Adhura Wada Ek Saya - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधुरा वादा एक साया - एपिसोड 2

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अधुरा वादा एक साया - एपिसोड 2

खिड़की का साया
स्मृतियों का कोहरा
अगली सुबह जब माया की आँख खुली, तो उसके कमरे में मोगरे की एक भीनी-भीनी खुशबू फैली हुई थी। ताज्जुब की बात यह थी कि उसके कमरे में कोई फूल नहीं था। खिड़की खुली थी और रात की बारिश की कुछ बूंदें अभी भी कांच पर मोती की तरह चमक रही थीं। माया ने अपने सिरहाने रखी उस फटी हुई फोटो को दोबारा गौर से देखा। जैसे-जैसे वह फोटो को देखती, उसके सिर में एक मीठा सा दर्द उठता और धुंधली तस्वीरें उसकी आँखों के सामने नाचने लगतीं।
उसने ऑफिस से इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन अब उसका मन एक ऐसी खोज में लग गया था जिसका कोई सिरा उसे समझ नहीं आ रहा था। उसने तय किया कि वह इस फ्लैट के पुराने रिकॉर्ड्स तलाशेगी। वह उस सरकारी दफ्तर के रिकॉर्ड रूम में गई जहाँ वह काम करती थी। एक पुरानी सहकर्मी, विमला, जो वहाँ तीस सालों से थी, उसे देखकर हैरान रह गई।
"माया? तुम तो छोड़ चुकी हो न?" विमला ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।
"विमला जी, मुझे 1970 के आसपास के इस इलाके के लैंड रिकॉर्ड्स और डेथ सर्टिफिकेट्स की फाइलें देखनी हैं। क्या आप मदद करेंगी?" माया की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।
विमला उसे एक अंधेरे, धूल भरे तहखानेनुमा कमरे में ले गई। घंटों की मशक्कत के बाद, माया के हाथ एक मटमैली फाइल लगी। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उस फाइल में एक अखबार की कतरन चिपकी थी।
"19 अगस्त 1974: मॉडल टाउन फ्लैट्स में भीषण अग्निकांड। एक युवक लापता, मंगेतर की सदमे से मौत।"
तस्वीर में वही लड़की थी जो माया की शक्ल की थी— उसका नाम 'नंदिनी' था। और वह युवक, जिसका चेहरा फोटो में फटा हुआ था, उसका नाम 'आर्यन मेहरा' था। खबर के मुताबिक, आर्यन उस रात नंदिनी के घर आया था, लेकिन उसी रात फ्लैट में आग लग गई। नंदिनी को बचा लिया गया था, पर सदमे और धुंध के कारण उसने कुछ दिनों बाद दम तोड़ दिया। आर्यन का शरीर कभी नहीं मिला। पुलिस ने केस यह कहकर बंद कर दिया कि वह शायद जलकर राख हो गया या भाग गया।
लेकिन माया को कुछ गलत लग रहा था। अगर वह मर गया था, तो साया क्यों लौट रहा था? और अगर वह भाग गया था, तो वह 50 साल बाद क्यों आया?

तहखाने की आहट
रात के दस बजते ही माया फिर से अपनी खिड़की पर तैनात थी। आज डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी आत्मीयता थी। साया ठीक दीवार के नीचे था। माया ने धीरे से फुसफुसाया, "आर्यन... क्या तुम यही चाहते थे कि मैं यह सच जानूँ?"
साया हिला। उसने अपना हाथ उठाकर बगल वाली गली की ओर इशारा किया, जहाँ बिल्डिंग का पुराना कबाड़खाना और पानी की टंकी थी। माया ने एक टॉर्च ली और बिना कुछ सोचे नीचे की ओर दौड़ पड़ी। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसके पैरों की आहट उसे खुद डरा रही थी।
कबाड़खाने का दरवाजा जंग लगा हुआ था। जैसे ही उसने उसे धक्का दिया, एक चीखती हुई आवाज़ के साथ वह खुल गया। अंदर पुरानी कुर्सियाँ, टूटे शीशे और धूल की मोटी परतें थीं। टॉर्च की रोशनी एक कोने में पड़ी एक पुरानी ट्रंक (बक्से) पर पड़ी। उस बक्से पर 'A.M.' लिखा था— आर्यन मेहरा।
जैसे ही माया ने बक्से को छूने की कोशिश की, उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। वह पलटी, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। अचानक, कबाड़खाने की एक दीवार के पीछे से खरखराहट की आवाज़ आई। वहाँ एक छोटी सी दरार थी। माया ने टॉर्च की रोशनी अंदर डाली। वह कोई कमरा नहीं, बल्कि एक गुप्त तहखाना जैसा था जो शायद 1970 के निर्माण के समय बनाया गया होगा।
वहाँ ज़मीन पर कुछ बिखरा हुआ था। सफ़ेद हड्डियाँ। माया के हलक से चीख निकलने ही वाली थी कि उसने देखा कि उन हड्डियों के पास एक अंगूठी पड़ी थी—वही अंगूठी जो उस पुरानी फोटो में नंदिनी ने पहनी हुई थी।

खूनी सच का पर्दाफाश
तभी, कबाड़खाने के दरवाजे पर एक साया उभरा। लेकिन यह साया धुंधला नहीं था। यह हाड़-मांस का इंसान था। वह बिल्डिंग का पुराना चौकीदार, 'दीनू काका' था, जो करीब 80 साल का हो चुका था और हमेशा खामोश रहता था। उसके हाथ में एक कुल्हाड़ी थी और उसकी आँखों में पागलपन।
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था, नंदिनी," वह कांपती हुई लेकिन भारी आवाज़ में बोला।
माया पीछे हटी, "मैं नंदिनी नहीं हूँ, मैं माया हूँ! और यह सब क्या है?"
दीनू काका हंसा, एक खोखली हँसी। "शक्ल तो वही है। उस रात भी तुम दोनों भागने वाले थे। आर्यन ने मुझे देख लिया था जब मैं सेठ जी की तिजोरी साफ कर रहा था। मैंने उसे यहीं खत्म कर दिया और इस दीवार में चुनवा दिया। आग तो मैंने सिर्फ सबूत मिटाने के लिए लगाई थी। पर तुम... तुम बच गई थी। अब 50 साल बाद वह तुम्हें बुलाने वापस आया है।"
माया को समझ आया। वह साया उसे डरा नहीं रहा था, वह उसे इंसाफ दिलाने के लिए बुला रहा था। साया उसे उस जगह ले आया था जहाँ उसकी हत्या हुई थी।
दीनू काका कुल्हाड़ी उठाकर माया की ओर बढ़ा। "आज यह कहानी खत्म होगी। कोई साया तुम्हें नहीं बचाएगा!"

रूहानी इंसाफ
जैसे ही दीनू काका ने कुल्हाड़ी चलाने के लिए हाथ उठाया, कमरे का तापमान अचानक शून्य से नीचे गिर गया। बल्ब जो टिमटिमा रहा था, वह धमाके के साथ फूट गया। पूरा कमरा काले धुएँ और एक विशाल साये से भर गया।
दीनू काका हवा में उछल गया, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसका गला पकड़ लिया हो। वह छटपटाने लगा, उसकी आँखें बाहर की ओर उबल पड़ीं। माया ने देखा कि वह काला साया अब एक स्पष्ट मानव आकृति ले चुका था। वह आर्यन था। उसका चेहरा शांत लेकिन उसकी आँखें धधकती हुई आग जैसी थीं।
"नहीं! मुझे माफ कर दो!" दीनू काका की आवाज़ घुटने लगी।
अचानक एक ज़ोरदार झटके के साथ दीनू काका को उसी दीवार पर दे मारा गया जहाँ आर्यन की हड्डियाँ मिली थीं। एक चीख गूँजी और फिर सब शांत हो गया। जब माया ने अपनी टॉर्च जलाई, तो दीनू काका ज़मीन पर बेजान पड़ा था—दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो चुकी थी।

अंतिम विदाई
सुबह की पहली किरण के साथ पुलिस और एम्बुलेंस वहाँ पहुँच चुकी थी। दीवार के पीछे से मिला कंकाल और दीनू काका के घर से मिली पुरानी तिजोरी ने 50 साल पुराने कत्ल की गुत्थी सुलझा दी।
माया अपनी खिड़की के पास खड़ी थी। सूरज की रोशनी कमरे में भर रही थी। उसने देखा कि आँगन में अब वह साया नहीं था। लेकिन खिड़की के कांच पर धुंध में एक शब्द लिखा हुआ था: "शुक्रिया"।
माया ने गहरी साँस ली। उसका अकेलापन अब खत्म हो चुका था। उसे पता था कि आर्यन की रूह को अब शांति मिल गई है। उसने वह पुरानी फोटो उठाई और उसे एक फ्रेम में मढ़वाकर अपनी दीवार पर लगा दिया। वह अब 'मशीन' नहीं थी। उसने फिर से जीना शुरू कर दिया था।
लेकिन उस रात, जब वह सोने जा रही थी, उसे अपने तकिए के नीचे एक ताज़ा मोगरे का फूल मिला। वह मुस्कुराई। उसे अहसास हुआ कि कुछ रिश्ते मौत के बाद भी खत्म नहीं होते, बस उनका स्वरूप बदल जाता है।

माया अब उस फ्लैट में अकेली नहीं थी। उसके पास यादें थीं, इंसाफ की संतुष्टि थी और एक ऐसी रूह का साथ था जो सरहदों के पार भी उसकी हिफाज़त कर रहा था। शहर का वह कोना जहाँ वक्त थम गया था, अब फिर से धड़कने लगा था।

क्या आप चाहते हैं कि माया की ज़िंदगी में कोई नया मोड़ आए? क्या आर्यन की रूह वास्तव में चली गई, या वह अब भी माया की रक्षा कर रही है? यदि आप इस रूहानी रिश्ते की आगे की कहानी जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएँ!