iske saye mein - 12 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | इश्क के साये में - एपिसोड 12

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इश्क के साये में - एपिसोड 12

अंतिम एपिसोड
जहाँ रूह आज़ाद हुई
शाम गहराने लगी थी।
वर्कशॉप की खिड़की से आती रौशनी अब हल्की और सुनहरी हो चुकी थी,
जैसे दिन भी किसी विदाई की तैयारी कर रहा हो।
आरव और अनाया आमने-सामने बैठे थे।
बीच में
टूटा हुआ कैनवस रखा था।
वह कैनवस
जो सिर्फ़ रंगों का टुकड़ा नहीं था,
बल्कि दो जिंदगियों का अधूरा सच था।
अनाया की आँखें बंद थीं।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
“अब मुझे सब याद आने लगा है,”
उसने धीरे से कहा।
“डर भी…
और सच भी।”
आरव ने उसका हाथ थामे रखा।
“अगर बहुत भारी लगे,
तो रुक सकते हैं।”
अनाया ने सिर हिलाया।
“नहीं।
इस बार नहीं।
मैं जानना चाहती हूँ
कि मैं मरी कैसे थी।”
ये शब्द कहते ही
कमरा अचानक ठंडा हो गया।
हवा में
एक जानी-पहचानी बेचैनी फैल गई।
दीवारों पर परछाइयाँ हिलने लगीं।
और फिर—
वह सामने आया।
साया।
अब वह पहले जैसा ताक़तवर नहीं था।
उसकी आकृति टूटी हुई थी,
जैसे सच ने उसे धीरे-धीरे खा लिया हो।
“तो आख़िरकार,”
साया बोला,
“तुम सच तक पहुँच ही गए।”
अनाया ने आँखें खोलीं।
उसकी नज़र सीधे साये पर गई।
“तू कौन है?”
उसकी आवाज़ काँपी,
“और तूने मुझे क्यों मारा?”
साया हँसा।
लेकिन उस हँसी में अब ज़हर नहीं था—
बस थकान थी।
“मैंने तुम्हें नहीं मारा,”
वह बोला।
“मैं तो सिर्फ़ वही था
जो पहले से मौजूद था।”
आरव गुस्से में उठा।
“बकवास बंद कर।”
साया ने उसे देखा।
“क्या तुम सच में नहीं जानते, आरव?”
“मैं तुम्हारा डर हूँ।”
कमरा काँप गया।
अनाया के दिमाग़ में
यादों का सैलाब टूट पड़ा।
अतीत
कई साल पहले—
एक छोटी-सी आर्ट गैलरी।
अनाया वहाँ आई थी
अपनी पहली पेंटिंग लेकर।
वह बहुत ज़िंदा थी।
बहुत उम्मीदों से भरी हुई।
आरव उस दिन जज था।
लेकिन वह सिर्फ़ जज नहीं था—
वह खुद टूटा हुआ कलाकार था।
अनाया की पेंटिंग ने उसे हिला दिया था।
उसमें दर्द था।
सच था।
और अंधेरा भी।
“यह पेंटिंग अधूरी है,”
आरव ने कहा था।
अनाया मुस्कुराई थी।
“क्योंकि सच कभी पूरा नहीं होता।”
वहीं से
दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
धीरे-धीरे
मुलाक़ातें बढ़ीं।
अनाया ने
आरव के अंधेरे को देखा।
और एक दिन
वह सच जान गई—
आरव अपनी कला से
डर को कैद करना चाहता था।
वह मानता था
कि अगर डर को किसी रूप में बाँध दिया जाए,
तो वह कमज़ोर हो जाता है।
अनाया ने उसे रोका था।
“डर को कैद नहीं किया जाता,”
उसने कहा था।
“उसे स्वीकार किया जाता है।”
लेकिन आरव डर गया था।
उसी डर ने
साया को जन्म दिया।
साया कोई रूह नहीं था।
वह आरव का डर था—
असफलता का,
अकेलेपन का,
और मोहब्बत खो देने का डर।
उस रात
वर्कशॉप में बहस हुई।
अनाया ने कैनवस तोड़ना चाहा।
“यह कला नहीं,”
वह चिल्लाई थी,
“यह क़ैद है!”
आरव ने उसे रोका।
डर ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया।
और उसी धक्कामुक्की में—
अनाया सीढ़ियों से गिर गई।
एक पल।
एक चीख़।
और फिर—
ख़ामोशी।
आरव सन्न रह गया था।
डर ने उसे घेर लिया।
उसने सच स्वीकार नहीं किया।
उसने डर को रंगों में बाँध दिया।
और उसी पल
साया पूरी तरह ज़िंदा हो गया।
वर्तमान
अनाया की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“तो मैं…”
उसकी आवाज़ टूट गई,
“मैं किसी रूह की वजह से नहीं मरी…
बल्कि तुम्हारे डर की वजह से?”
आरव घुटनों पर बैठ गया।
“हाँ,”
वह रो पड़ा।
“मैं कमज़ोर था।”
साया आगे बढ़ा।
“मैं उसी पल पैदा हुआ था,”
उसने कहा।
“जब तुम सच से भागे।”
अनाया उठी।
उसकी आँखों में अब डर नहीं था।
“और अब?”
उसने पूछा।
साया की आकृति काँपने लगी।
“अब तुम दोनों सच जान चुके हो,”
वह बोला।
“अब मेरा कोई वजूद नहीं।”
आरव ने अनाया की तरफ़ देखा।
“मुझे माफ़ कर सकोगी?”
अनाया ने उसकी आँखों में देखा।
“माफ़ी से पहले,”
वह बोली,
“स्वीकार करना ज़रूरी है।”
उसने कैनवस उठाया।
और उसे
आग में डाल दिया।
जैसे ही कैनवस जला—
साया चीख़ उठा।
“नहीं!”
लेकिन वह चीख़
धीरे-धीरे हवा में घुल गई।
कमरा हल्का हो गया।
अनाया की देह
धीरे-धीरे चमकने लगी।
“मेरा वक़्त पूरा हो गया है,”
उसने कहा।
आरव घबरा गया।
“नहीं…
इस बार नहीं।”
अनाया मुस्कुराई।
“इस बार मैं जा रही हूँ
क़ैद से नहीं,
आज़ादी से।”
उसने आरव का माथा छुआ।
“तुमने डर को स्वीकार कर लिया।
अब जी सकोगे।”
उसकी देह
रौशनी में बदल गई।
और फिर—
ख़त्म।
कुछ समय बाद
वर्कशॉप में
नई पेंटिंग लगी थी।
उसमें कोई साया नहीं था।
बस
एक लड़की थी—
खुली आँखों के साथ।
आरव अब भी पेंट करता था।
लेकिन डर से नहीं।
याद से।
कभी-कभी
जब शाम ढलती—
उसे लगता
जैसे कोई पास खड़ी है।
हवा हल्की हो जाती।
और दिल
शांत।
क्योंकि कुछ मोहब्बतें
मिलने के लिए नहीं होतीं—
बस
आज़ाद करने के लिए होती हैं।
समाप्त।