Tere Mere Darmiyaan - 70 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियान - 70

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तेरे मेरे दरमियान - 70

कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे—

“लगता है आदित्य सर का सॉफ्ट साइड भी है।”


जानवी यह सब देख सुन रही थी, लेकिन आज उसे फर्क नहीं पड़ रहा था। उसके लिए आज बस आदित्य का हाथ और उसकी केयर मायने रखती थी।

चलते-चलते जानवी की नजर हर थोड़े-थोड़े समय में आदित्य पर चली जाती। उसके मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था:

जानवी :- “अगर यह आदमी इतना बुरा था… तो मेरा दिल अब इसकी तरफ ऐसे क्यों खिंच रहा है?”

जब भी आदित्य उसके पैर को ध्यान से देखता, हर कदम पर उसे संभालता, तो जानवी के भीतर एक नर्मी फैल जाती।

अशोक वहां पर आता है कुछ फाईले लेकर , जिसमे जानवी अपना सिग्नेचर कर देती है , अशोक कहता है --

अशोक :- कल से हमारा ये नया प्रोजेक्ट का काम सुरु हो जाएगा । बेटा जानवी , पैर की दर्द कम हूआ ।

जानवी आदित्य की और दैखकर कहती है ---

जानवी :- इन्होने पता नही क्या किया , दर्द कम हो गया । 

जानवी की बात पर आदित्य जानवी की और दैखता है और एक हल्की सी मुस्कान देता है । फिर दोनो वहां से डॉक्टर रागिनी के पास चला जाता है । 

कुछ दैर बाद डॉक्टर रागिनी का चैम्बर जहां पर डॉक्टर रागिनी जानवी के पैर पर बेंडेज बांध रही थी फिर कहती है --

रागिनी :- ज्यादा टेंशन की बात नही है , हल्की सी मोच आई है , एक दो दिन मे ठिक हो जाएगी । 

रागिनी आदित्य के गाल पर हाथ रखकर कहती है --

रागिनी :- और वैसे भी इसने तो पहले ही तुम्हार ट्रिटमेंट कर दिया है । 

रागिनी के इस तरह से आदित्य को छुना जानवी को पंसद नही आ रहा था , ये बात रागिनी नोटिस कर लेती है के जानवी को उसका आदित्य के करिब जाना या उसे ( आगित्य ) को छुना अच्छा नही लग रहा है , इसलिए रागिनी जानबुझकर आदित्य के करिब जाती है और उसे बार - बार टच करती है । 

तभी जानवी नाराज होकर बहाने से कहती है ---

जानवी :- मुझे घर जाना है , मैं थक गई हूँ ।

जानवी के इतना कहते ही आदित्य कहता है --

आदित्य: - हां , ठिक है , चलो मैं लेकर चलता हूं , अच्छा रागिनी अभी मैं चलता हूँ ।

रागिनी :- ठिक है , शाम को क्या कर रहे हो ?

आदित्य :- कुछ नही , बस फ्रि हूँ ।

रागिनी :- तो फिर , आज शाम को मिलते है , डिनर पे ?

आदित्य :- डिनर पे ! कहां तुम्हारे घर पर ?

रागिनी जानवी को चिड़ाने के लिए कहती है --

रागिनी :- क्या जानेमन , एक लड़की एक लड़का को सबके सामने घर पर क्यों बुलाएगी , शादी का रिस्ता लाना है क्या । अरे पागल तुम मुझे एक अच्छे रेस्टोरेंट लेकर चलोगे ।

आदित्य हसते हूए कहता है --

आदित्य: - अच्छा बाबा ठिक है , अब चलता हूँ , शाम को मिलता हूं ।

रागिनी :- बॉय डार्लिग. 

आदित्य :- बॉय ।

जानवी को रागिनी के आगित्य के साथ ऐसे बात करते हूए दैखकर अंदर ही अंदर चल रही थी , क्योकी जानवी के मन मे शायद आदित्य को लिए फिलिंग जागने लगी थी ।

शाम का समय था , घर पहुँचकर आदित्य उसे ( जानवी को ) पानी देता है, दवा लाकर देता है, और बिना कुछ कहे दूर बैठ जाता है ताकि जानवी असहज न हो।

जानवी अपनी जगह से उसे ( आदित्य को ) देखती है—तभी आदित्य उठता है और जानवी से कहता है --
आदित्य : - अभी के लिए दवाई तो मैने दे दी है , पर अब तुम्हें आराम की जरुरत है , तुम आराम करो मैं तैयार होकर आता हूँ ।

आदित्य वहां से अंदर चला जाता है , आदित्य मुड़कर नहीं देखता। ना कोई उम्मीद रखता है। बस चला जाता है।

जानवी के मन में एक धीमी, अनियंत्रित हलचल उठती है—

> “जो इंसान मेरे दर्द से ज़्यादा दुखी हो रहा है…वो गलत कैसे हो सकता है?”

उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं। होंठ काँपते हैं और पहली बार… उसका दिल फुसफुसाता है:

जानवी :- > “शायद… आदित्य मेरे लिए खास है।” इतना कुछ हो जाने के बाद भी मेरा मन आदित्य की और क्यों जा रहा है । आदित्य ने मेरे साथ इतना कुछ किया पर फिर भी मैं क्यूं आदित्य के बारे मे सोच रहा हूँ ।


जानवी ये सब सैच ही रही थी तभी आदित्य वहां पर आता है और जाने लगता है , जानवी को बुरा तो लगती है पर वो चाहकर भी आदित्य को रौक नही पाई और आदित्य वहां से रागिनी के पास जाने लगता है तभी वहां पर रागिनी आ जाती है , रागिनी को दैखकर आदित्य अपने हाथ के घड़ी मे समय दैखता है और कहता है --

आदित्य: - अरे रागिनी तुम यहां , मैं तो निकल ही रहा था और मुझे दैर भी तो नही हूई ।

रागिनी :- मैने सौचा क्यों ना तुम सबके साथ ही आज रात का डिनर किया जाए , ऐसे अकेले मे क्या मजा । 

आदित्य :- पर सुबह तुमने ही तो कहा था के ....!

रागिनी :- वो तो मैने ऐसे ही कह दिया था , अब तुम सिगंल थोड़ी ना हो , किसी का पति हो , तो मैं तुम्हें कैसे लेकर जा सकती हूँ ।

आदित्य :- वो सब तो ठिक है पर सबको बुलाना पड़ेगा ।

रागिनी :- मैने सबको बुला लिया है और उन से रात के लिए खाना भी मंगा लिया है , वो लोग बस आते ही होगें ।

कुछ ही दैर मे सभी आ जाते है , सभी एक साथ टेबल पर बैठ जाता है जिसमे जानवी भी थी , रागिनी आदित्य की और दैखे जा रही थी तो आदित्य रागिनी से पूछता है ---

आदित्य :- ऐसे क्या दैख रही हो ?

रागिना :- सौच रही हूँ के तुम मेरे नसिब मे क्यों नही हो ।

रागिनी के इतना कहने पर जानवी हैरान थी और रागिनी पर गुस्सा भी हो रही थी । आदित्य हल्की मुस्कान देकर कहता है --

आदित्य : - तुम तो मुझसे भी अच्छा डिजर्व करती हो रागिना ।

रागिना :- ऐसा सिर्फ तुम ही बोल सकते हो । पर तुम्हारे जैसा कोई नही है आदित्य, जिस तरिके से तुम जानवी का कितना अच्छा से ख्याल रखते हो । मुझे तो जानवी से जलन होती है ।

रागिनी के बात से सभी हैरान थे और जानवी रागिनी की और दैखती रहती है तो आदित्य रागिनी से पूछता है ---

आदित्य: - जलन क्यों होती है ?

रागिनी :- जानवी तुम्हें बिल्कुल भी पंसद नही करती है पर फिर भी भगवान ने उसके नसीब मे तुम्हें लिखा है , दैखो ना इतना कुछ हो गया पर तुम हमेशा जानवी के लिए खड़े रहते हो उसे इतनी बार गुडों से बचाया । भले ही जानवी को ये सब नाटक लग रहा है पर हम तो जानते है के सच क्या है , हर बार तुमने अपने जान पर खेल कर उसे बचाये हो और इतना ख्याल रखते हो ।

आदित्य :- ये सब क्या बोल रही हो रागिनी , जब तक जानवी मेरे पास है ये मेरी जिम्मेदारी है के मैं उसो खुश रखू ।

आदित्य जानवी की और दैखता है और कहता है ---

आदित्य :- जानवी , रागिनी की तरफ से मैं तुमसे माफी मांगता हूँ , असल मे ये मेरे साथ बचपन से है ना तो इसे लगता है के मैं बहोत अच्छा हूँ, ये ना मेरा बुराई सुनती है और ना मुझे प्रॉब्लम मे दैख सकती है इसलिए ये ऐसा बोल रही है ।

आदित्य की बात को सुनकर जानवी चुप ही रहती है तो रागिनी फिर कुछ बोलने जाती है तो आदित्य उसे रोकते हूए कहता है ---

आदित्य :- बस बस , अब खाना खाओ ठंडा हो जाएगा ।

सभी का खाना हो जाता है और सभी एक दुसरे से बात करने लगता है तभी रागिनी आदित्य का हाथ पकड़ती है और आदित्य को सबके सामने से उठाकर एक तरफ लेकर जाती है ये दैखकर जानवी को बहोत गुस्सा आता है ।

आदित्य और रागिनी बाहर एक जगह पर अकेले ही बैठ जाती है , रागिनी को आदित्य के साथ दैखकर जानवी को बहोत बुरा लग रहा था , जानवी के मन मे डर हो जाता है के रागिनी कही आदित्य को प्रपोज ना कर दे और आदित्य को उससे अलग ना कर दे ।

जानवी :- ये मुझे क्या हो रहा है , मैं आदित्य के साथ किसी और को क्यो नही दैख पा रही हूँ ।

जानवी वहां से उठती है और अपने दवाई लेने के लिए जाती है , तभी जानवी को रागिनी और आदित्य की आवाज सुनाई देता है जिससे जानवी चुपके से उन दोनो की बातो को सुनने लगती है । तभी रागिनी आदित्य से कहती है --

रागिनी :- आदित्य तुम्हें पता है , मैने तुम्हें रेस्टोरेंट क्यों बुलाया था ।

आदित्य कहता है --

आदित्य: - क्यों ?

