अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या मन ही मन वीर को चाहती रही और अनुराग के स्पर्श से असहज होती रही। लेकिन अनुराग धैर्य और प्रेम से उसका सम्मान करता रहा, जिससे अनन्या चाहकर भी उसे दोषी साबित नहीं कर सकी। अब इसके आगे-
इसी तरह देखते ही देखते अनुराग और अनन्या की शादी के चार दिन बीत गए। पाँचवें दिन अनन्या अपने बेडरूम की खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। तभी वीर उसे दूर खड़ा दिखाई दिया। उसे देखते ही अनन्या के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं। वह डर भी रही थी कि कहीं किसी को शक ना हो जाए। उसने इधर-उधर देखा और हाथ से इशारा किया कि जाओ यहाँ से। तभी उसके मोबाइल पर वीर का मैसेज आया, 'छूने नहीं देना उसे। कुछ भी बहाना बना पर पवित्र रहना मेरे लिए। तुम मेरी हो और हमेशा मेरी ही रहोगी। मेरी हर सांस तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। मैं पागल हो रहा हूँ अनु। जल्दी आ जाओ मेरे पास, हमारे अधूरे प्यार को पूरा कर दो। निकाल दो उसे अपने जीवन से।'
अनन्या ने मैसेज पढ़ कर लिखा, 'इतना आसान नहीं है वीर। मैं लड़की हूँ, दोनों परिवार की मर्यादा रखना मेरी जिम्मेदारी है। मैं भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूँ जितना तुम मुझसे करते हो। मैंने अभी तक स्वयं को बचा कर रखा है। मैं कोई रास्ता ढूँढ रही हूँ ताकि कोई भी मुझ पर उंगली ना उठा सके और हम दोनों का मिलन भी हो जाए। आई लव यू जान, प्लीज अभी तुम यहाँ से चले जाओ। यदि किसी को शक हो गया तो सब मटिया मेट हो जाएगा।'
वीर ने यह मैसेज पढ़ते ही दूर से एक फ्लाइंग किस भेज दी और चला गया।
धीरे-धीरे 15 दिन बीत गए। अब तक भी अनन्या अपने पति अनुराग की गलती पकड़ने का इंतज़ार ही कर रही थी। लेकिन उसके हाथ बिल्कुल खाली थे, अकेले शून्य की तरह।
एक दिन अनन्या ने अनुराग से कहा, "मुझे कुछ दिनों के लिए पापा के घर जाना है।"
"ठीक है अनु, मैं शाम को ऑफिस से आकर तुम्हें छोड़ दूंगा।"
"नहीं, मुझे तो अभी ही जाना है, बहुत याद आ रही है।"
"ठीक है, तैयार हो जाओ, मैं अभी छोड़ ..."
अनन्या ने भड़कते हुए कहा, "क्यों, आपको क्या लगता है ... मैं कोई छोटी बच्ची हूँ, खो जाऊंगी जो आप मुझे अकेले नहीं जाने देना चाहते। या फिर आपको मुझ पर विश्वास नहीं है इसलिए मुझे अकेले ..."
अनन्या के गुस्से से मानो अनुराग को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा, उसने बड़ी उदारता से कहा, "यह तुम क्या कह रही हो अनु? जैसा तुम कह रही हो वैसा तो मैंने सोचा तक नहीं था। ठीक है, तुम्हारी इच्छा अकेले जाने की है तो अकेले ही चली जाओ। आई एम सॉरी अनु। मैंने तो अच्छा समझ कर कहा था।"
अनन्या चुप रही अभी भी वह जैसा चाहती थी वैसा हो नहीं पाया।
अनुराग के ऑफिस जाने के बाद उसने अपनी सासू माँ के पास जाकर कहा, "मम्मी जी मैं कुछ दिनों के लिए अपने घर जाना चाहती हूँ, सबकी बहुत याद आ रही है।"
सासु माँ ने कहा, "ठीक है बेटा चली जाओ, जब तुम कहोगी अनुराग तुम्हें लेने आ जाएगा।"
घर से निकलकर अनन्या सीधे वीर के घर पहुँच गई जहाँ वह अकेला रहता था।
वीर के घर पहुँचकर जैसे ही उसने दरवाज़ा खटखटाया, वीर बाहर आया।
अनन्या को देखते ही वीर का चेहरा खिलखिला उठा। उसने अनन्या को अपनी बाँहों में भर लिया और उसके होठों को अपने होठों से दबाकर गहरी साँसें भरने लगा। अनन्या ने एक-दो मिनट तो कुछ नहीं बोला। वह भी उसकी तड़प को समझ रही थी। लेकिन उसके बाद जैसे ही वीर के हाथों ने उसके वक्ष को छुआ, अनन्या तुरंत ही उससे अलग हो गई।
रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः