Nakal se Kahi Kranti nahi Hui - 8 in Hindi Biography by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 8

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नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 8

  ‘कलमजीवी निराला’ बाद में ‘गीत गाने दो मुझे’ नाम से प्रकाशित हुआ। जो बच्चे नाटक से जुड़े उन्होंने निःस्वार्थ भाव से काम किया। शास्त्री कालेज में अध्यापन करते हुए मुझे लगा कि हमें एमएड0 कर लेना चाहिए। इससे पीएचडी करने का रास्ता खुल जाएगा। हिमांचल विश्वविद्यालय कार्यरत अध्यापकों के लिए एमएड0 का पाठ्यक्रम चलाता था। यह कार्यक्रम दो सेमेस्टर में चलता था और तीन सप्ताह का संपर्क (काण्टेक्ट) प्रोग्राम भी आयोजित करता था। हिमांचल विश्वविद्यालय से ही बाबू मुरारी कृष्ण श्रीवास्तव, जयपाल सिंह, उर्मिला देवी सिंह और मैंने एम0एड0् की उपाधि प्राप्त की।

मैं बराबर लिखता-पढ़ता रहता था। यह विचार आया कि पीएचडी भी कर लेनी चाहिए। मैं पश्चिमी विचारकों को पढ़ाता था उसी के साथ कुछ भारतीय विचारकों को पढ़ाने का उपक्रम बना। मैंने यह देखा कि प्लेटो और श्री अरविन्द के शैक्षिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। श्री अरविन्द पर मेरठ के डा. रामनाथ शर्मा का लेखन मैंने पढ़ा। इसी तरह प्लेटो पर कुछ लोगां की पुस्तकें पढ़ी। अवध विश्वविद्यालय में उस समय बाहर के विद्वान गाइड हो सकते थे। मैंने शोध की रूपरेखा (Synopsis) बनायी और उसे डॉ0 शर्मा के पास भेज दिया। डॉ0 शर्मा ने हस्ताक्षर कर वह रूपरेखा मेरे पास भेज दी और मैंने उसे विश्वविद्यालय में जमा कर दिया। शोध समिति में मेरा प्रकरण अनुमोदित हो गया। मैंने काम करना शुरू कर दिया।

मैं अक्सर लम्बी छुट्टियों में दिल्ली चला जाता। वहाँ मेरे चचेरे भाई महीपत सिंह कार्यरत थे। उन्हीं के यहाँ रहकर मैनें दिल्ली विश्वविद्यालय की इन्स्टीयूट ऑफ एजूकेशन में बैठकर अध्ययन किया। कई बार दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, एनसीआरटी तथा अरविन्द आश्रम के पुस्तकालय में बैठकर अध्ययन किया। गर्मी की छुट्टियों में एक दो बार लखनऊ की टैगोर लाइब्रेरी, आचार्य नरेन्द्रदेव तथा अमीरुद्दौला लाइब्रेरी में बैठकर शोध सम्बन्धी साहित्य को पढ़ा और समझा। जब मेरे पास पर्याप्त नोट्स तैयार हो गये तो मैने लिखना शुरू किया। एक मोटे रजिस्टर में पूरा शोध प्रबन्ध लिख डाला। मेरे चचेरे भाई महीपत सिंह टाइप जानते थे। उन्होंने ही पूरी थीसिस टाइप की। चार प्रतियों में उसे तैयार किया गया। उन्होंने ही एक प्रेस में उसकी जिल्दबंदी कराई।

उसे लेकर मैं अगले दिन मेरठ में डॉ0 शर्मा के आवास पर गया। उन्होंने देखा और हस्ताक्षर कर दिया। मैं शोध-प्रबन्ध लेकर दिल्ली आया और वहाँ से गोण्डा। यहाँ आकर अवध विश्वविद्यालय में जमा करवा दिया। अब मैं प्रतीक्षा करने लगा कि शोध-प्रबन्घ पर निरीक्षकों की रिपोर्ट आ जाए। काफी दिनों तक जब विश्वविद्यालय से कोई सूचना नहीं आयी तो मैं एक दिन विश्वविद्यालय गया। पता चला कि एक रिपोर्ट आ गयी है दूसरी नहीं आ पायी है इसीलए आगे की कार्यवाही नहीं हो पा रही है। मुझे बताया गया कि दूसरी रिपोर्ट प्रो0 रामशकल पाण्डेय प्रयाग विश्वविद्यालय से आनी है। मैंने उनसे सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि रिपोर्ट तैयार है लेकिन अवध विश्वविद्यालय ने मेरा पिछला टीए नहीं दिया है इसलिए उसे नहीं भेज रहा हूँ।

