My droom has to die - 5 in Hindi Women Focused by Varun books and stories PDF | मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 5: बदले की हवा

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मेरे दूल्हे को मरना होगा - अध्याय 5: बदले की हवा

रात का जंगल कीड़ों की किटकिट और सियारों की हुंकारों से भरा था।

पुराने पत्थर की खदान के पास खुला मैदान था। चारों तरफ़ ऊँची घास, बीच में टीन की छत वाला एक ढाँचा। दो बल्ब लटक रहे थे, जिनकी रोशनी में कीड़े मरते जा रहे थे।

ठाकुर धुरंधर सिंह की गाड़ी रुकी। उसके पीछे एक और जीप। हीरा आगे उतरा। उसके पीछे चार आदमी—साधारण कपड़ों में, पर चाल से साफ़ कि हथियार पास हैं। ठाकुर धुरंधर सिंह भी उतरे। पीछे वाली जीप से छह और हथियारबंद गुंडे निकले।

जख्खड़ पहले से मौजूद था। नक़ाब नहीं था। दाढ़ी खुली थी। आँखें सीधी। उसके पीछे तितर-बितर दस-पंद्रह लोग, तलवार और राइफ़ल से लैस।

“आइए ठाकुर साब,” जख्खड़ ने कहा। आवाज़ में सम्मान था—पर झुकाव नहीं। हल्का-सा झुककर पैर-हाथ लगाने का इशारा भर किया।

“जीता रह, बेटे।” ठाकुर साहब ने आसपास नज़र घुमाई। “काफ़ी भीड़ हो गई है इधर। पहले इतने लोग नहीं होते थे।”

जख्खड़ हल्का-सा मुस्कराया। “लोग जुड़ रहे हैं, साब। वेबसाइट पर ट्रैफ़िक बढ़ा है। वीडियो वायरल हो रहे हैं। आजकल के नए बच्चे—कुछ करने का जोश रखते हैं।”

हीरा बीच में बोला, “जोश को लगाम चाहिए।”

जख्खड़ की आँखें एक पल के लिए सख़्त हुईं। फिर वह ठाकुर साहब की तरफ़ मुड़ा। “लगाम हमने हमेशा मानी है,” उसने कहा। “पर अब लोग हमें ढूँढ रहे हैं, साब। हम किसी को पकड़कर नहीं ला रहे।”

ठाकुर साहब ने बात काट दी। “अच्छी बात है, जख्खड़। पर ये सब शुरू हमारे ही इशारे और पैसे से हुआ था।” आवाज़ शांत थी—पर भीतर आदेश था। “तू हमारा आदमी है। याद रख।”

जख्खड़ ने सिर हिलाया। “जी।”

ठाकुर साहब एक क़दम आगे बढ़े। जख्खड़ के कंधों पर हाथ रखकर हल्का दबाया। “अब सुन। कंस्ट्रक्शन साइट पर तूने अच्छा डर बनाया है, पर अब कुछ दिन वहाँ से दूर रहना। बाँध का काम अब हमारी नाक का सवाल है।”

जख्खड़ की मुस्कान गायब हो गई। “वहाँ किसान हैं, साब। पानी का सवाल है।”

“वहाँ पैसा है,” ठाकुर साहब बोले। “और जहाँ पैसा होता है न, बेटे—वहाँ सवाल नहीं पूछे जाते।” उन्होंने जख्खड़ का गाल ऐसे थपथपाया, जैसे अपने कुत्ते को सहला रहे हों।

वह मुड़े और गाड़ी की तरफ़ बढ़ने लगे—फिर कदम रुक गए।

एक पल के लिए आसपास की हवा भारी हो गई। किसी ने हथियार कसकर पकड़ा। किसी ने जैकेट के भीतर हाथ डाला।

ठाकुर साहब समझ गए थे कि बहती हवा का रुख बदल चुका है, उनकी कही बात अब आदेश नहीं चुनौती बन चुकी है।

हीरा एक कदम आगे आया। “सुनो बे। ठाकुर साब जो कह रहे हैं, प्यार से समझ लो। और सब के सब अपनी औक़ात में रहो।”

जख्खड़ ने अपने लोगों की तरफ़ देखा। वे शांत थे—पर तैयार।

“हमें औक़ात में रहने की धमकी मत दीजिए,” जख्खड़ ने धीरे से कहा। “औक़ात अब लोग तय कर रहे हैं।”

ठाकुर साहब हँसे—छोटी, ठंडी हँसी। बिना मुड़े बोले, “ज़्यादा उड़ान भरी तो एनकाउंटर भी हो जाता है। जंगल है। खबरें जल्दी दब भी जाती हैं।”

दोनों तरफ़ असहजता बढ़ती गई। तलवारों और बंदूकों पर हाथ कसते जा रहे थे। बस एक साँस का वक़्त—एक चिंगारी और गोलियों की बौछार तय थी।

फिर ठाकुर साहब ने हाथ उठाया, और कड़क आवाज़ में बोले, “चलो।”

वह गाड़ी की तरफ़ बढ़े। 

हीरा उलटे कदम चलते पीछे-पीछे होता रहा। उसकी और जख्खड़ की नज़रें एक-दूसरे को मानो काट रही थीं।

गाड़ियाँ स्टार्ट हुईं और पीछे होती चली गईं। जख्खड़ वहीं खड़ा रहा—चेहरा शांत, जबड़े भींचे हुए।

ठाकुर साहब की गाड़ी दूर चली गई।

जख्खड़ के पीछे उसका आदमी आकर खड़ा हुआ। “इतनी बात सुनी क्यों, भाई? यहीं लाशें दफन कर देते इनकी।”

जख्खड़ ने बीड़ी सुलगाई। “ऐसे नहीं, माधो। ऐसे नहीं। जंगल में छिपकर नहीं।” उसने धुआँ छोड़ा। “जो करेंगे खुलेआम करेंगे। तभी टूटेगी इनकी सत्ता। स्कूल-कॉलेजों के बाहर अपने आदमी बढ़ा दो। सोशल मीडिया वाले को और पैसा भेजो। हमें और सैनिक चाहिए।”