थाइलैंड में चाय को ‘चा’ कहते हैं जिसमें दूध नहीं डाला जाता। दूध मिलाकर चाय प्रायः होटलों में ही मिलती है। संगामी सत्रों में ही हम लोगों को अपने रिसर्च पत्र पढ़ने थे। मेरे रिसर्च पत्र का विषय था - प्ददवअंजपवदे ंदक चतम ेमतअपबम ेमबवदकंतल जमंबीमत मकनबंजपवद पद प्दकपं जिस सत्र में मैंने इस पेपर को पढ़ा उसमें करांची विश्वविद्यालय के कुलपति, मलाया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा कुछ अमेरिकी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शामिल थे। दस-पन्द्रह मिनट में अपने विषय को प्रस्तुत करना होता था। उसके बाद लोगों की जिज्ञासाओं-प्रश्नों का उ़त्तर देना होता था। कभी कभी अत्यन्त जरूरी बिन्दु उठाए जाते।
मेरे पत्र के सन्दर्भ में भी अमेरिकी विश्वविद्यालय के लोगों ने भी प्रश्न किए और मैंने उनका उत्तर दिया। इसी तरह विभिन्न सत्रों में भाग लेते हुए दिन बीतते रहे। अन्तिम दिन थाइलैंड विश्वविद्यालय के द्वारा थाईलैंड में अध्यापक शिक्षण में किये गये प्रयोगों के बारे में बताया गया और थामाथिरात ओपन विश्वविद्यालय कैम्पस का भ्रमण कराया गया। सायंकाल एक नदी के किनारे रेस्ट्राँ में भोज का आयोजन था। भोज के पूर्व हार्ड और साफ्ट दोनों तरह के पेय उपलब्ध कराए गए। बैरा ट्रे में फलों का रस लिए घूमते, कुछ की ट्रे में शराब होती। जो शराब के शौकीन थे वे उसे लेते और अन्य लोग फलों का रस।
आप जैसे ही गिलास खाली करेंगे बैरा फिर आपके सामने आ जाएगा। आप शराब या फलों का रस जो भी पीना चाहें अपनी इच्छा के अनुसार पीने के लिए स्वतन्त्र थे। रेस्ट्रा में एक यूरोपियन महिला ने मुझसे कहा कि यह दृश्य मुझे कश्मीर की याद दिलाता है। वहाँ पर विभिन्न देशों के भोज उपलब्ध थे। थाई, चीनी, यूरोपियन और कुछ भारतीय भी। आप अपनी रुचि के अनुसार जो चाहें ग्रहण कर सकते थे। भोज समाप्त होते-होते नौ बज गए। उसके बाद जितने प्रतिभागी उतनी ही थाई लड़कियाँ आ गयीं और वे आपके साथ नृत्य मुद्रा में चलती रहीं। इसका विडियो भी बनाया जा रहा था। इसी बीच आतिशबाजी हुई जिसमें लिखा था कि अगले वर्ष बैंकूवर में हम फिर मिलेंगे। सम्मेलन के दौरान थाई लोक-नृत्य का प्रदर्शन कराया गया।
आतिशबाजी खत्म होते ही सभी लोग अपनी बसों में बैठ गए और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। बस में बैठे हुए हमने देखा कि पूरा राजमार्ग लड़कियों और महिलाओं से भरा था। नौ बजे क्लब खुल गए थे जो दो बजे तक खुले रहेंगे। हमें बताया गया कि थाइलैंड की आमदनी का मुख्य स्रोत वेश्यावृत्ति है। इधर के वर्षो में सुनाई पड़ा है कि इस पर कुछ अंकुश लगा है। हम लोग अपने होटल पहुँचे। आरपी सिंह को रात में ही हांगकांग के लिए रवाना होना था इसलिए होटल का बिल चुकाया गया। रात में ही वे टैक्सी से हवाई अड्डे चले गये। मैं रात भर उसी कमरे में रहा। मुझे अगले दिन कौलालम्पुर और सिंगापुर के लिए रवाना होना था। अगले दिन मैंने दोपहर से पहले होटल छोड़ दिया और बस से हवाई अड्डे चला गया।