मैंने उनसे कहा कि आप रिपोर्ट भिजवा दीजिए मैं आपका टीए निकलवाने की कोशिश करूँगा और आपके पास भिजवा दूँगा। उन्होंने मेरी बात मानकर रिपोर्ट भिजवा दी। कुछ दिनों बाद शोध प्रबन्ध पर मौखिकी के तारीख की सूचना मिली। मैं निश्चित तिथि पर विश्वविद्यालय गया। प्रो. राम शकल पाण्डेय और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. जायसवाल मौखिकी लेने आये। मेरे शोध प्रबन्ध का शीर्षक था- दि एजुकेशनल डाक्ट्रिन्स आफ प्लेटो एण्ड श्री अरविन्दः ए कम्प्रेटिव स्टडी 'The educational doctrines of Plato and shri Aurvindo : A comparative study'। प्रो. जायसवाल ने कहा doctrines के बदले दूसरा कोई शब्द होता तो ज्यादा अच्छा होता। मैने आर आर रस्क की पुस्तक 'The doctrines of Great Educators' का उल्लेख किया तो उन्होंने सहमति जतायी। मौखिकी की समाप्ति पर मैंने कोशिश की कि लोगों को टीए की धनराशि मिल जाये।

उस वर्ष विश्वविद्यालय ने दीक्षान्त समारोह का भी आयोजन किया था और मुझे उस समारोह में पीएचडी की उपाधि मिल गयी। लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय में आने के बाद मैंने कई शिक्षा सम्बन्धी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं की सदस्यता प्राप्त की और उनके सम्मेलनों में सहभागिता सुनिश्चित की। 1976 में इंडियन एसोसिएसन ऑफ टीचर एजूकेटर्स के अमृतसर सम्मेलन में प्रतिभाग किया। उसके बाद निरन्तर उनके सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी निभायी और उसमें अपने पत्र प्रस्तुत किए। बनारस विश्वविद्यालय की अनेक गोष्ठियों में सहभागी रहा। इससे निरन्तर कुछ न कुछ लिखने-पढ़ने की प्रेरणा मिलती रही। अपने को आँकने का अवसर भी मिला। 1984 में मैने ‘इंटरनेशनल काउन्सिल आन एजूकेशन फार टीचिंग’ की सदस्यता प्राप्त की।

उसका वार्षिक अधिवेशन जुलाई में बैंकाक (थाइलैंड) में आयोजित था। मैंने अपना पेपर तैयार कर भेजा जिसकी स्वीकृति भी आ गई। अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सहायता भी करता है। मैंने भी आवेदन किया। आयोग से सम्पर्क भी किया पर जाने से पहले कोई सहायता स्वीकृत नहीं हो पायी। प्रभारी अधिकारी से मिला तो उन्होंने कहा कि जल्दी करोगे तो नहीं हो पाएगा। मैंने जाने के लिए तैयारी कर लिया था। इसलिए निश्चित समय पर पासपोर्ट के साथ दिल्ली गया। हवाई यात्रा का टिकट लिया। मैंने इस तरह की योजना बनायी थी कि बैंकाक में पाँच दिन के सम्मेलन में सम्मिलित होकर मलेशिया और सिंगापुर के उच्च शिक्षा केन्द्रों का भी निरीक्षण किया जाए। आने जाने का किराया 4200 रुपये लगा। मुझे बैंकाक तक फ्रांसीसी एयरलाइन्स से जाना था तथा बैंकाक से सिंगापुर की यात्रा मलेशियन एयरलाइन्स से करनी थी।

उस समय थाइलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के लिए बीजा की जरूरत नहीं थी। हवाई अड्डे पर ही तीन सप्ताह की अनुमति मिल जाती थी। बैंकाक में सम्मेलन का आयोजन होटल हयात में किया गया था। किन्तु मैंने होटल में कमरा बुक नहीं कराया था क्योंकि उसका किराया बहुत ज्यादा था जबकि बहुत से होटल सस्ती दर पर सुविधायुक्त कमरे उपलब्ध करवा रहे थे। निर्धारित तिथि को मैं रात में पालम हवाई अडडे के लिए रवाना हुआ। गाँव के भाई बजरंग सिंह मेरे साथ हवाई अड्डे तक गए और उन्होंने कुछ फल वगैरह मेरे झोले में डाल दिया। मैने कोई नया कपड़ा नहीं बनवाया था। वही पैंट कमीज और पम्प जूता जो कॉलेज पहन कर जाता था तथा एक धोती कुरता। महीपत सिंह द्वारा उपलब्ध कराए गए, एक छोटे से ब्रीफकेस में सारा सामान बंद था।

