प्रश्न- महाविद्यालय भटवली बाजार में आप 15 वर्ष रह गये। वहाँ का अनुभव कैसा रहा ?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- 29 जून 1985 को मैनें महाविद्यालय भटवली बाजार में प्राचार्य का पदभार ग्रहण किया। यह कॉलेज बांसगांव तहसील में है। गोरखपुर राजनीतिक दृष्टि से अघिक जागरूक रहा है। बांसगांव तहसील के लोग देश के बाहर काफी हैं। बैंकाक तो उन लोगां का घर जैसा है। युवा बच्चे भी बैंकाक की राह पकड़ लेते हैं। बांसगांव इसीलिए घनी क्षेत्रों में माना जाता है। वहाँ दबंगई भी बहुत है।
मेरे प्राचार्य बनने के समय दूर-दूर तक दूसरा डिग्री कॉलेज नहीं था। दूर दूर से यहाँ बच्चे पढ़ने के लिए आते थे। उस समय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बहुत से कॉलेजों का नकल आदि के आरोप में परीक्षा परिणाम घोषित नहीं हुआ था। मेरे कालेज में परीक्षा ठीक से सम्पन्न कराने की कोशिश की गई थी, जिससे बहुत से बच्चे अनुत्तीर्ण हो गये थे।
मैंने कॉलेज को ठीक से चलाने के लिए कुछ निश्चित नियम निर्धारित किए। जैसे प्रवेश एक निश्चित तारीख तक किया जायेगा। 16 जुलाई को जब कॉलेज खुला तो प्रवेश प्रक्रिया शुरू हुई। कक्षाएँ जल्दी और नियमित चलाने में स्टाफ ने भी पूरा सहयोग किया। हमें अक्सर बताया गया कि यहाँ के छात्र कभी-कभी उदंडता भी करते हैं। पिछले सत्र में एक बच्चे ने स्टाफ रूम में ही एक लड़के को गोली मार दी थी जिससे उसकी मृत्यु हो गई थी। मैंने निर्णय लिया कि सभी बच्चों को अनुशासन के दायरे में लाया जाएगा।
मैंने दो चपरासियों की ड्यूटी गेट पर लगाई और छोटे गेट से ही बच्चों को कॉलेज परिसर में आने की अनुमति दी गई। कॉलेज में अप्रिय घटना रोकने के लिए मै स्वयं परिसर में टहलता रहता था ताकि अप्रिय घटना की संभावना को समय रहते नियंत्रित किया जा सके। कालेज परिसर में ही मैंने रहने का निर्णय लिया। कक्षाएँ जब सुचारु रूप से चलने लगीं तो बच्चों को बताया गया कि परीक्षा में नकल बिलकुल नहीं होगी, इसलिए सभी बच्चों को मनोयोगपूर्वक पढ़ना चाहिए। जो बच्चे अनुत्तीर्ण हो जाते थे उन्हें एक्स परीक्षार्थी के रूप में बैठने की सुविधा थी। जब परीक्षा फार्म भरा जाने लगा तो गोली चलाने वाले छात्र ने भी फार्म भर दिया। यद्यपि उसकी जानकारी हमें नहीं थी। पूरे सत्र नियमित रूप से कक्षाएँ चलीं।
एक सप्ताह सांस्कृतिक कार्यक्रम और अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। इससे पहले यदा कदा छिटपुट व्याख्यान हो जाया करते थे। मेरे पहले दो प्राचार्य वापस लौट चुके थे। इनमें एक थे डा. कन्हैया सिंह जो लगभग चार वर्ष काम करने के बाद डीएवी कालेज आजमगढ़ लौट गये थे। उसके बाद आयोग से यू.पी. शाही का चयन हुआ। उन्होंने दूसरे चयन में फिर आवेदन किया और शोहरतगढ़ डिग्री कॉलेज चले गये।
सत्र के शुरुआती दौर में ही कुछ विसंगतियों की ओर ध्यान गया। प्रबन्धक ने कुछ किताबों और सैन्य विज्ञान सामग्री का आदेश आगरा की एक फर्म को दे दिया था। पुस्तकें तो आयी थीं किन्तु सैन्य विज्ञान की कोई सामग्री कॉलेज में नहीं आयी थी। उस फर्म का भुगतान के लिए अनुस्मारक आने लगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पुस्तकों और प्रयोगात्मक सामग्री के लिए कुछ धन उपलब्ध कराया था किन्तु वह मैचिंग अनुदान था जिसमें कॉलेज को भी अपनी ओर से भी कुछ धन लगाना था।
