रात…जब पूरा घर नींद के बोझ से खामोश हो जाता—
तभी कदमों की आहट धीरे-धीरे उस अंधेरे कमरे की ओर बढ़ती।
कार्तिक हर रात आता। बिना आवाज़ किए। बिना किसी को बताए। उसके हाथ में हमेशा एक ही चीज़ होती , डार्क चॉकलेट।
छोटी-सी। सादी-सी। पर उस कमरे में किसी खजाने से कम नहीं।
संस्कृति उसे देखते ही समझ जाती—
आज भी वो अकेली नहीं है। कार्तिक धीरे से उसके पास बैठता।
फिर उसे अपनी गोद में बिठा लेता।
कार्तिक (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
धीरे-धीरे खाना…दर्द में मीठा अच्छा लगता है।
संस्कृति बच्चों की तरह छोटे-छोटे कौर लेती। कार्तिक को खिलाने की कोशिश करती।
पर कार्तिक बोलता -
मुझे मीठा पसंद नहीं है। तुम्ही खाओ।
तुम्हे ज्यादा जरूरत है।
कार्तिक रैपर चुपचाप अपनी जेब में डाल लेता—
ताकि सुबह कोई सबूत ना बचे। कोई शक ना हो।
कार्तिक को खुद नहीं पता चला—
वो उसे कब अपना समझने लगा। कब उसकी तकलीफ़ उसकी अपनी बेचैनी बन गई। संस्कृति के लिए वो 5 दिन बहुत कठिन थे।
शरीर कमजोर। दर्द लगातार। पर हर रात एक नाम उसकी हिम्मत बन जाता—कार्तिक।
दिन भर वो घड़ी नहीं देखती—
रात देखती थी। जैसे ही घर की बत्तियाँ बुझतीं—
उसका दिल तेज़ धड़कने लगता।
वो बोलती -
आज आएंगे ना?
और वो आता भी। संस्कृति धीरे से उसकी छाती से लिपट जाती।
उसकी गोद में सिर रख देती।वो उसकी बाँहों में छिपकर सो जाती।
ऐसी नींद जिसमें दर्द का नामोनिशान नहीं होता।
कार्तिक उसके बालों में उँगलियाँ फेरता।
उसकी साँसें गिनता।फिर बहुत हल्के से उसके माथे को चूम लेता।
जैसे कोई दुआ पूरी हो रही हो।उसे पहली बार डर लग रहा था—
कि अगर ये सब कभी छिन गया तो?
संस्कृति (नींद में, बुदबुदाकर) बोली -
आप रोज़ आना…मुझे डर लगता है।
कार्तिक उसके माथे पर हाथ रखकर धीरे से बोला—
जब तक साँस है…मैं आऊँगा।
अब अंधेरा डरावना नहीं था।क्योंकि वहीं एक ऐसा रिश्ता जन्म ले रहा था—
जो नियमों से ऊपर था।
पांचवां दिन। सुबह की रोशनी जब पहली बार उस अंधेरे कमरे में
दरार बनाकर घुसी—
तब संस्कृति बाहर आई। कमज़ोर शरीर। पर चेहरा… अजीब-सा शांत। आँखों में थकान थी, लेकिन एक हल्का-सा ग्लो जो छुपाए नहीं छुप रहा था। सास दरवाज़े पर खड़ी उसे घूरती रही।
सास (मन ही मन) बोली -
5 दिन…काली कोठरी…और ये चमक?
उम्मीद थी—
टूटी हुई बहू। डरी हुई लड़की। पर सामने कोई और ही संस्कृति खड़ी थी। सास कुछ बोली नहीं। चुप रह गई।
सास (सख्त लहजे में) बोली -
अब अपने पति के कमरे में रहोगी।
बस इतना कहकर वो मुड़ गई। संस्कृति समझ गई—
ये इजाज़त दया से नहीं, मजबूरी से मिली है।
उसने अपने दिल से धीरे से कहा—
कार्तिक जी…अब आप सिर्फ नाम के पति नहीं हो।
वो जान चुकी थी—
जिस इंसान ने हर रात अंधेरे में उसका हाथ थामा—
वो उसे अपनी पत्नी मान चुका है।
शाम ढली। घर में वही पुरानी खामोशी। कार्तिक अपने कमरे में आया—
और संस्कृति को वहाँ देखा। एक पल के लिए वो ठिठक गया।
कार्तिक (आश्चर्य और राहत के साथ) बोला -
तुम… यहाँ?
संस्कृति ने धीरे से सिर हिलाया। कार्तिक खुश था। बहुत खुश।
लेकिन इस घर में खुशी दिखाना भी तो मना था।
फिर भी—
उसके हाथ अपने आप संस्कृति की ओर बढ़ गए। उसने संस्कृति को अपनी बाँहों में खींच लिया। जैसे कई दिनों बाद अपनी साँस वापस मिली हो। संस्कृति बिना कुछ कहे उसकी छाती से लग गई।
कार्तिक (धीमी आवाज़ में) बोला -
अब कहीं नहीं जाओगी।
संस्कृति कुछ नहीं बोली। बस उसकी शर्ट मुट्ठी में कस ली।
कार्तिक उसे अपने पास लिटा देता है। कंबल ठीक करता है।
फिर बहुत सलीके से उसे सीने से लगाकर सुला देता है—
पूरे मन से।
संस्कृति (नींद में, हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
आप आज भागेंगे तो नहीं ना?
कार्तिक उसके माथे पर हाथ रखकर धीरे से बोला—
अब नहीं।
उस रात घर वैसा ही था—
नीरस। खामोश। नियमों से भरा।
पर एक कमरे में—
पहली बार प्यार चुपचाप सो रहा था।
क्या ये प्यार दिन की रोशनी में जिंदा रह पाएगा?
या
रघुवंशी हवेली इसे भी अंधेरे में कैद कर लेगी?