हवाई यात्रा में छोटा-मोटा सामान आप अपने साथ लेकर चल सकते हैं। यदि सामान ज्यादा होता है तो उस पर अपना नाम आदि लिखकर जमा कर दिया जाता है जो गंतव्य पर पहुँचने पर मिल जाता है। मेरे पास ब्रीफकेस व छोटा सा झोला था। यह मेरे साथ जा सकता था। फ्रैंच एयरलाइन्स सुबह तड़के यहाँ आती थी इसलिए रात में पालम हवाई अडडे पर पहुँच गया था। बजरंग सिंह भी मेरे साथ वहीं बैठे रहे। जब चेकिंग शुरू हुई और मैं अन्दर जाने लगा तो बजरंग जी अपने पेट्रोल पम्प पर लौट गए। हवाई जहाज का गेट खुला और हम लोग क्रमशः अन्दर जाकर अपनी सीटों पर बैठ गये। थोड़ी देर में हवाई जहाज ने उड़ान भरी। बैंकाक की यात्रा साढ़े तीन घंटे की थी। सुबह जब बैंकाक आ गया तो नगर का भव्य दृश्य दिखने लगा। एक गड्ढे में जलकुम्भी दिखी। मुझे लगा कि मैं अपने ही परिवेश में आ गया हूँ। जुलाई का महीना था इसलिए ज्यादा कपड़े की जरूरत नहीं थी।

बैंकाक में उतर कर मैं बाहर आया और आगे चलकर बस में बैठने की सोच ही रहा था कि ध्यान आया कि मैने डालर को बॉट में बदलवाया ही नहीं है। मैं लौट पड़ा और बैंक में जाकर 50 डालर के बदले बॉट लिया। उस समय अमेरिकी डालर 15 रुपये के बराबर था और एक डालर से 37.5 बॉट मिलते थे। मैं दिल्ली से पाँच सौ डालर लेकर चला था। पचास डालर यहाँ बॉट में बदलवा कर बस में बैठा और एक सस्ते होटल की तरफ चल पड़ा। वह सबसे सस्ता होटल था। वहाँ जाकर देखा तो लगा यह एक डारमेटरी है। बाकी सुविधाएँ सामान्य थी। रात भर मैं वहीं रुक गया और सबेरे नहा धोकर तैयार हुआ और होटल हयात जाने वाली बस पकड़ ली। होटल हयात में पहुँचते ही टैक्सी वालों ने घेर लिया और कहा कि अभी सम्मेलन में डेढ़ दो घंटे की देर है तब तक मैं आपको बैंकाक की सैर करा सकता हूँ। मैंने मुस्कराते हुए धन्यवाद कहा और होटल के अन्दर जाने लगा।

गेट पर एक तगड़ा नौ-जवान गेटकीपर पारम्परिक कृष्ण के वेश में खड़ा था। उसे देखकर मुझे थोड़ी प्रसन्नता हुई और आश्चर्य भी। अन्दर घुसा तो गेट के किनारे ही पानी की घार गिर रही थी। अन्दर का परिवेश बहुत सुहावना था। दाहिनी तरफ रजिस्ट्रेशन पटल पर पहुँचा और सौ डालर का टै्रवलर्स चेक जमा करके फाइल आदि प्राप्त किया। उन्होंने मेरी कमीज के जेब पर एसपी सिंह इंडिया का बैज लगा दिया। रजिस्ट्रेशन पटल से हाल की तरफ जैसे ही मैं बढ़ा तो सीढ़ियों पर प्रो. आरपी सिंह उतरते हुए दिखे। मिलते ही उन्होंने पूछा कि आप कहाँ रुके थे। मैंने कहा कि मैं तो बहुत सस्ती जगह पर रुक गया था। उन्होंने कहा कि इस होटल में तो दो हजार रुपये रोज का किराया है। उन्होंने भी रजिस्ट्रेशन कराया। हम दोनों एक साथ हाल की तरफ बढ़े। यह उद्घाटन समारोह का समय था जिसमें थाइलैंड की राजपुत्री को उद्घाटन करना था। 

थाइलैंड का राजपरिवार अपने को राम से जोड़ता है और सभी के नाम से राम शब्द जुड़ा रहता है। हाल में हम लोगों को एक बाँसुरी जैसी चीज दी गई जिसमें अंग्रेजी, स्पेनी और फ्रेंच के बटन लगे थे। इसका अर्थ यह था कि आप इन भाषाओं में किसी में कार्यक्रम सुन सकते थे। जिस भाषा में सुननी हो उस भाषा का बटन दबा दीजिए उसी भाषा की आवाज सुनाई देगी। राजपुत्री ने यद्यपि अपना भाषण थाई में दिया था पर उसका अनुवाद तीनों भाषाओं में उपलब्ध था। संस्था के सचिव मिस्टर क्लेशन ने सम्मेलन का उद्देश्य बताते हुए वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। दो एक और लोगां ने अपने विचार रखे। मि. स्टोन ने खुलेपन की वकालत करते हुए कहा कि मैं कंगाल था आज अरबपति हूँ। यह खुले समाज में ही सम्भव है। ज्ञान शक्ति नहीं सम्भावित शक्ति है। इसका उपयोग हम जिस तरह चाहें कर सकते हैं। उद्घाटन सत्र लगभग दो घंटे चला। लगभग पचास देशों के लोग आए हुए थे।

थाइलैंड के शिक्षकों/ प्राध्यापकों की अच्छी संख्या थी। उद्घाटन सत्र के बाद ही काफी ब्रेक हो गया। काफी ब्रेक के बाद सभी लोग दो तीन समूहों में बँट गए। हम और आरपी सिंह दोनों अलग अलग समूहों में रहे। इस सत्र में मैंने अपनी बात रखी। यद्यपि रिसर्च पेपर इसके बाद के सत्र में पढ़ा जाना था। अंग्रेजी में मेरे दिए गए व्याख्यान को सभी लोगे ने सराहा। चीनी-जापानी लोग विशेष प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि आपकी अंग्रेजी बहुत अच्छी है। चीन के प्रतिनिधियों से मिलकर मैं कुछ आंतरिक बातों की जानकारी लेना चाहता था। पर वे लोग खुलकर बात नहीं करते। सभी लोग खुले गले की कोट-पैंट और टाई पहने हुए थे। माउत्से तुंग के समय में तो पूरा देश बंद गले की कोट पहनता था। चीनी प्रतिनिधियों के ये खुले गले के कोट चीन में कुछ खुलेपन के आगमन का संकेत दे रहे थे। अगले चार दिनों में लोग अपना रिसर्च पेपर विभिन्न संगामी सत्रों में पढ़ते रहे और उन पत्रों पर विचार-विमर्श होता रहा। यह संयोग ही था कि हम और प्रो. आर.पी. सिंह किसी भी संगामी सत्र में साथ-साथ नहीं पड़े।

उद्घाटन वाले दिन ही प्रो. आर.पी. सिंह ने कहा कि भाई थोड़े सस्ते होटल में रुकना है। थाइलैंड के प्रतिनिधियों से मैंने बात की और वे शाम को एक ऐसे होटल में ले गए जिसका एक दिन का किराया 100 रुपये था। कमरा साफ सुथरा था। एसी लगा था उसी से सटा हुआ वाथरूम था जिसमें ठंडा गर्म पानी और वाथटब की सुविधा उपलब्ध थी। कमरे में बेड लगा हुआ था। मैंने प्रो. आर.पी. सिंह से कहा कि आप बेड पर लेटिए। मैंने फर्श पर अपना चद्दर बिछाया और लेट गया। सिंह साहब ने कहा कि आप ही सच्चे पर्यटक हैं। भोजन भी हमने होटल के बाहर सब्जी और चावल का पाँच रुपये में किया और आधा रुपया पानी का देना हुआ।

भारतीय 11 रुपये में हम दोनां ने बाजार में भोजन किया और होटल में आ गए। एक दिन हम दोनों ने सोचा कि कोई भारतीय भोजन बनाता हो तो वहाँ भोजन किया जाए। एक परिवार का पता चला जो भारतीय भोजन कराता था। दाल-चावल, रोटी-सब्जी, लेकिन वह 65 रुपये में पड़ा। एक ही दिन हम लोगो ने भारतीय भोजन की तलाश की। शेष दिनों में हमने थाई भोजन पर निर्वाह किया। वहाँ के भोजन में चावल ही अधिक रहता है।