा आम हुआ है। पहले तो हर जगह कपड़ा ही इस्तेमाल होता था।”
उन्होंने कुछ पल रुककर गहरी साँस ली और आगे कहा,
“और हमारे समय में तो बहुत ज़्यादा पाबंदियाँ थीं… उस ज़िंदगी की याद मत दिलाओ। लगता था जैसे कोई अभिशाप हो वो समय महिलाओं के लिए।
घर में सब से अलग रहना पड़ता था… किसी बर्तन को छूना तक मना था।
रसोई घर हो या मंदिर — उसके आस-पास भी जाने की इजाज़त नहीं थी।”
माँ की आवाज़ में पुराने दर्द की झलक थी —
जैसे वो सब आज भी उनके अंदर कहीं ज़िंदा हो।
यह सब सुनकर माया के पैरों तले ज़मीन जैसे खिसक गई।
उन्हें एहसास हुआ — यह सिर्फ जानकारी की कमी नहीं है, यह पीढ़ियों से चला आ रहा डर और दर्द है।माया ने धीमी आवाज़ में माँ से पूछा,
“क्या आज की ज़िंदगी आपके लिए बेहतर है?
क्या अब वो डर आपको महसूस नहीं होता?”
यह सवाल सिर्फ वर्तमान के बारे में नहीं था —
यह उस पुराने दर्द और आज के बदलाव के बीच का फर्क समझने की कोशिश थी।
माया अपनी माँ के चेहरे को ध्यान से देख रही थी —
जैसे उनके जवाब में कई पीढ़ियों की कहानी छुपी हो।माँ ने शांत लेकिन गहरी आवाज़ में कहा,
“आज का समय तुम खुद देख रही हो।
क्या कभी तुम्हें ऐसा महसूस हुआ कि तुम्हें कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई है?
या कभी तुम्हें लगा कि तुमने कुछ गलत कर दिया है?”
उन्होंने माया की आँखों में देखते हुए आगे कहा,
“क्या तुम्हें कभी मंदिर के पास जाने से रोका गया?
या रसोई घर में जाने से मना किया गया?”
माँ ने हल्की साँस लेकर कहा,
“तो तुम समझ सकती हो…
आज की औरतों को उतना सब नहीं सहना पड़ रहा, जितना हमने सहा था।”
उनकी आवाज़ में दर्द भी था,
और कहीं न कहीं यह सुकून भी — कि आने वाली पीढ़ी शायद थोड़ा कम डरे।