सम्मेलन में जो पेपर और फाइल मिली थी उसे मैने एयरपोर्ट पर जमा करवा दिया। उसके लिए एक छोटा सा बैग भी खरीदना पड़ा। थाई बाजारों में मोलभाव बहुत होता है। बैग का दाम चार पाँच गुना बताया जाएगा। आप कम से कम दाम लगाएंगे। जिस बैग का दाम दो सौ रुपये बताया जाएगा वह मोल भाव करते करते 40-50 रुपये में पड़ जाएगा। थाइलैंड में बौद्ध विहार बहुत हैं और सभी साफ सुथरे। बौद्ध भिक्षु आपको आस पास टहलते दिख जाएँगे, वहाँ राम और कृष्ण की भी पूजा होती है। मेरी फलाइट मलेशियन एयरलाइन्स की थी किन्तु उसमें यात्री बहुत कम थे। मैं भोजन करके उसमें बैठा था लेकिन 12 बजे रात्रि के बाद ही वहाँ भोजन परोसा गया और जब हवाई जहाज उड़ा तो कुछ लोग हम लोगों को उड़ान में कुछ दिक्कत आए तो छतरी से कैसे उतरना है, बताने लगे। सुबह तीन बजे के आस पास कौलालम्पुर में उतरे। सुबह होने में थोड़ी देर थी।
इसलिए मैंने होटल का रुख नहीं किया। हवाई अड्डे पर ही बैठ गया। वहाँ साड़ी पहने हुए एक महिला को सफाई करते देखा। मुझे लगा कि यह भारतीय वेश है। पता चला कि वह तमिल परिवार से है। मलेशिया में तमिल आबादी भी काफी है और वे सभी भारतीय मूल के हैं। हवाई अड्डे पर ही मुझे एक श्वेत व्यक्ति दिखाई पड़ा। मैंने उससे उसके देश के बारे में जानना चाहा। उसने उत्तर दिया- आई डोन्ट कम फ्राम एनी कन्ट्री। आई विलांग टु दिस वर्ल्ड। वह स्वयं किसी देश का नागरिक होगा और उसी पासपोर्ट से यात्रा कर रहा होगा। पर उसने अपने देश का नाम बताना जरूरी नहीं समझा। मैंने भी ज्यादा जोर नहीं दिया और ओके कहकर अपनी सीट पर बैठ गया। सुबह पाँच बजे हवाई अड्डे पर ही शौच आदि से निवृत्त होकर तैयार हुआ।
मेरे पास एक ही दिन का समय था क्योंकि मलेशिया में दूसरे दिन से ही वीजा का नियम लागू हो रहा था। यह बात हवाई जहाज से उतरते ही बता दी गयी थी। मैंने सोचा कौलालम्पुर में मलाया विश्वविद्यालय और एकाध चीजें यदि समय रहेगा तो देख लूँगा। रात में फिर हवाई अड्डे पर आ जाऊँगा और सुबह की फलाइट से सिंगापुर चला जाऊँगा। सूर्योदय से पहले का समय था। हल्का उजाला फैल गया था। मुझे बताया गया कि मलाया विश्वविद्यालय डेढ़-दो किमी दूर है। मैंने सोचा कि टहलते हुए विश्व विद्यालय पहुँच जाऊँगा। पर थोड़ी दूर जाने पर ही फ्लाईओवर का जाल दिखा। मुझे लगा कि इसमें मैं फँस कर पता नही कहाँ पहुँच जाऊँगा। फिर मैंने एक आटो किया उसने मुझे विश्वविद्यालय पहुँचा दिया। मैं अन्दर गया, देखा कि कैन्टीन खुली हुई है और उसमें कुछ लड़के-लड़कियाँ जलपान कर रहे हैं। मैं भी एक सीट पर बैठ गया और थोड़ी देर बच्चों के क्रिया-कलाप देखता रह।
