तीसरे वर्ष ऐसा हुआ कि मैंने जुलाई में ही बीए भाग एक का प्रवेश सम्पन्न कर 25 जलाई से बीए भाग एक की कक्षाएँ चलवा दिया। अध्यापक कॉलेज आते और बीए भाग एक की कक्षाओं में अध्यापन करते। इस समय तक किसी भी कॉलेज में बीए भाग एक की कक्षाएँ प्रारम्भ नहीं हुई थीं। डिग्री कॉलेजों में कक्षाएँ चलाने पर प्रायः जोर नहीं दिया जाता रहा। जब कक्षाएँ नहीं चलती हैं तब अध्यापक कॉलेज आकर लौट जाते हैं। अभी बीए भाग दो और तीन का परीक्षाफल भी घोषित नहीं हुआ था।
अन्य कॉलेजों में अभी पढ़ाई-लिखाई का कोई काम नहीं हो रहा था और वहाँ के अध्यापकों के सामने कोई काम नहीं था। डिग्री कॉलेजों में प्रायः लोग अगस्त-सितम्बर तक प्रवेश लेते रहते हैं जिससे कक्षाएँ देर से प्रारम्भ होती हैं। अधिकांश प्राचार्य प्रवेश में ही बहुत देर कर देते हैंं जिससे कक्षाओं का संचालन बहुत देर से होता है। यदि कोई प्राचार्य समय से प्रवेश कर कक्षाएँ प्रारम्भ करा देता है तो प्रायः कुछ अध्यापकों का मन ही मन रुष्ट हो जाना स्वाभाविक सा लगता है।
अभी तक मेरे कॉलेज में छात्रों ने छात्र-संघ की माँग नहीं की थी। उनकी समस्याएँ अधिकांशतः हल कर दी जाती थी। बच्चे अनुशासित रहकर पढ़ाई कर रहे थे। कुछ लोगों ने कुछ छात्रों को उकसाने की कोशिश की। कॉलेज में मैंने वाथरूम वगैरह को सही कराकर नये ढंग से बनवा दिया था। एक दिन कॉलेज गेट पर दस बारह छात्रों ने इकट्ठा होकर नारा लगाया- तानाशाही नहीं चलेगी। ये वही छात्र थे जिन्हें उकसाया गया था।
इस बीच मैंने बच्चों की उपस्थिति का रिकार्ड रखना शुरू किया था। जिनकी उपस्थिति शून्य पायी गयी उनके अभिभावकों को भी सूचित किया गया था। बी.ए. में त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम लागू हो चुका था जिससे अध्यापकों के ऊपर शिक्षण का भार बढ़ गया था। बच्चों ने जब नारा लगाना शुरू किया तो कुछ और बच्चे इकट्ठा हो गये और कुछ समय बाद पुलिस भी आ गयी। कुछ बच्चों ने बाथरूम में बने नए पेशाबघरों में तोड़फोड़ किया। पुलिस के आ जाने से बच्चे भी उत्तेजित हुए। बच्चों ने पुलिस पर पत्थर भी फेंके।
कालेज में पुलिस उपाघीक्षक भी आ गए। बच्चों के तोड़फोड़ को देखते हुए कॉलेज को बंद कर दिया गया। गोरखपुर राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय है। राजनीतिक दल छात्र-संघों में अपनी पैठ बनाते हैं। कॉलेज उनके लिए नर्सरी का काम करता है। बच्चे जब सक्रिय हुए तो उनके पीछे राजनीतिक दल भी आ गए। कुछ लोगों ने गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र-संघों में जाकर सहयोग माँगा।
मैंने भी अध्ययन करने की कोशिश की कि छात्र-संघों का वैधानिक रूप क्या है। ज्ञात हुआ कि 1959 में उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय में कहा है कि छात्र-संघ का क्रिया-कलाप अकादमिक क्रिया-कलाप है। इसलिए प्रायः न्यायालयों में छात्रसंघ के पक्ष में ही निर्णय हो जाता है। पहले छात्रसंघ अकादमिक कार्य करते भी थे। प्रयाग विश्वविद्यालय में जब मैं पढ़ रहा था उस समय स्वामी चिन्मयानन्द का गीता पर व्याख्यान छात्रसंघ ने ही आयोजित किया था जिसमें अध्यापकों और छात्रों की काफी संख्या उपस्थित रहती थी। कॉलेज में छात्र तो नहीं आ रहे थे किन्तु अध्यापक उपस्थित रहते थे और अगली कार्यवाही के लिए विचार विनिमय होता था। अभिभावकों की भी एक बैठक बुलाई गई जिसमें सभी ने कॉलेज को सुचारु रूप से चलाने पर सहमति व्यक्त की।
