एपिसोड 8: साये और सच के बीच
रात आज कुछ ज़्यादा ही भारी थी।
हवा में नमी थी, जैसे दीवारें भी किसी राज़ को छुपाए साँस ले रही हों।
आरव अपनी वर्कशॉप में बैठा था। सामने वही पुरानी पेंटिंग—
वह लड़की, जिनकी आँखें अब सिर्फ रंग नहीं थीं…
उनमें सवाल थे। दर्द था। और इंतज़ार।
“तुम आज खामोश हो,”
आरव ने धीमे से कहा।
पेंटिंग के भीतर हलचल हुई।
धीरे-धीरे वह साया बाहर आया—
वही खूबसूरत लड़की, आधी रौशनी, आधी अंधेरे से बनी।
“क्योंकि आज सच बहुत पास है,”
उसकी आवाज़ में कंपन था।
आरव चौंका।
“कैसा सच?”
लड़की ने अपनी आँखें झुका लीं।
“जिस दिन मुझे इस पेंटिंग में कैद किया गया…
वह दिन मेरी मौत का नहीं था।
वह किसी और की साज़िश का अंत था।”
कमरे की लाइट एक पल को झपकी।
दीवार पर परछाइयाँ अजीब तरह से हिलने लगीं।
“मुझे किसी ने जानबूझकर कैद किया,”
उसने आगे कहा,
“क्योंकि मैं एक राज़ जानती थी—
एक ऐसा राज़ जो आज भी ज़िंदा है।”
आरव का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
“तो तुम आज़ाद क्यों नहीं हो सकतीं?”
वह मुस्कुराई—
लेकिन उस मुस्कान में दर्द था।
“क्योंकि मेरी आज़ादी किसी और की बर्बादी से जुड़ी है।”
एक पल की खामोशी छा गई।
फिर उसने आरव की तरफ देखा—
“और क्योंकि अब…
मुझे तुमसे मोहब्बत हो चुकी है।”
ये शब्द किसी वार की तरह आरव के दिल में लगे।
वह एक कदम आगे बढ़ा,
लेकिन उसके हाथ और उसके बीच हवा थी—
छूने की दूरी, पर कभी न पूरी होने वाली।
“अगर तुम्हें आज़ाद करने की कीमत तुम्हें खोना है,”
आरव की आवाज़ भर्रा गई,
“तो मैं वो कीमत नहीं चुका सकता।”
लड़की की आँखों में नमी चमकी।
“और अगर मेरी कैद की कीमत तुम्हारी ज़िंदगी है?”
तभी—
पेंटिंग के फ्रेम में दरार सी उभरी।
एक हल्की-सी चीख…
जैसे किसी और आत्मा ने भी करवट ली हो।
लड़की ने घबराकर पीछे देखा।
“वक़्त कम है, आरव।
अब साये सिर्फ मुझे नहीं ढूँढ रहे…
वे तुम्हें भी देख चुके हैं।”
दरार और गहरी हो गई।
और उसी पल आरव को एहसास हुआ—
यह कहानी सिर्फ प्यार की नहीं है।
यह कुर्बानी की शुरुआत है।
जब साया बोल उठा
दरार अब साफ़ दिखने लगी थी।
पेंटिंग के फ्रेम में उभरी वह लकीर जैसे किसी ज़िंदा ज़ख़्म की तरह काँप रही थी।
आरव ने आगे बढ़कर फ्रेम को छूना चाहा—
लेकिन उँगलियाँ पहुँचने से पहले ही तेज़ ठंडक हवा में फैल गई।
“मत छुओ…”
लड़की की आवाज़ अचानक सख़्त हो गई।
“अब यह सिर्फ मेरी क़ैद नहीं रही।”
आरव ने हाथ पीछे खींच लिया।
“तो फिर यह क्या है?”
वह धीरे-धीरे पीछे हटी, जैसे किसी अदृश्य ताक़त से डर रही हो।
“यह उस शख़्स की निशानी है…
जिसने मुझे पेंटिंग में क़ैद किया था।”
कमरे में बल्ब हल्के-हल्के झपकने लगे।
हवा में अजीब-सी फुसफुसाहट गूँज उठी—
मानो दीवारें किसी नाम को दोहरा रही हों।
आरव का गला सूख गया।
“उसका नाम?”
लड़की की आँखों में एक पल को नफ़रत उभरी।
“नाम नहीं…
वह खुद एक साया है।
जिसे ज़िंदा रहने के लिए आत्माओं की ज़रूरत होती है।”
आरव ने कभी ऐसी बातों पर यक़ीन नहीं किया था।
लेकिन अब—
उसके सामने खड़ी यह हक़ीक़त किसी भी डरावनी कहानी से ज़्यादा सच्ची थी।
“और तुम…?”
उसने धीरे से पूछा।
“मैं उसकी आख़िरी ग़लती थी,”
लड़की बोली।
“मैंने उसका सच देख लिया था।
इसलिए उसने मेरी रूह को रंगों में बाँध दिया—
ताकि मैं कभी बोल न सकूँ।”
फ्रेम से अचानक एक काली परछाई निकली।
कमरे की दीवारों पर रेंगती हुई,
छत से फर्श तक फैल गई।
आरव पीछे हट गया।
“ये… ये क्या है?”
“वह मुझे ढूँढ रहा है,”
लड़की की आवाज़ काँपने लगी।
“और अब तुम्हें भी।”
परछाई ने एक शक्ल ली—
न पूरी इंसानी, न पूरी अमानवीय।
उसकी आँखें नहीं थीं,
लेकिन उसकी मौजूदगी से ही सीने में दर्द उठने लगा।
“तुम्हारा वक़्त ख़त्म हो रहा है,”
एक भारी, गूँजती आवाज़ कमरे में फैली।
“जो मेरा है, उसे लौटाओ।”
आरव ने हिम्मत जुटाकर कहा,
“वह कोई चीज़ नहीं है।
वह एक रूह है… और अब मेरी ज़िम्मेदारी।”
साया हँसा—
वह हँसी जैसे काँच को चीरती हुई निकल रही हो।
“इंसान कब से रूहों का रखवाला बनने लगे?”
लड़की आगे बढ़ी,
खुद को आरव और उस साये के बीच खड़ा कर दिया।
“तुम अब मुझे नहीं छू सकते।”
“क्यों?”
साये की आवाज़ में हैरानी थी।
लड़की ने आरव की तरफ देखा।
उस नज़र में पहली बार सुकून था।
“क्योंकि अब कोई मुझे देख रहा है…
कोई जो मुझे याद रखेगा।”
साया तिलमिला उठा।
“मोहब्बत?”
उसकी आवाज़ ज़हर से भरी थी।
“मोहब्बत रूहों को कमज़ोर बना देती है।”
“या आज़ाद,”
आरव ने कहा।
एक तेज़ झटका लगा।
फ्रेम की दरार और चौड़ी हो गई।
लेकिन इस बार—
उसमें से रौशनी निकल रही थी।
लड़की ने आरव का हाथ पकड़ा—
पहली बार उसका स्पर्श महसूस हुआ।
ठंडा नहीं…
बल्कि हैरान कर देने वाला सजीव।
“अगर यह दरार पूरी खुल गई,”
वह बोली,
“तो या तो मैं मुक्त हो जाऊँगी…
या हमेशा के लिए मिट जाऊँगी।”
आरव की आँखें भर आईं।
“और तीसरा रास्ता?”
वह हल्की-सी मुस्कुराई।
“तीसरा रास्ता…
सिर्फ़ तब होगा जब तुम डरोगे नहीं।”
साया चीख़ उठा।
कमरा हिलने लगा।
कैनवस से रंग टपकने लगे—
जैसे किसी की यादें बह रही हों।
आरव ने लड़की का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
उस पल उसे समझ आ गया—
यह इश्क़ अब सिर्फ स में नहीं था।
यह इश्क़ अब चुनाव माँग रहा था।
और वह चुनाव…
अगली रात होने वाला था।