प्रबंधक चाहते थे कि उस फर्म को विश्वविद्यालय अनुदान की राशि से भुगतान कर दिया जाए। कठिनाई यह थी कॉलेज की ओर से कोई धनराशि उपलब्ध नहीं थी। दूसरे जो सामग्री आयी ही नहीं उसका भुगतान किया ही नहीं जा सकता था। फलतः वह फर्म निरन्तर दबाव बनाती रही। एक बार तो आगरा में उसने कॉलेज के खिलाफ एफआईआर किया और एक दरोगा को लेकर कालेज आया चूंक यह आदेश मेरे पदभार ग्रहण करने के पहले का था इसलिए मेरी अघिक जिम्मेदारी भी नहीं थी। प्रबंधक कई खातों का संचालन करते थे। एक खाते से फर्म को कुछ भुगतान कर दिया। वे लोग लौट गये और विश्वविद्यालय अनुदान निघि से भुगतान नहीं किया जा सका। कालेज की कैशबुक वगैरह कुछ पीछे चल रही थी उसको भी धीरे-घीरे पूर्ण करने का प्रयास किया गया।
कुछ धनराशि प्रबंधक ने विभिन्न खातों से स्वयं निकाल ली थी। उसका कोई बिल बाउचर नहीं था। एक दो बार प्रबंधक जी से उस सम्बन्ध में चर्चा भी की गई किन्तु वे अंत तक कोई भी बाउचर उपलब्ध नहीं करा सके। मैंने डिग्री कालेज में अध्ययन और अध्यापन का परिवेश निर्मित करने का प्रयास किया। बच्चों और अध्यापकों ने भी पूरा सहयोग किया। जनवरी में पूरे एक सप्ताह व्याख्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय से कई प्रोफेसर आये और उन्होंने सम्बन्घित विषय पर व्याख्यान दिया।
सभी बच्चे और अध्यापक भी इस कार्यक्रम में पूरी तरह से सहयोग करते रहे। लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कालेज से भी बीएड के सभी साथी एक जीप करके कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए पहुँचे। आयोजन की पूर्व संध्या पर विभाग के सभी अध्यापक डा. मुरारी कष्ष्ण श्रीवास्तव, जयपाल सिंह, मोहिनी तिवारी और उर्मिला देवी ने रात्रि विश्राम किया और दूसरे दिन के कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। इस कार्यक्रम की अनुगूँज विश्वविद्यालय में भी रही। जो प्रोफेसर आये थे उन सभी ने कार्यक्रम की प्रशंसा की और पूरी तरह से सहभागी बने।
सायंकाल मेरा लिखा नाटक ‘परतों के बीच’ बच्चों ने प्रदर्शित किया। कालेज में यह एक नई परम्परा थी। कार्यक्रम व व्याख्यान का प्रभाव महीनों तक लोगों की जबान पर रहा। बच्चों ने भी बहुत कुछ सीखा। बच्चों को इस तरह तैयार किया गया था जिससे वे व्याख्यान के बाद प्रश्न पूछ सकें। यह परम्परा पूरे 15 वर्षो तक चलती रही। अध्यापन के बाद वार्षिक परीक्षा की बारी थी। मैं कालेज के कमरे में बैठा हुआ था कि वही लड़का जिसने कॉलेज में गोली मार दी थी मेरे सामने आया। उसने कहा कि मैने पूर्व छात्र के रूप में परीक्षा फार्म भरा है। पढ़ाई कुछ किया नहीं है तो मेरा काम कैसे होगा? मैंने कहा कि परीक्षा में नकल तो नहीं होगी। मेरे इतना कहते ही उसने कहा कि मेरी गोली का निशाना अचूक होता है।
मैंने कहा कि यदि मुझे मार देने से तुम्हारा काम बन जाए तो हमें कोई आपत्ति नही है लेकिन यहाँ मारोगे तो हो सकता है कि कोई देख ले या पकड़ ही लिए जाओ। ऐसा करो कि जिस दिन तुम मुझे मारना चाहते हो उस रात जहाँ तुम कहो मैं वहाँ आ जाऊँ। वहाँ मार दोगे तो कोई देखेगा नहीं, यहीं आमी नदी के किनारे कोई जगह चुन लो। मैं आ जाऊँ तुम मार दो। इस उत्तर से वह अचकचा गया और उलटे पाँव लौट गया। मैं बराबर बच्चों से कहता रहा कि नकल नहीं होगी। एक दिन बाँसगाँव के एसओ मेरे पास आए। उनका कोई रिश्तेदार परीक्षार्थी था। उन्होंने कहा कि एक कमरे में कुछ बच्चों के लिए व्यवस्था कर दीजिए, शेष बहुत टाइट रहेगा। मैं देख लूँगा।