कुछ लड़कियों के बैग में बुर्का भी दिखा। मैंने भी चाय-पकौड़ी का जलपान किया। विश्वविद्यालय खुल गया था। शिक्षा विभाग की एक महिला प्रोफेसर बैंकाक में मुझसे मिली थीं। मैं भी शिक्षा विभाग से सम्बद्ध था इसलिए शिक्षा विभाग ही देखने का मन बनाया। लगभग हर प्रोफेसर के पास चार पहिये वाली गाड़ी थी। विभाग के अध्यक्ष भी सम्मेलन में भाग लेने के लिए बैंकाक गये थे पर मेरी उनसे वहाँ भेंट नहीं हुई थी। विभाग में एक बंगाली महिला प्रोफेसर थीं। वे हमें अपने कक्ष में ले गयीं, चाय बना कर पिलाया और फिर उन्होंने मुझे एक तमिल प्रोफेसर के यहाँ बिठाकर अपनी कक्षा लेने चली गयीं।
तमिल प्रोफेसर का कमरा किताबों से भरा था। कुछ किताबे फर्श पर भी रखी थीं। वे शिक्षा के सामाजिक आधार के विशेषज्ञ थे। उनकी बातचीत से लगा वे अपने विषय में गहरी पैठ रखते हैं। लगभग पचास मिनट तक हम दोनों भारतीय संस्कृति और समाज पर बातचीत करते रहे। उन्होंने तमिल संस्कृति की विशेषताओं पर चर्चा की। बातचीत से ऐसा लगा कि वे तमिल संस्कृति की अच्छी जानकारी रखते हैं और उस पर गर्व भी करते हैं। बंगाली महिला जब व्याख्यान देकर लौटीं उनसे भी विभाग और उसकी कार्य पद्वति पर वार्ता हुई। वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि तीन चार महीने के वेतन से अच्छी कार मिल जाती है। उन्होंने आगे पूछा कि यहाँ के बाद आप कहाँ जाना चाहेंगे। मैंने कहा कि मेरे पास आज ही दिन का समय है। कोलालम्पुर में जो कुछ देखने लायक हो तो बताइए। मैं वही देख लूँ। यहाँ म्यूजियम भी है अगर उसे आप देखना चाहें तो मैं आपको छोड़ दूँगी।
मैं उनकी गाड़ी में बैठ गया। मुझे म्यूजियम में छोड़ कर वे बैंक चली गयी। उन्होंने यह अपेक्षा जरूर की कि आप लोग कोई कान्फ्रेंस करें तो हम लोगो को भी बुलाइए। उन्होंने कुछ रिसर्च पेपर भी मुझे दिए। विश्वविद्यालय में यह जरूर देखने को मिला कि हर प्रोफेसर किसी न किसी क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने में लगा है। हर शिक्षक अपनी कक्षा में भी काफी मेहनत करता है। मैं म्यूजियम के अन्दर गया। उसमें देखने को बहुत चीजें नहीं थीं। लेकिन वहाँ कुछ नक्शे जरूर देखने को मिले जिसमें मुस्लिम देशों को काले रंग से रंगा गया था। पूरा भारत भी काले रंग से रंगा हुआ था। इसका मतलब हुआ कि वे भारत को मुस्लिम देश के रूप में चित्रित करते हैं। मुझे यह बात खटकी क्योंकि भारत केवल मुस्लिम देश ही नहीं है। वहाँ से जब निकला तो फिर बाजार की तरफ चला गया। वहाँ मुझे तमिल महिलाएँ साड़ी पहने हुए दुकान चलाती दिखीं।