इस बीच छात्रों ने विश्वविद्यालय छात्र-संघ से सम्पर्क कर एक दिन कॉलेज के सामने प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। कॉलेज में छात्र नहीं आ रहे थे लेकिन उस दिन प्रदर्शन के लिए कुछ छात्र गेट पर आ गये। उनके साथ कुछ विश्वविद्यालय के छात्र नेता भी थे। इस बीच सीआईडी ने आकर बताया कि प्रदर्शनकारियों में कुछ उपद्रवी छात्र भी हैं जो मारपीट कर सकते हैं। पुलिस भी आ गयी थी। मैंने कहलवाया कि छात्रों का पक्ष रखने के लिए पाँच बच्चों का प्रतिनिधि मण्डल मेरे पास आकर अपनी बात रख सकता है। पर इसके लिए कोई तैयार नहीं हुआ। कॉलेज गेट के बाहर ही कुछ बच्चों की भीड़ थी। गेट पर पुलिस भी थी। मैंने गेट के अन्दर से ही जाकर बात की । छात्रों ने छात्रसंघ की माँग उठाई।
मैंने कहा कि छात्रसंघ के बारे में विचार किया जाएगा। वे चाहते थे कि लिखित रूप में दे दिया जाए कि छात्रसंघ का चुनाव कराया जाएगा। मैंने स्पष्ट किया कि लिखित नहीं दिया जाएगा। धीरे धीरे काफी देर हो गयी दिन डूबने को हुआ तो सभी बच्चे घर भागना चाहते थे। गोरखपुर के लोग भी भागने लगे और दिन डूबते-डूबते पूरा गेट खाली हो गया। जब कॉलेज खोला गया तो छात्रसंघ में रुचि लेने वाले बच्चों ने चुनाव-तिथि घोषित करने को कहा। अध्यापकों से विचार-विमर्श कर मैंने चुनाव के लिए नामांकन व मतदान की तिथि घोषित कर दी। चुनाव लड़ने के इच्छुक छात्र चुनाव-प्रचार में लग गये। गाँव-गाँव घूमकर वे प्रचार करते। कॉलेज के अन्दर प्रचार करने की अनुमति नहीं दी गई। इसलिए कक्षाएँ यथावत चलने लगीं।
एक दिन एक लड़का आया और कहा कि सर यदि निष्पक्ष चुनाव हुआ तो मैं ही अध्यक्ष बनूँगा। मैंने उसे आश्वस्त किया कि आप निश्चिन्त रहें, चुनाव पूरी ईमानदारी व पारदर्शिता के साथ कराया जाएगा। निर्धारित तिथि पर मतदान हुआ और चुनाव खत्म होते ही मतगणना शुरू कर दी गई। संयोग से वही यादव लड़का छात्रसंघ का अध्यक्ष चुना गया। उसे बसपा का समर्थन था जिन बच्चों ने तोड़फोड़ की थी, वे सभी चुनाव हार गये। चुनाव जीतने वाले बच्चों ने नारा लगाया ‘प्राचार्य की जय’। उत्तर प्रदेश में वह बसपा का पहला छात्रसंघ अध्यक्ष बना। आगे हर वर्ष निर्धारित समय पर चुनाव होता रहा। इस चुनाव में वे ही छात्र सफल होते जिन्हें पढ़ने-लिखने में रुचि होती थी।
मेरे पूरे कार्यकाल में छात्र-संघ प्रायः अकादमिक कार्यो में सहयोग ही करता रहा। बच्चों में यह धारणा बन गयी थी कि प्राचार्य द्वारा बच्चों के हित में ही सारे निर्णय लिये जाते हैं। प्रायः हर बच्चा यही सोचता कि कॉलेज में हमेशा हमें प्रोत्साहित किया जाएगा और बच्चों के प्रति किसी तरह का अन्याय नहीं होगा। बच्चों का पूरा विश्वास पाना मेरे लिये एक बड़ी उपलब्धि रही। छात्रसंघ का चुनाव बच्चे इसलिए भी लड़ते थे जिससे उन्हें कॉलेज के बाहर भी सम्मान मिल सके। अध्यक्ष या मंत्री हो जाने पर समाज से उन्हें सम्मान मिलता ही, अधिकारयों से भी छोटा-मोटा काम हो जाता था।
राजनीतिक दल के लोग भी उन्हें सम्मान देकर अपने दल में लाने का प्रयास करते थे। यही उनकी उपलब्धि होती और इसी में वे प्रसन्न रहते। साल में एक बार छात्र संघ की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया जाता जिसमें कॉलेज में राजनेताओं को आने का अवसर मिल जाता। इन्हीं कार्यक्रमों में श्री कलराज मिश्र, योगी आदित्यनाथ और समाजवादी खेमे के कई राजनेता कॉलेज में आते रहे। कॉलेज के पठन-पाठन में कभी व्यवधान नहीं पड़ा। प्रयास यही रहता कि अधिक से अधिक कक्षाएँ चलें। बहुत से बच्चों ने पुलिस या सेना की भर्ती परीक्षा में अपने को साबित किया।
कुछ बच्चे इण्टरमीडिएट ही नहीं डिग्री कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बन गए। आम जन में भी कॉलेज की बहुत अच्छी साख बनी। पढ़ाई के साथ ही हर वर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम और विद्वानों के व्याख्यान-सप्ताह का आयोजन कराये जाते। गोरखपुर विश्वविद्यालय के कई विद्वान-प्राध्यापक कॉलेज में आने के लिए इच्छुक रहते थे। अंग्रेजी, हिन्दी, राजनीति शास्त्र, भूगोल, संस्कृत, इतिहास सभी विभागों के अध्यापक कॉलेज आते। कॉलेज की ओर से उन्हें लाने ले जाने की व्यवस्था की जाती। इतने से ही वे प्रसन्न रहते।
राजनीति शास्त्र में विद्वान प्राध्यापक मणि जी प्रायः हर वर्ष विद्यालय में आकर बच्चों को सम्बोधित करते। भूगोल के प्रोफेसर जगदीश सिंह अंग्रेजी के प्रो. प्रताप सिंह मनोविज्ञान के प्रो. लाल बचन त्रिपाठी, प्रो. रस्तोगी हिन्दी में प्रो. विश्वनाथ तिवारी, चितरंजन मिश्र, अनन्त मिश्र, रामचन्द्र तिवारी ने विभिन्न अवसरां पर आकर बच्चों को सम्बोधित किया। इन व्याख्यानों में अतिथियों को माला पहनाने का काम नहीं किया जाता था। अधिकतर वे ही प्राध्यापक कॉलेज में बुलाये जाते जिन्होंने अपने क्षेत्र में कुछ अच्छा काम किया है। इससे कालेज के बच्चे भी लाभान्वित होते। बच्चे पूरे समय तक व्याख्यान सुनते और अन्त में अतिथियों से प्रश्न भी करते। प्राध्यापक बच्चों की जिज्ञासाओं को शान्त करने की पूरी कोशिश करते थे।
बच्चे लाभान्वित होते ही और आपस में महीनों तक चर्चा करते रहते। इससे अध्ययन-अध्यापन का स्वस्थ परिवेश बना। साप्ताहिक कार्यक्रम में शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम या नाटक का प्रदर्शन किया जाता।मेरे लिखे हुए नाटक ‘परतों के बीच’ और ’नशा’ का मंचन बच्चों ने कालेज में किया। बच्चों की ही माँग पर ‘उन्हें नींद नहीं आती’ नाटक लिखा गया जिसका मंचन कई बार कॉलेज में और कॉलेज के बाहर भी हुआ।
हमारे यहाँ एक अध्यापक ने गोरखपुर जेल के अन्दर कैदियों के सामने ‘उन्हें नींद नहीं आती’ का मंचन कराया। नाटक समाप्त होने के बाद कैदियों ने माँग रखी कि नाटक को दुबारा प्रदर्शित किया जाये और इस नाटक को उसी मंच पर दुबारा प्रस्तुत किया गया। कॉलेज में जब भी इस नाटक का प्रदर्शन हुआ तो दर्शकों ने खूब सराहा।