मैंने बताया यह संभव नही है। नकल नहीं होगी और किसी को भी छूट नहीं मिलेगी। परीक्षा का समय आ गया। पहले दिन परीक्षा में तीन बच्चों के पास छोटी चिटें मिलीं और उन्हें अनुचित साधन प्रयोग में रिपोर्ट किया गया। इसके पहले कभी किसी बच्चे को रिपोर्ट नहीं किया गया था। नियमानुसार उन्हें बी कापी दी गई और फिर दूसरे किसी बच्चे ने नकल करने का प्रयास नहीं किया। वे स्वयं भी कोई चिट आदि नहीं लाने लगे। तीसरे दिन गोली मारने वाले बच्चे की परीक्षा थी। परीक्षा में पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए ड्यूटी लगी थी लेकिन उस दिन वे समय से नहीं आये। गेट पर बच्चों की तलाशी ली गई किसी के पास कुछ नहीं निकला था केवल गोली मारने वाले के पास एक किताब थी। मैंने वह किताब ले लिया। मैं उसकी जेब वगैरह भी देखने लगा तो उसने कहा कि मैं तो खुला खेल करता हूँ।
किताब लाया था वह आपने ले लिया। मैं कोई चिट नहीं बनाता। अन्य बच्चों के साथ वह भी परीक्षा कक्ष में चला गया। प्रश्न-पत्र बँटा सभी बच्चों ने प्रश्नों को हल किया। जो लिख पाया उसने भी कोशिश की। मैं बराबर टहलता रहा कि कोई अप्रिय घटना न घटने पाये। अध्यापकों ने भी मुस्तैदी से पर्यवेक्षण किया। आज की परीक्षा पर सभी की निगाहें थीं। बाजार के लोग भी निगाह गड़ाये हुए थे। उस बच्चे के निकलने पर बहुत से बच्चों ने घेर लिया और पूछा कि क्या नकल कर पाये तो उस बच्चे ने कहा कि जब किसी को नकल करने नहीं दिया गया तो मैं भी नही कर पाया और फिर पूरी परीक्षा पवित्रता के साथ सम्पन्न हुई।
विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गये उड़ाका दल ने भी बहुत कोशिश की तलाशी लेने की।
शायद किसी बच्चे के पास कोई चिट निकल आए। बच्चों ने किसी तरह की अवैध सामग्री लाना ही बंद कर दिया था। इसलिए उड़ाका दल भी खाली हाथ लौटता रहा। उड़ाका दल ने स्वयं कहना शुरू किया कि इतनी नकल विहीन परीक्षा और कहीं नहीं हो रही है। लोग आश्चर्य करते थे कि बांसगांव जैसे क्षेत्र में नकलविहीन परीक्षा कैसे सम्पन्न हो सकी। अखबारों में भी टिप्पणियां छपीं। सेवरही के प्राचार्य डा. वेदप्रकाश पाण्डेय का पत्र मिला जिसमें उन्होंने नकलविहीन परीक्षा कराने के लिए बधाई दी। इससे आगे चलकर आने वाले वर्षो में परीक्षा के दौरान कोई दिक्कत नहीं हुई। उड़ाका दल के लोग निरन्तर प्रयास करते कि किसी बच्चे के पास चिट निकल आए। लेकिन बच्चों ने किसी तरह की नकल सामग्री लाना ही बन्द कर दिया। कॉलेज के हिन्दी प्राध्यापक कौशिक जी ने यह घोषणा कर दी कि यदि उड़ाका दल के लोग किसी बच्चे को अनुचित साधन प्रयोग में पकड़ लेते हैं तो उन्हें रंगीन टीवी इनाम में दिया जाएगा।
पूरी परीक्षा में उड़ाका दल के लोग जब भी आते बच्चों की भरपूर तलाशी लेते पर उनके द्वारा किसी को अनुचित साधन प्रयोग में पकड़ा नहीं जा सका। इससे कालेज की साख बढ़ी। लोगां ने कहना शुरू कर दिया कि इतनी अच्छी परीक्षा किसी अन्य कालेज में नहीं होती। इसीलिए विश्वविद्यालय में हमारे कालेज के बारे में एक अच्छी धारणा बनी। पूरे पन्द्रह वर्ष तक परीक्षाएं शुचितापूर्वक हुइंर्। बच्चों ने भी समझ लिया कि हमें नकल नही करना चाहिए। बच्चों को परिसर से बाहर जाने पर भी प्रायः रोक दिया जाता।