इससे लगा कि यहाँ महिलाएँ भी काम-काज में हिस्सेदारी करती हैं। बैंकाक में भी दुकानों का काम महिलाएँ ज्यादा सँभाल रही थीं। यही स्थिति कोलालम्पुर के बाजारों में भी दिख रही थी। मैं तो केवल दर्शक था। पर महिलाएं समझती थी कि खरीदने आये हैं और हर तरह से लुभाने की कोशिश करतीं। बाजार घूमने के बाद थोड़ी देर के लिए एक दुकान पर रुककर जलपान किया और शाम होते ही हवाई अड्डे पर आ गया। यहीं पर रात बिताया और सुबह सिंगापुर के लिए हवाई जहाज पर बैठ गया।
कौलालम्पुर से सिंगापुर के लिए आधे-आधे घंटे पर उड़ाने हैं। मेरा वायुयान जब सिंगापुर पर मँडराया तो उसकी सुन्दरता देखकर मन मंत्रमुग्ध हो गया। सिंगापुर में जब उतरा तो मैंने पहला काम यह किया कि एक हफ्ते के बाद सिंगापुर से लौटने का रिजर्वेशन कराया। पचास यूएस डालर का बैंक से सिंगापुरी डॉलर लिया। उस समय सिंगापुरी डॉलर का मूल्य छह रुपये के आस पास था। ये सब निपटाने के बाद मैंने सोचा कि उस क्षेत्र में चलें जहाँ भारतीय बसे हुए हैं।
भारतीय सेरंगून रोड पर अधिक थे। यद्यपि उनमें तमिल ही अधिक थे। मैं सेरंगून जाने वाली बस पर बैठ गया। वहाँ की बसों में कंडक्टर नहीं होते। ड्राइवर के पास एक मशीन लगी रहती है उसमें पैसा डालिये तो वह पंच कर देगा और टिकट निकल आयेगा। ड्राइवर एक चीनी महिला थी। उसने मुझसे पूछा कि कहाँ जाना है। मैंने बताया जहाँ बस जायेगी तो वह हँसने लगी। मेरे कमीज पर अब भी एस.पी. सिंह इण्डिया का बैज लगा हुआ था। मैंने एक यात्री से पूछा कि इसमें कितने पैसे डालने चाहिए। उसने जितना बताया मैने डाल दिया। ड्राइवर सीट पर बैठी महिला ने पंच किया और टिकट निकल आया।
टिकट लेकर मैं एक सीट पर बैठ गया। सिंगापुर की आबादी उस समय चालीस लाख थी और लगभग इतने ही लोग रोज वहाँ बाहर से आते हैं। सिंगापुर में सामान सस्ता मिलता है इसलिए सैर-सपाटे के साथ सामान खरीदने के लिए भी लोग वहाँ आते रहते हैं। सिंगापुर में सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है। आप अपना टिकट भी बाहर फेंक नहीं सकते। बस में एक डिब्बी रखी रहती है उसमें या फिर अपनी जेब में डाल लीजिए।
जगह जगह बोर्ड पर लिखा रहता है क्वदष्ज सपजजमत और उसी पर जुर्माने की राशि भी लिखी रहती है। सेरंगून टर्मिनल पर बस रुकी तो मैं उतर गया। दिल्ली में एक सरदार जी ने बताया था कि आप सेरंगून रोड पर अम्मा होटल में ठहर सकते हैं। पता लगा कर होटल पहुँचा, जहाँ अम्मा जी मिली। उन्होंने बताया कि एक दिन का यहाँ पचास सिंगापुरी डॉलर पडे़गा। मेरे साथ एक ब्रीफकेस था। मैंने सोचा जब शाम को रुकना होगा तब आ जाएँगे। सुबह करीब नौ बजे का समय था। मैंने सोचा कि एक पराठा लेकर जलपान कर लिया जाए। काम्पलेक्स में ही एक दुकान में जाकर एक पराठे का आर्डर देकर बैठ गया।