अब निलेश, जय और लीलावती सुरक्षित थे, लेकिन बेचारी गाय मर चुकी थी। उनके पास गाय को मारने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। इस बात का जय को बहुत गहरा दुख था।
इसी बीच जय को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई थी। वह देख सकता था कि पार्थ जंगल की ओर जा रहा है और यह भी कि भ्रम राक्षस जंगल में खड़ा है। ऐसा लग रहा था मानो जय किसी तरह उस राक्षस से जुड़ गया हो, लेकिन अभी उसके नियंत्रण में नहीं आया हो।
तभी पुलिस वहाँ पहुँचती है और गाय को मरा हुआ पाती है। इस जुर्म में पुलिस जय, निलेश और लीलावती—तीनों को गिरफ्तार कर लेती है और गाय के शव को श्मशान में दफना देती है। जय और निलेश पुलिसवालों को समझाने की कोशिश करते हैं कि यह सब भ्रम राक्षस का किया हुआ है, लेकिन पुलिस उन्हें पागल समझती है।
जय और निलेश जेल में थे, जबकि लीलावती को महिला जेल में रखा गया था।
रात होते ही भ्रम राक्षस का अंश गाय के शरीर से निकलकर एक मोर के भीतर प्रवेश कर जाता है। मोर की आँखें भयानक लाल हो जाती हैं और वह राक्षसी रूप धारण कर पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ता है। पुलिस स्टेशन पहुँचकर वह पुलिसवालों पर हमला कर देता है। पुलिस गोलियाँ चलाती है, लेकिन उन पर कोई असर नहीं होता।
जय यह सब अपनी दिव्य दृष्टि से देख लेता है और निलेश को बताता है। दोनों जेल का ताला तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन असफल रहते हैं। दूसरी ओर मोर पुलिसवालों को मारकर इधर-उधर फेंक रहा था। असल में वह मोर जय, निलेश और लीलावती को मारने ही आया था।
तभी अचानक जेल का ताला टूट जाता है और जय-निलेश भाग निकलते हैं, लेकिन मोर उनके सामने आ खड़ा होता है। जय मोर की सोच को समझ पा रहा था, उसकी आँखों से खुद को देख पा रहा था। तभी लीलावती वहाँ पहुँचती है और अपनी शक्ति से मोर पर हमला कर देती है। मोर भी कमज़ोर नहीं था, वह बराबर पलटवार कर रहा था।
जय एक बड़ा सा डंडा उठाकर मोर के सिर पर मारता है। इससे मोर और अधिक गुस्से में आ जाता है। तब जय आँखें बंद कर शांति से ध्यान लगाता है और मोर के मन के भीतर प्रवेश कर जाता है। वह उससे कहता है—“शांत हो जा… शांत हो जा।”
यह बात भ्रम राक्षस को पता चल जाती है। पहली बार कोई उसके बनाए हुए अंश को काबू में कर रहा था। मोर कुछ देर के लिए शांत हो जाता है, लेकिन भ्रम राक्षस अपनी शक्ति से उसे फिर भड़का देता है। मोर दोबारा हमला करने ही वाला होता है कि लीलावती अपनी शक्ति से उसे दूर फेंक देती है।
वे तीनों पुलिस की गाड़ी लेकर वहाँ से भाग जाते हैं।
सुबह होते ही सरकारी अधिकारी प्रशांत पुलिस स्टेशन की हालत देखकर चौंक जाता है। पुलिसवालों को मरा हुआ देखकर और यह जानकर कि जय, निलेश और लीलावती वहाँ से भाग चुके हैं, उसे उन पर शक हो जाता है। सीसीटीवी फुटेज चेक की जाती है, लेकिन सारी फुटेज गायब होती है, जिसे राक्षस ने नष्ट कर दिया था।
अब वह अधिकारी तीनों के एनकाउंटर का वारंट निकाल देता है और उन्हें खूंखार अपराधी घोषित कर दिया जाता है। पूरी खबर फैल जाती है—“वे तीनों आतंकवादी हैं, जहाँ दिखें वहीं मार दो।”
यह बात जय, निलेश और लीलावती को भी पता चल जाती है। उन्हें लगता है कि अब ज़िंदा बचना मुश्किल है। तभी अचानक मोर फिर वहाँ पहुँच जाता है और लीलावती तथा मोर के बीच भयानक लड़ाई होती है। जय दोबारा मोर के दिमाग पर काबू पाने की कोशिश करता है, लेकिन इस बार वह उसके नियंत्रण में नहीं आता।
जय पूरे दिमाग पर ज़ोर डालता है और पूरी शक्ति से सोचता है—काश यह मोर मर जाए। और सच में, मोर का सिर फट जाता है और वह वहीं मर जाता है।
तब जय समझ जाता है कि अब उसके पास भी भ्रम राक्षस की शक्ति आ चुकी है, लेकिन वह इस शक्ति का इस्तेमाल तभी कर सकता है जब राक्षस उसके आसपास हो।
गाड़ी को ट्रेस करके प्रशांत और उसकी टीम वहाँ पहुँच जाती है। मोर को मरा हुआ देखकर प्रशांत और भी गुस्से में आ जाता है और वह उन पर गोलियाँ चलाने लगता है। जय, निलेश और लीलावती कार में बैठकर भागते हैं। अधिकारी की पाँच गाड़ियाँ उनका पीछा करती हैं।
वे गाड़ी को एक इमारत के भीतर घुसा देते हैं, अधिकारी भी ऐसा ही करते हैं। फिर कार को जंप कराकर वे दूसरी इमारत में पहुँच जाते हैं। अधिकारी भी वही करते हैं। आखिरकार वे दसवीं मंज़िल पर पहुँच जाते हैं। बचने का कोई रास्ता नहीं होता।
पुलिस के डर से वे गाड़ी को दसवीं मंज़िल से नीचे गिरा देते हैं और खुद भी मरने ही वाले होते हैं कि तभी एक गिद्ध वहाँ पहुँच जाता है। लीलावती कहती है—“कूदो, यह गिद्ध हमें बचा लेगा।” और सच में, वह गिद्ध उन्हें बचा लेता है।
वह गिद्ध गिरनार से आया था, जिसे कृपाधार ने भेजा था। अब वे तीनों अस्थायी रूप से सुरक्षित थे, लेकिन भ्रम राक्षस और पुलिस अभी भी उनकी जान के पीछे पड़ी हुई थी।
To be continue…