उन्हें खाली घंटों में वाचनालय में जाकर पत्र-पत्रिकाएँ व पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। मैंने यह व्यवस्था की- परिचय पत्र जमा करके बच्चे एक घंटे के लिए भी किताबें लेकर पढ़ सकते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं से सम्बन्धित पत्रिकाएँ भी मँगाई जातीं और बच्चे उन्हें रुचिपूर्वक पढ़ते। कॉलेज खुलते ही वाचनालय खुल जाता और पुस्तकालय से सम्बन्धित बाबू वहाँ उपस्थित रहता। पुस्तकालयाध्यक्ष भी वाचनालय में बैठते।
इससे पठन-पाठन का एक परिवेश निर्मित हुआ। एक सकारात्मक सोच के साथ बच्चे काम करने लगे। दूसरे वर्ष में कॉलेज के खातों का विभाग द्वारा सम्परीक्षण कराया गया। उस समय प्रबन्धक द्वारा निकाले गये घन के बारे में उनसे बात की गई और बिल बाउचर उपलब्ध कराने के लिए कहा गया। पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। सम्परीक्षण दल ने प्रबन्धक द्वारा निकाले गये धन को रेखांकित किया और अपनी रिपोर्ट में उसे गबन के रूप में प्रदर्शित किया। चर्चा चली कि कॉलेज में प्रशासक की नियुक्ति हो सकती है। कालेज सम्बन्धी फाइल मुख्यमंत्री के यहाँ पहुँच गयी है। वीर बहादुर सिंह उस समय मुख्यमंत्री थे। वे पड़ोस के ही थे इसलिए उनके समय में उस फाइल पर कोई कार्यवाही नहीं हुई किन्तु अचानक उनकी जगह नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री हो गये और उन्होंने सभी लम्बित फाइलों पर निर्णय ले लिया। हमारे कॉलेज में प्रशासक के रूप में गोरखपुर के एडीएम वित्त को नियुक्त किया गया।
उस समय जगन्नाथ सिंह एडीएम वित्त का कार्यभार सँभाल रहे थे। वे कालेज गेट पर पहुँचे तो चपरासी ने उन्हें अन्दर नहीं आने दिया। उनके चपरासी ने कहा कि कलक्टर साहब हैं कलक्टर साहब। हमारा चपरासी चलकर आया और बताया कि कलक्टर साहब आए हैं। मैंने कहा कि गेट खोल दीजिए और उन्हें आने दीजिए। वे टॉमसन कालेज में कुछ दिन हमारे विद्यार्थी रह चुके थे। उनका गाँव केशवपुर पहड़वा था। बहुत दिनों बाद भेंट हो रही थी लेकिन उन्होंने पहचान लिया। मुझे शासन का पत्र दिखाया जिसमें उन्हें कॉलेज का प्रशासक नियुक्त किया गया था। तुरन्त उस पत्र की प्रतिलिपि तैयार की गई और प्रशासक का नाम और हस्ताक्षर ट्रेजरी बैंक आदि में भेजा गया। जगन्नाथ सिंह ने अध्यापकों से भी भेंट की और कहा कि प्रशासक के आने से कॉलेज के विकास में गति आनी चाहिए।
हम लोग कुछ पंखे खरीदने की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मेरे साथ ही चलिये और आज ही खरीद लीजिए। किसी काम में देरी ठीक नहीं। शासन ने एक बार प्रशासकों की बैठक बुलाई। जगन्नाथ सिंह ने मुझे बैठक में जाने के लिए कहा। मैं बैठक में शामिल हुआ। उस बैठक में कॉलेजों को सुचारु रूप से चलाने पर चर्चा हुई। बैठक से लौटने के बाद मैंने चर्चा का विवरण प्रशासक को लिख कर दे दिया। कॉलेज में उसे प्रशासक की फाइल में लगा दिया गया। कुछ दिनों बाद जगन्नाथ सिंह जी एडीएम प्रशासक हो गए और कॉलेज प्रशासक पद पर दूसरे व्यक्ति आ गये। वे भी कालेज की गतिविधयों में बराबर रुचि लेते रहे।