आँगन में अब सन्नाटा नहीं था—
वहाँ डर जम गया था। कार्तिक अब भी दरवाज़े की तरफ़ भागना चाहता था—
कि तभी उसके पिता आगे आए। आवाज़ शांत थी, पर निर्दयी।
ससुर बोले -
बहुत हो गया, कार्तिक।
उन्होंने कार्तिक के हाथ को ज़ोर से पकड़ा—
और मोहन की तरफ़ इशारा किया।
वो बोले -
तुम दोनों—अभी।
कार्तिक और उसका छोटा भाई मोहन—
दोनों को एक कमरे में धकेल दिया गया।
धड़ाम!
दरवाज़ा बंद।
बाहर से कुंडी चढ़ी—
और ताला।
अंदर…
कमरे में अँधेरा नहीं था—
पर घुटन थी।
मोहन घबराया हुआ इधर-उधर देख रहा था।
मोहन (काँपती आवाज़ में) बोला -
भैया…ये क्या हो रहा है?
कार्तिक ने पूरी ताक़त से दरवाज़ा पीटना शुरू किया।
कार्तिक बोला -
दरवाज़ा खोलिए!
आपको अंदाज़ा भी है आप क्या कर रहे हैं?!
मोहन भी उसके साथ दरवाज़ा पीटने लगा।
पर हवेली खामोश थी। न कोई क़दमों की आहट। न कोई जवाब।
बस दीवारों से टकराकर लौटती उनकी आवाज़ें। मोहन दीवार के सहारे बैठ गया।
मोहन (आँखों में आँसू लिए) बोला -
भैया…भाभी और पूजा का क्या होगा?
कार्तिक की मुट्ठियाँ भींच गईं। उसकी साँसें भारी हो रही थीं।
कार्तिक (दबाई हुई चीख में) बोला -
अगर आज उन्हें कुछ भी हुआ—
तो मैं ये घर जला दूँगा।
मोहन उठकर कार्तिक के पास आया। पहली बार वो अपने बड़े भाई को इतना टूटा हुआ देख रहा था।
मोहन (दृढ़ स्वर में) बोला -
भैया…हम कुछ करेंगे।
मैं आपके साथ हूँ।
कार्तिक ने मोहन के कंधे पर हाथ रखा।
कार्तिक बोला -
आज अगर हम यहाँ से निकल गए—
तो वापस सिर्फ उन्हें लेने आएँगे।
बाहर…
उसी समय हवेली के एक कोने में—
दो लड़कियाँ अंधेरे में एक-दूसरे का हाथ थामे बैठी थीं। और दो भाई रोशनी में क़ैद।
कमरे के अंदर समय जैसे रुक गया था। कार्तिक दरवाज़े को घूर रहा था—
जैसे लकड़ी नहीं, किसी दुश्मन की आँख हो।
कार्तिक (दाँत भींचकर) बोला -
मोहन…पीछे हट।
मोहन घबराकर पीछे हुआ। कार्तिक ने कमरे में रखी लोहे की रॉड उठाई जो शायद कभी परदे के लिए लगी थी।
धड़ाम!
एक वार।
धड़ाम!
दूसरा।
लकड़ी चरमराई।
चटाख—
कुंडी टूट गई।
दरवाज़ा खुल गया।
दोनों भाई बाहर निकले। मोहन पहली बार इतनी तेज़ भाग रहा था।
मोहन (हांफते हुए) बोला -
भैया…जल्दी!
कार्तिक को रास्ता याद था। वही सीलन भरी दीवारें।।वही सिकुड़ी हुई हवा। कालकोठरी के सामने पहुँचते ही कार्तिक एक पल रुका।
अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसका दिल डूब गया।
कार्तिक (चीखकर) बोला -
संस्कृति!
पूजा!
दरवाज़ा टूटता है
धड़ाम!
एक नहीं—
तीन वार।
पुराना ताला टूट गया। दरवाज़ा खुला। अंधेरे में दो परछाइयाँ सिकुड़ी हुई थीं। पूजा संस्कृति को सीने से लगाए बैठी थी।
दोनों डर से काँप रही थीं।
संस्कृति (कमज़ोर आवाज़ में) बोली -
कार्तिक जी…
बस इतना ही कह पाई। कार्तिक घुटनों के बल बैठ गया। उसने संस्कृति को अपनी बाँहों में भर लिया।
मोहन ने पूजा का हाथ पकड़ा।
मोहन (भर्राई आवाज़ में) बोला -
पूजा…अब सब ठीक है।
कार्तिक ने संस्कृति को गोद में उठाया। पूजा मोहन के साथ भागी।
चारों हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर दौड़े।
पीछे की आवाज़ें कहीं दूर चीख़। गुस्से में दरवाज़े पटकने की आवाज़ें। पर अब किसी ने पीछे नहीं देखा।।जैसे ही हवेली का दरवाज़ा पीछे छूटा—
ठंडी हवा उनके चेहरों से टकराई। संस्कृति ने आँखें बंद कर लीं।
संस्कृति (धीरे से) बोली -
हम…सच में बाहर आ गए?
कार्तिक (भरी आवाज़ में) बोला -
हाँ…अब कोई ताला नहीं।
चारों अंधेरी सड़क पर भागते रहे। नियम पीछे छूट चुके थे।
डर पीछे छूट चुका था। दूर कहीं सुबह की पहली रोशनी उग रही थी। और उस रोशनी में—
चार ज़िंदगियाँ जो आज पहली बार आजाद थीं।
क्या रघुवंशी हवेली उन्हें इतनी आसानी से जाने देगी?
या
ये भागना एक नए संघर्ष की शुरुआत है?