रागिना :- सुबह जब मैं तुमसे प्यार से बात कर रही थी तब जानवी को मुझे तुम्हारे करिब दैखकर उसे बुरा लग रहा था । इसलिए उसके मन के जानने के लिए मैने तुम्हें बुलाया था ।

आदित्य :- चल कुछ भी ।

रागिनी :- मैं एक डॉक्टर हूँ और मैं लोगो के आंखो मे दैखकर उसके दिल का दर्द को पड़ सकती हूँ और वो जलन , वो दर्द मैने आज जानवी के आंखो मे दैखी है । वो तुमसे प्यार लगी है आदित्य ।


आदित्य चौंक जाता है।

आदित्य: - > “क्या? जानवी? नहीं यार… वो तो मुझसे नाराज़ रहती है।” जिसे मेरा शक्ल दैखना पंसद नही , क्या वो मुझसे प्यार करेगी ?

रागिनी हंसती है—

रागिनी: - > “नाराज़ वो उसी से रहती है… जिसे दिल कहीं ना कहीं अपना मान चुका होता है।”

ये बात सीधे जानवी के कानों में पड़ती है। वह परदे के पीछे छुपकर सुन रही होती है।

उसका दिल अचानक ज़ोर से धड़कने लगता है—

जानवी :- > “क्या मैं सच में… आदित्य के लिए कुछ महसूस करती हूँ?”
उसकी साँसे तेज़ हो जाती हैं। उसे समझ नहीं आता—भागे या वही खड़ी रहे।

आदित्य हल्की उदासी से कहता है—

आदित्य :- “जानवी मुझसे प्यार क्यों करेगी, रागिनी?” “उसकी जिंदगी में पहले ही इतना दर्द है…और मैं सिर्फ उसके लिए परेशानी बनूँगा। वो तो मुझे किडनेपर , गुडां , उसपर हमला करने वाला और ना जाने क्या - क्या सौचती है मेरे बारे मे , उसके लिए मैं सिर्फ एक गिरा हूआ इंसान हूँ बस , और यही सच है , तुम बेकार मे ही इतना कुछ सौच रही हो । ”

जानवी यह सुनकर एकदम ठहर जाती है।

रागिनी शांत आवाज़ में कहती है—

रागिनी: - > “प्यार परेशानी नहीं लाता, आदित्य…और हो सकता है, जानवी की सबसे बड़ी ताकत… तुम ही बन जाओ।”

इतना सुनते ही जानवी की आँखें भर आती हैं। वह खुद में पहली बार एक भाव महसूस करती है—

जानवी :- हे भगवान मैने आदित्य को कितना गलत समझा , वो तो हर बार अपनी जान को जोखिम मे डालकर मुझे बचाया है , रात हो या दिन , अगर घर आने मे दैर होती है तो वो मुझे ढुंडने निकल जाता है , जिस इंसान ने मेरे लिए इतना कुछ किया , मैने उसे दुख के सिवाय और कुछ भी नही दिया । पर अब पता नही क्यों “मैं आदित्य के बिना खुद को अकेला क्यों महसूस करती हूँ…?”

उसे एहसास होने लगता है कि शायद वह दूर सिर्फ इसलिए जा रही थी क्योंकि वह बहुत करीब आ रही थी।

तभी आदित्य का फोन रिंग होता है आदित्य अपना फोन निकालता है जिसमे विक्रम का फोन आ रहा था , आदित्य फोन रिसिव करता है और कहता है --

आदित्य :- हां इंस्पेक्टर बोलिये ।

आदित्य के मुह से इंस्पेक्टर का नाम सुनकर जानवी के कदम वही पर ठहर जाती है , उधर से विक्रम की आवाज आती है --

विक्रम :- सर हमे ये खबर मिली है के काली और विकास ने मिलकर आपको मारने की प्लानिंग किया है और किसी रंगा को आपकी सुपारी दी है ।

आदित्य कहता है --

आदित्य: - क्या विकास ने , पर वो ऐसा क्यों करेगा ?

विक्रम :- जैसा की मैने पहले भी आपसे कहा था के विकास और काली एक दुसरे से मिला हूआ है, और जानवी मेम का किडनेप भी उसी दोनो ने मिलकर किया था , शायद आप उनके काम मे बाधा बन गए हो इसिलिए वो आपको रास्ते से हटाना चाहते है ।

आदित्य :- थेक्यु ऑफिसर, मैं इस बात का पुरा ध्यान रखुगां ।

विक्रम :- ओके सर ।

आदित्य फोन कट देता है , जानवी को कुछ समझ मे नही आ रहा था के दोनो के बिच विकास के बारे मे क्या बाते हूई , तभी रागिनी आदित्य से पूछती है --

रागिनी :- क्या बात है आदित्य , क्या कहा इंस्पेक्टर ने ।

To be continue.....566