जंगल का रोमांचक सफर
लेखक: विजय शर्मा एरी
(लगभग 1500 शब्दों की रोमांचक हिंदी कहानी)
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1. रहस्यमयी शुरुआत
बरसात अभी-अभी थमी थी। बादलों की हल्की गड़गड़ाहट और मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू पूरे माहौल में घुली हुई थी। ऐसे में तीन दोस्त—अविनाश, सौरभ और काव्या—ने अचानक प्लान बनाया कि पास के घने ‘सतवण’ जंगल का एक रोमांचक सफर किया जाए।
यह जंगल अपनी खूबसूरती जितना ही अपने रहस्यों के लिए भी मशहूर था। जगह-जगह बड़े-बड़े बाँस के झुरमुट, बीच-बीच में जंगली फूलों की महक, और सबसे बढ़कर—पक्षियों की भयानक-सी आवाज़ें।
“अरे डरपोकों! कुछ नहीं होता जंगल में,” अविनाश ने उत्साह में कहा।
सौरभ ने घबराकर बोला, “भाई… सुना है रात में यहां अजीब-अजीब परछाइयाँ दिखती हैं।”
काव्या मुस्कुराई, “अगर तुम डर गए हो तो वापस चले जाओ, मैं तो जा ही रही हूँ।”
बस फिर क्या था—तीनों ने सफर शुरू कर दिया।
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2. जंगल का पहला असर
जैसे ही वे जंगल के अंदर गए, हवा में अचानक ठंडक बढ़ गई। सूरज की रोशनी पेड़ों के लंबे-लंबे तनों से छनकर अजीब-सी परछाइयाँ बना रही थी।
“ये जगह सामान्य बिल्कुल नहीं लग रही,” काव्या ने धीरे से कहा।
अविनाश ने टॉर्च निकाली। “चलो धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं।”
थोड़ी ही दूरी पर जमीन पर अजीब चौकोर निशान बने थे—जैसे किसी ने भारी बक्सा घसीटा हो।
सौरभ झटके से बोला, “ये किसके निशान हैं?”
अविनाश ने गंभीर होकर कहा, “शायद जंगल विभाग का कोई सामान… या कोई और बात।”
लेकिन वे नहीं जानते थे कि यह इस सफर का पहला संकेत था—जंगल में कोई और भी था।
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3. जंगली नदी का सामना
करीब एक किलोमीटर चलने के बाद पानी की तेज आवाज सुनाई दी। वे एक खूबसूरत लेकिन डरावनी दिशा में बहती जंगली नदी के पास पहुँचे।
नदी के किनारे एक टूटा हुआ लकड़ी का पुल था।
काव्या ने कहा, “हमें वापस जाना चाहिए। ये पुल नहीं संभलेगा।”
अविनाश ने उसकी बात को अनसुना किया, “मैं सबसे पहले जाऊँगा, तुम दोनों मेरे पीछे।”
वह धीरे-धीरे कदम रखते हुए आगे बढ़ा। जैसे ही बीच में पहुँचा—
टपाक!
एक लकड़ी टूट गई।
सौरभ चिल्लाया, “अविनाश!”
अविनाश कुछ सेकंड लटका रहा, फिर खुद को संभालते हुए बोला, “मैं ठीक हूँ… जल्दी पार आओ!”
तीनों किसी तरह नदी पार कर गए, लेकिन उनके दिलों की धड़कनें तेज थीं।
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4. रहस्यमयी झोपड़ी
नदी पार करते ही उन्हें घास में छिपी एक पुरानी कच्ची झोपड़ी दिखाई दी। छत टूटी हुई, दरवाजा टेढ़ा, और आस-पास सूखे पशुओं की हड्डियाँ पड़ी थीं।
सौरभ पीछे हट गया, “मैं अंदर नहीं जाऊँगा।”
काव्या बोली, “अगर हम पीछे हटते रहे, तो सफर पूरा कैसे होगा?”
अविनाश ने दरवाजा धकेला।
अंदर अंधेरा था। टॉर्च की रोशनी पड़ते ही तीनों चौंक गए—
दीवारों पर अजीब चिन्ह, कोने में पुराना कम्पास, और सबसे डरावना…
एक जंग लगा लोहे का ताबूत।
“ये क्या जगह है?” काव्या की आवाज काँपने लगी।
अविनाश कम्पास उठाते हुए बोला, “मुझे लगता है यह किसी पुराने खोजी की झोपड़ी रही होगी।”
तभी ताबूत के ढक्कन के अंदर से धम-धम की आवाज आई।
सौरभ चिल्लाया, “भागो… अभी भागो!”
तीनों तेजी से भागे। बाहर आते ही घना कोहरा फैल चुका था।
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5. जंगल का असली रहस्य
अब जंगल का माहौल बदल चुका था।
हवा भारी हो गई थी।
पेड़ जैसे झुक-झुक कर रास्ता रोक रहे थे।
अचानक दूर से मानव-जैसी परछाई दिखाई दी।
काव्या ने फुसफुसाकर कहा, “क्या वह कोई आदमी है?”
अविनाश बोला, “रुको, मैं देखता हूँ।”
वह परछाई धीरे-धीरे पास आने लगी।
चेहरा दिखाई दिया—
और वे सब जड़ हो गए।
वह एक बुजुर्ग वनरक्षक था, दाढ़ी उलझी हुई, आँखें लाल।
वह चिल्लाया,
“यह जंगल… सिर्फ जंगल नहीं… एक प्राचीन रक्षक का घर है!
तुम लोग वहाँ जा पहुँचे जहाँ किसी को नहीं जाना चाहिए था।
जिस ताबूत को तुमने देखा—वह एक दुर्लभ जीव का पिंजरा था।
अगर वह जाग गया… तो जंगल में कोई नहीं बचेगा!”
सौरभ डर से काँप गया।
“हमें क्या करना होगा?”
वनरक्षक ने कहा,
“मेरे पीछे आओ… अभी… तुरंत!”
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6. रात की सबसे लंबी दौड़
अब अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था।
कोहरा, सन्नाटा और अजीब आवाजें उन्हें घेरे हुए थीं।
वनरक्षक ने रास्ता दिखाते हुए कहा,
“उस ताबूत से आवाज आने का मतलब है कि वह जीव जाग रहा है।”
अचानक झाड़ियों से कुछ बड़ा-सा चीज हिली।
किसी जानवर के फीते जैसे लंबे पंजे चमके।
काव्या चीख उठी, “वो आ गया!”
उस पल कोई नहीं रुका।
चारों तेज भागने लगे।
पीछे से भारी-भारी कदमों की आवाज—
धड़… धड़… धड़…
जैसे जमीन कांप रही हो।
अविनाश बोला, “हम नदी की तरफ भागेंगे!”
वे पुल तक पहुँचे।
लेकिन नदी का पुल अब पूरी तरह टूट चुका था।
सौरभ चिल्लाया, “अब क्या करें? वो हमारे पीछे है!”
वनरक्षक गरजा,
“डरो मत! जंगल हमेशा अपने बहादुरों को रास्ता देता है।”
उसने पास के बड़े बेल के पेड़ की डाल पकड़कर नदी के दूसरी ओर फेंक दी।
डाल दूसरी तरफ फँस गई।
वनरक्षक बोला,
“एक-एक कर लटक कर निकलो!”
सबसे पहले काव्या गई।
फिर सौरभ।
फिर अविनाश।
अब रक्षक की बारी थी।
लेकिन तभी वह विशाल जीव पेड़ों को तोड़ता हुआ सामने आ गया—
लंबा, काले बालों में ढका, आग जैसी पीली आँखें।
वनरक्षक चिल्लाया,
“भागो बच्चे… मैं इसे रोकूँगा!”
तीनों दूसरी तरफ पहुँच चुके थे।
उनके सामने सिर्फ अँधेरा, डर और भागती धड़कनें थीं।
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7. जंगल का अंतिम मोड़
तीनों नदी पार कर चुके थे लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा था।
अचानक काव्या को वह पुराना कम्पास याद आया।
उसने जेब से निकालकर कहा, “इसमें उत्तर दिख रहा है। गाँव उत्तर में ही था… चलो!”
वे कम्पास की दिशा में चलने लगे।
कुछ दूर चलने पर आसमान में हल्की रोशनी दिखी—
गाँव के घरों की पीली-सी चमक।
अब वे सुरक्षित थे।
तीनों ने पीछे मुड़कर देखा—
जंगल शांत था।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
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8. एक अनोखा अंत
अगली सुबह वे ग्रामीणों के साथ जंगल के किनारे पहुँचे।
लेकिन वहां न वह जीव दिखा,
न वह झोपड़ी,
न ही वनरक्षक।
सब कुछ गायब था—
जैसे वह रात एक सपना रही हो।
सौरभ ने धीरे से कहा,
“क्या वह रक्षक… सच में था?”
अविनाश बोला,
“जंगल में कुछ चीजें दिखाई तो देती हैं…
पर समझ में नहीं आतीं।”
काव्या मुस्कुराई,
“लेकिन एक बात तो पक्की है—
इस जंगल ने हमें अपनी कहानी में हमेशा के लिए कैद कर लिया है।”
तीनों ने आसमान की तरफ देखा—
जहाँ सुबह की धूप पेड़ों के बीच सोने-सी चमक रही थी।
उनका यह सफर खत्म हुआ…
लेकिन ‘सतवण जंगल’ का रहस्य आज भी वहीं है—
किसी नए साहसी यात्री का इंतज़ार करता हुआ।
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