Yashaswini - 42 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 42

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यशस्विनी - 42

एक और ब्रह्मास्त्र:- 

नेहा और प्रज्ञा भी अभी आश्रम में ही रुके हुए हैं।रोहित के जीवन से यशस्विनी के जाने के बाद जो रिक्तता उत्पन्न हो गई थी,वह अभी भी है,लेकिन रोहित ने जैसे अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लिया हो।आगे उनका साथ देने के लिए उनका ध्यान रखने वाली नेहा है।विवेक और प्रज्ञा भी हैं।आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए इस आश्रम के प्रमुख स्वामी मुक्तानंद तो हैं ही,शहर में महेश बाबा और यशस्विनी के साथ काम करने वाले योग स्वयंसेवकों का दल भी है।रोहित आश्रम स्थित अपने कक्ष से बाहर निहारते हुए एक बार फिर यशस्विनी की यादों में खो गया। अचानक आकाश में बादल के एक टुकड़े के समीप एक मानव आकृति उभरी।

"अरे! यह क्या?यशस्विनी?"

   आकाश में यशस्विनी की आकृति को देखकर रोहित प्रसन्नता से उछल पड़ा।बहुत देर तक दोनों के मध्य मानो मूक संवाद होता रहा।जब यशस्विनी की आकृति बादलों में ओझल होने लगी तो जैसे उसने कहा,"मैं तुम्हारे आसपास और तुम्हारे साथ ही हूं रोहित! मेरी आत्मा का एक अंश तो पहले ही तुममें था,अब नेहा में भी मेरी ही आत्मा का एक अंश है।जो इस धरती से प्रस्थान कर जाते हैं न,वे अपने सबसे प्रिय लोगों को  संकट में देखकर उनकी सहायता के लिए सक्रिय हो उठते हैं।"

  भावुक होकर रोहित ने भी अपने हाथ आसमान की ओर देखते हुए ऊपर लहराए। उनकी आंखों में आंसुओं की कुछ बूंदें छलक आईं।उधर अपने कक्ष में नेहा ने स्वयं के भीतर अचानक एक विशेष उत्साह और ऊर्जा का अनुभव किया।वह सोचने लगी, मुझे स्वामी मुक्तानंद के निर्देश के अनुसार अपना अनुसंधान तो जारी रखना ही चाहिए पर रोहित के मिशन में भी अपनी ओर से सहायता अवश्य करनी चाहिए।

(श्री कृष्ण से अर्जुन के संवाद के हजारों साल बाद…रोहित का ध्यान में चलचित्र की तरह घटनाओं का स्मरण जारी है……..)

………. यह कलयुग है और अचानक  श्री कृष्ण को  गोलोक में ऐसा लगा, जैसे हिमालय क्षेत्र में एक न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ साधक का जीवन संकट में है। तत्क्षण  वे  और मन की गति से हिमालय के एक पर्वतीय क्षेत्र के बर्फ से ढके वन क्षेत्र में जा पहुँचे। रात्रि का घनघोर अंधकर है-एक युवक बर्फ में आंशिक रूप से दबा हुआ है और तेजी के साथ उसकी प्राणशक्ति क्षीण हो रही है। उसका शरीर तेजी से ठंड पड़ रहा है।वह तेजी से मृत्यु की ओर बढ़ रहा है…..

रोहित कड़ाके की ठंड में संज्ञा शून्य गिर पड़ा है। अचानक उसे थोड़ी अर्ध चेतना का अनुभव हुआ ।उसने अपनी आँखे बोली- सामने  श्री कृष्ण की छवि दखाई दी । उनके सिर पर  मोरपंख था।वे एक हाथ में  बांसुरी लिए हुए थे। उनके ओठों पर चिर परिचित मुस्कान थी।उन्होंने अपने दूसरे हाथ से रोहित के सर को स्पर्श किया। क्या वे उनके आराध्य श्री कृष्ण हैं? रोहित सोच में पड़ गया……अंधेरे में भी चमकता हुआ उनका तेजोमय मुखमंडल रोहित को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति करा रहा था। रोहित ने अपने दोनों हाथ जोड़े और उठने का प्रयत्न किया, लेकिन उससे उठा नहीं जा रहा था - उस  छवि ने रोहित को लेटे रहने का इशारा किया-रोहित सम्मोहित सा उन्हें देखता रहा। अब उस  छवि ने  एक  बांसुरी रोहित के हाथ में देते हुए कहा,

“ इसे रख लो रोहित.... घोर संकट के समय उससे उबरने में  यह तुम्हारी सहायता करेगी।”

रोहित ने उस  बांसुरी को ससम्मान ग्रहण किया और वापस  अपनी थैली में रखकर उस तेजस्वी  छवि को प्रणाम किया …. वे देखते ही देखते अदृश्य हो गए। इसके बाद रोहित फिर मूर्छित हो गया….

     रोहित का ध्यान टूटा और वे थोड़ी देर के लिए इन घटनाओं का स्मरण कर चमत्कृत हो गए………

(एक सप्ताह बाद....... )

         आश्रम के अपने निज कक्ष में रोहित ध्यान में बैठे हैं...............तभी रोहित की छठी इंद्री को एक संकेत प्राप्त हुआ।दुनिया के दो अलग-अलग भागों में रूस और यूक्रेन तथा इसराइल और हमास के बीच युद्ध जारी है।इनमें से एक युद्ध क्षेत्र में दोनों में से किसी एक पक्ष द्वारा दागी गई एक विनाशक मिसाइल के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ने का संकेत मिलने पर वह सिहर उठा।

"ओह!..... महाविनाश.........तो राडार के साथ - साथ अत्याधुनिक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नवीनतम संस्करण पर आधारित युद्धक मिसाइल रक्षा प्रणाली भी चकमा खा सकती है? ये सब मानव से अच्छी प्रोग्रामिंग तो अवश्य कर सकते हैं....................लेकिन निर्णय शक्ति पूरी तरह इन्हीं पर छोड़ने का कुछ ऐसा ही अंजाम हो सकता है….. अब मैं क्या करूं? मुझे अपनी ओर से इसे रोकने का पूरा प्रयास करना ही होगा।"

   रोहित ने अश्वत्थामा द्वारा आकाश में छोड़े गए ब्रह्मास्त्र और भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर अर्जुन द्वारा उसे निष्प्रभावी करने के लिए छोड़े गए ब्रह्मास्त्र के प्रसंग को एक क्षण के लिए याद किया।

आज इतने बड़े संकट को अपने सामने देखकर रोहित सन्न है। जीपीएस से गाइडेड यह महाघातक मिसाइल कुछ ही मिनटों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर अपने लक्ष्य तक पहुँचेगी और हिरोशिमा तथा नागासाकी सा विनाश करेगी। रोहित की सारी प्रार्थना, मंत्र शक्ति और आत्मबल भी इस मिसाइल को रोक नहीं पा रहे हैं।

           क्या इसे रोकना संभव है? अभी तक तो ऐसी कोई तकनीक नहीं बनी है कि एक बार किसी घातक मिसाइल का प्रक्षेपण हो जाए और बिना इंटरसेप्टर के उसे रोक लिया जाए। कम से कम इस क्षेत्र में तो ऐसा इंटरसेप्टर नहीं लगा है, जहां इस मिसाइल को आकाश में निर्जन..... बहुत दूर किसी स्थान में नष्ट किया जा सके.......... अब आगे क्या होगा?

आज इस महासंकट के क्षण में रोहित को अचानक विस्मृत हो चुकी बात का फिर स्मरण हो आया। पौराणिक आख्यानों में  कृष्ण जी की तरह दिखने वाली उस आकृति ने मेरी अर्धतंद्रा अवस्था में मुझे  दर्शन दिए थे और उन्होंने मुझे एक बांसुरी दी थी। आश्रम में जब मुझे लाया गया था और कई दिनों के बाद जब मेरी चेतना लौटी तो मेरे स्वस्थ होने के बाद मैं इस  बांसुरी के बारे में भूल ही गया था। ……रोहित की आंखों में चमक आ गई वह दौड़कर कमरे के उस कोने की ओर गया जहां उसकी यात्रा वाली पोटली वैसी की वैसी रखी हुई थी ….रोहित ने पोटली हाथ में ली और बांसुरी को तलाशने लगा ।कपड़ों को थोड़ा इधर-उधर करते ही उसे  बांसुरी मिल गई।

(क्रमशः)

योगेंद्र