आईने की दूसरी तरफ
दीनू काका की मौत को एक हफ्ता बीत चुका था। पुलिस की फाइलों में केस बंद हो चुका था, लेकिन माया के जीवन में अशांति की एक नई लहर शुरू हो गई थी। वह मोगरे का फूल, जो उसे अपने बिस्तर पर मिला था, सूखने का नाम नहीं ले रहा था। सात दिन बीत जाने के बाद भी उसकी खुशबू वैसी ही ताज़ा थी, जैसे उसे अभी-अभी शाख से तोड़ा गया हो।
माया ने महसूस किया कि अब उसकी अपनी आदतें बदलने लगी थीं। वह घंटों आईने के सामने बैठी रहती। एक रात, जब उसने अपनी आँखों में काजल लगाया, तो उसे आईने में अपना अक्स (Reflection) कुछ अलग लगा। उसकी आँखों की चमक उसकी अपनी नहीं थी; वह गहरी, पुरानी और दर्द भरी थी। जैसे ही उसने आईने को छुआ, उसे महसूस हुआ कि कांच ठंडा नहीं, बल्कि दहक रहा है।
अचानक, आईने के भीतर से एक धुंधली आवाज़ आई— "माया... वे अभी भी वहीं हैं।"
माया पीछे हटी। उसे अहसास हुआ कि आर्यन की रूह को शांति दीनू काका की मौत से नहीं मिली थी। दीनू काका तो महज़ एक मोहरा था। असली गुनहगार तो अभी भी ज़िंदा था।
शहर का 'सफेदपोश' चेहरा
माया ने तय किया कि वह उस 'सेठ जी' का पता लगाएगी जिसका ज़िक्र दीनू काका ने आखिरी वक्त में किया था। पुरानी फाइलों और शहर के इतिहास को खंगालने पर एक नाम बार-बार सामने आया— ठाकुर विक्रम सिंह। विक्रम सिंह आज शहर का सबसे बड़ा बिल्डर और दानवीर माना जाता था। लेकिन 1974 में, वह उसी इलाके का एक छोटा सा ठेकेदार था जहाँ माया रहती थी। माया को पता चला कि जिस ज़मीन पर उसका फ्लैट खड़ा है, उसे हासिल करने के लिए विक्रम सिंह ने कई पुराने घरों को जला दिया था।
उसे एक और चौकाने वाली बात पता चली—नंदिनी (माया का पिछला जन्म) सिर्फ एक शिकार नहीं थी, वह विक्रम सिंह की बेटी थी जो एक मामूली क्लर्क, आर्यन, से प्यार कर बैठी थी। विक्रम ने अपनी 'इज्जत' बचाने और ज़मीन के सौदे को पूरा करने के लिए अपनी ही बेटी के प्रेमी को रास्ते से हटवा दिया था।
हवेली का बुलावा
उसी रात, माया के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया: "पुरानी यादें कभी नहीं मरतीं। आज रात 'सिंह हवेली' आ जाओ, अगर अपनी और आर्यन की रूह की सलामती चाहती हो।"
माया समझ गई कि उसे बुलाया जा रहा है। वह डरी नहीं, क्योंकि अब उसे महसूस होता था कि आर्यन का साया हमेशा उसके साथ चल रहा है। वह हवेली पहुँची। हवेली के भीतर का माहौल भारी था। एक बड़े से हॉल में, व्हीलचेयर पर एक बूढ़ा शख्स बैठा था—विक्रम सिंह। उसकी आँखों में पछतावा नहीं, बल्कि एक अजीब सा डर था।
"तुम... तुम बिल्कुल वैसी ही दिखती हो," विक्रम की आवाज़ कांप रही थी। "दीनू ने मुझे बताया था कि आर्यन वापस आ गया है। मैंने सोचा था कि वह मर चुका है, लेकिन वह पिछले 50 सालों से मेरी रातों की नींद हराम कर रहा है। वह मुझे चैन से मरने भी नहीं दे रहा।"
माया ने हिम्मत जुटाकर कहा, "आपने उसे क्यों मारा? वह तो आपसे सिर्फ प्यार की भीख माँग रहा था।"
विक्रम हंसा, "प्यार? वह ज़मीन का सौदा खराब कर रहा था। लेकिन अब... वह मुझे लेने आया है। और उसे रोकने के लिए मुझे तुम्हारा इस्तेमाल करना होगा। तांत्रिकों ने कहा था कि अगर नंदिनी के खून का ही कोई व्यक्ति उसे 'आज़ाद' कर दे, तो वह हमेशा के लिए चला जाएगा।"
अंतिम मिलन
विक्रम ने एक पुरानी पिस्तौल निकाली। "अगर मैं तुम्हें मार दूँ, तो शायद वह तुम्हें लेकर चला जाए और मुझे छोड़ दे।"
जैसे ही उसने ट्रिगर दबाने की कोशिश की, हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ टूट गईं। तेज़ हवा का एक बवंडर हॉल के भीतर घुसा। मोमबत्तियाँ बुझ गईं और घना काला साया दीवार से निकलकर साक्षात खड़ा हो गया। यह आर्यन था, लेकिन इस बार वह धुंधला नहीं था। वह क्रोध और शक्ति का साक्षात रूप था।
हवा में गूँजती हुई आर्यन की आवाज़ आई— "मैंने 50 साल इंतज़ार किया है, विक्रम। माया को हाथ मत लगाना!"
विक्रम सिंह की चीख निकल गई। साये ने उसे घेर लिया। माया ने देखा कि साया विक्रम को मार नहीं रहा था, बल्कि उसे उसकी अपनी यादों के नरक में खींच रहा था। विक्रम की आँखों के सामने 1974 की वह आग फिर से जल उठी। वह चिल्लाता रहा, माफ़ी माँगता रहा, लेकिन साया उसे अंधेरे की ओर खींचता ले गया।
कुछ ही पलों में सब शांत हो गया। विक्रम सिंह की लाश व्हीलचेयर पर पड़ी थी, उसकी आँखें खौफ से फटी हुई थीं। उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था—पाप का हिसाब पूरा हो चुका था।
उपसंहार: अनंत की ओर
माया हवेली से बाहर निकली। सुबह का सूरज उग रहा था। वह अपने पुराने फ्लैट की खिड़की पर वापस आई। वहाँ अब कोई साया नहीं था। खिड़की के कांच पर लिखा 'शुक्रिया' अब मिट चुका था।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी अलमारी खोली, उसे वहाँ एक लिफाफा मिला। उसमें 1974 के दो रेल टिकट थे—शहर से दूर जाने के। और एक छोटा सा नोट: "अगले जन्म में, हम ज़रूर मिलेंगे।"
माया ने महसूस किया कि उसके भीतर की 'नंदिनी' अब शांत हो चुकी थी। आर्यन की रूह अब भटक नहीं रही थी; वह आज़ाद हो चुकी थी।
आज भी, जब कभी उस शहर में तेज़ बारिश होती है और बिजली कड़कती है, लोग कहते हैं कि तीसरी मंजिल की उस खिड़की पर दो परछाइयां हाथ पकड़े खड़ी दिखाई देती हैं। वे अब साये नहीं थे, वे एक अधूरी कहानी के पूरे होने का सबूत थे।
माया अब अकेली नहीं थी। उसने उस फ्लैट को नहीं छोड़ा, क्योंकि अब वह घर सन्नाटे से नहीं, बल्कि एक अदृश्य सुकून से भरा था।
समाप्त
यह कहानी हमें बताती है कि सच्चा प्यार और इंसाफ की पुकार वक्त की पाबंदियों को भी तोड़ सकती है। आपको "खिड़की का साया" का यह सफर कैसा लगा?