🌑 एपिसोड 7: मुक्ति या मोहब्बत
कमरे में अजीब-सी स्थिरता थी।
न हवा चल रही थी, न मोमबत्ती काँप रही थी—
जैसे वक़्त खुद साँस रोककर खड़ा हो।
आरव के हाथ से शुरू हुआ काला निशान अब उसकी कलाई पार कर चुका था।
उसकी धड़कनें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में डर नहीं था।
सामने—
पेंटिंग।
अब वह सिर्फ़ टूटी हुई नहीं थी।
उसके भीतर से रोशनी झाँक रही थी—
जैसे कोई दरवाज़ा आधा खुला हो।
अनाया उसे देख रही थी।
आज वह पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट थी—
लगभग इंसानी।
“अगर यह दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया,”
अनाया ने काँपती आवाज़ में कहा,
“तो या तो मैं आज़ाद हो जाऊँगी…
या तुम पूरी तरह उस साये का हिस्सा बन जाओगे।”
आरव ने उसकी ओर देखा।
“और अगर मैंने कुछ न किया?”
अनाया की आँखों में आँसू भर आए।
“तो देवांश की क़ैद कभी नहीं टूटेगी।
न मेरी…
न तुम्हारी।”
अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं।
कैनवास से काला धुआँ उठने लगा।
देवांश का साया फिर उभरा—
इस बार पहले से कहीं ज़्यादा विकृत।
“तुम दोनों बहुत देर कर चुके हो,”
उसकी आवाज़ गूँजी।
“मुक्ति का समय नहीं होता—
मालिक का होता है।”
आरव आगे बढ़ा।
“तुम मालिक नहीं हो,”
उसने कहा।
“तुम डर हो…
और हर डर एक दिन खत्म होता है।”
देवांश हँसा।
“और हर प्यार एक क़ुर्बानी माँगता है।”
अनाया ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“मत करो,”
उसने रोते हुए कहा।
“मैं सदियों से क़ैद हूँ…
थोड़ा और सही।
लेकिन मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”
आरव ने उसकी हथेली को कसकर थाम लिया।
“अगर प्यार सिर्फ़ साथ रहने का नाम होता,”
वह धीरे से बोला,
“तो शायद मैं रुक जाता।
लेकिन प्यार…
किसी को आज़ाद देखने की हिम्मत भी है।”
अनाया की आँखें फैल गईं।
“आरव—”
उसने उसकी बात पूरी होने नहीं दी।
आरव ने पेंटिंग के सामने खड़े होकर आँखें बंद कर लीं।
निशान अब जल रहा था—
जैसे उसकी रगों में उतर रहा हो।
“जो भी इस कैनवास में क़ैद है,”
उसने ऊँची आवाज़ में कहा,
“आज सच के सामने झुक जाएगा।”
उसने अपना हाथ दरार के भीतर डाल दिया।
तेज़ रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
देवांश चीखा—
एक दर्दनाक, खोखली चीख।
“तुम खुद को मिटा रहे हो!”
आरव की आवाज़ थरथराई—
लेकिन रुकी नहीं।
“अगर किसी की आज़ादी…
मेरे वजूद की क़ीमत माँगती है,”
उसने कहा,
“तो यह सौदा मुझे मंज़ूर है।”
अनाया चीख पड़ी।
“नहीं!”
वह आरव की ओर दौड़ी—
और इस बार उसे पूरी तरह पकड़ लिया।
उसकी बाहें ठोस थीं।
गरम।
इंसानी।
दोनों एक-दूसरे को हैरानी से देखने लगे।
“मैं…”
अनाया की आवाज़ काँप रही थी।
“मैं तुम्हें छू पा रही हूँ।”
रोशनी और तेज़ हो गई।
देवांश का साया दरकने लगा—
जैसे रंग उखड़ रहे हों।
“यह नामुमकिन है!”
आरव ने आख़िरी बार अनाया की आँखों में देखा।
“अगर तुम आज़ाद हो सकती हो,”
उसने मुस्कुराकर कहा,
“तो यही काफी है।”
उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में घुलने लगा।
“आरव!”
अनाया रोते हुए चिल्लाई।
“रुको—!”
उसने आरव को ज़ोर से गले लगा लिया।
और उसी पल—
रोशनी फट पड़ी।
जब सब शांत हुआ…
कमरे में सिर्फ़ एक टूटी हुई पेंटिंग थी।
खाली।
बेजान।
कोई साया नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।
और ज़मीन पर बैठी थी—
एक लड़की।
ज़िंदा।
साँस लेती हुई।
अनाया।
उसने काँपते हाथों से अपना चेहरा छुआ।
आँसू—
असली।
“मैं… आज़ाद हूँ,”
वह फुसफुसाई।
उसकी नज़र सामने पड़ी—
जहाँ आरव खड़ा था।
पूरा।
सही-सलामत।
“आरव?”
उसकी आवाज़ काँप गई।
आरव ने मुस्कुरा दिया।
“लगता है,”
उसने कहा,
“इश्क़ ने हम दोनों को धोखा नहीं दिया।”
अनाया दौड़कर उससे लिपट गई।
“तुम बचे कैसे?”
उसने रोते हुए पूछा।
आरव ने उसकी पेशानी को छुआ।
“शायद,”
वह बोला,
“क्योंकि यह कहानी क़ुर्बानी की नहीं…
समानता की थी।”
पेंटिंग का कैनवास अपने आप राख बन गया।
देवांश वर्मा का नाम—
हमेशा के लिए मिट गया।
खिड़की से सुबह की रोशनी अंदर आ रही थी।
अनाया ने पहली बार सूरज को देखा।
आजाद।
आरव ने उसका हाथ थाम लिया।
लेकिन दोनों जानते थे—
यह अंत नहीं है।
क्योंकि जो प्यार
रूह और इंसान के बीच पनपा हो,
वह कभी साधारण नहीं होता।
🌘 हुक लाइन (एपिसोड का अंत)
अनाया को उसकी मुक्ति मिल चुकी थी…
लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा था—
क्या इश्क़, जो साये में जन्मा हो,
रोशनी में भी ज़िंदा रह पाता है?