भिखारी का रूप अचानक बदल गया।
उसका जर्जर और घावों से भरा शरीर अब तेजोमय हो उठा। उसके अंगों से दिव्य प्रकाश निकलने लगा।उसका चेहरा तेजस्विता से चमक रहा था क्षणभर में वह चार भुजाओं वाले एक देवता करूप में प्रकट हुआ।
उनके शरीर पर रेशमी वस्त्र लहराने लगे और मस्तक पर स्वर्ण मुकुट सुशोभित हो गया।
उनकी दिव्य आभा से सम्पूर्ण महल आलोकित हो उठा।"
देवता का दिव्य रूप देखते ही राजा और उनकी समस्त प्रजा श्रद्धा से अभिभूत हो उठी।
स्वयं राजा काँपते हुए अपने घुटनों पर बैठ गए और नतमस्तक होकर अपना सिर देवता के चरणों में रख दिया।
महल में उपस्थित सभी लोग भी हाथ जोड़कर भक्ति-भाव से झुक गए।
वहाँ का वातावरण क्षणभर में मंदिर-सा पवित्र हो गया।"
"काँपते हुए स्वर में राजा बोले—‘हे प्रभु! आज आपने हमें अपने दिव्य दर्शन देकर हमारा जीवन सफल बना दिया।
हम धन्य हो गए कि आपकी सेवा करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ।’
यह कहते हुए उनकी आँखों से आँसुओं की धार बहने लगी।"
देवता मंद-मंद मुस्कराए और मधुर स्वर में बोले—‘हे राजन! ,:
मैं तुम्हारे धर्म और करुणा की परीक्षा लेने के लिए तुम्हारे राज्य में भिखारी का रूप धरकर आया था।
तुमने बिना किसी घृणा के, निःस्वार्थ भाव से मेरी सेवा की।
तुम्हारी सेवा में वह स्नेह था, जो एक पिता अपने बीमार पुत्र के लिए करता है, जब संसार का हर व्यक्ति उसे तिरस्कार से देखता है।
हे राजन! तुम्हारी इस अद्वितीय करुणा और सच्ची निष्ठा से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।
अतः आज मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूँ।’"
देवता का मुख गंभीर हुआ और उन्होंने कहा—‘मैं तुम्हें एक और श्राप भी दे रहा हूँ।
जब मैं तुम्हारे राज्य में आया तो तुम्हारी प्रजा ने मेरा तिरस्कार किया, मुझे मारा-पीटा तथा दुर्व्यवहार किया।
चूंकि तुम अपने प्रजा के पिता समान हो, इसलिए उनकी करनी का बोझ तुम्हारे भाग में भी आएगा; तुम्हें उनकी कुछ कृत्यों की सजा भुगतनी पड़ेगी।
परन्तु सुनो राजन, तुम्हारे हृदय की सच्चाई और तुम्हारी पत्नी की भक्ति ने मुझे प्रसन्न किया है।
इसलिये मैं तुम्हें महान सुख भी देता हूँ — आज से नौ महीनों में तुम्हारी छोटी रानी को पुत्र प्राप्त होगा।
जब मैंने इस राज्य में प्रवेश किया तो तुम्हारे अलावा केवल वही थी ,जिसने मुझ पर कोई नकारात्मक भाव न दिखाया।
उसके मन में तुम्हारे प्रति अटूट विश्वास और भक्ति है।
और जब तुमने मेरी सेवा पिता के समान की, तो उसकी दृष्टि में भी वह ममता जाग उठी—इसी कारण उसे यह वरदान दिया जा रहा है।’"
देवता ने गम्भीर मुख से कहा—‘तुम्हारा पुत्र एक महान सम्राट बनेगा।
उसे मेरा वरदान प्राप्त होगा: असीम बुद्धि और अपार ऊर्जा उसे सदा मार्गदर्शक बनेंगी।
वह अपनी शक्ति और विवेक से किसी भी कठिन परिस्थिति का सामना कर सकेगा; भले ही विपदा कितनी भी भयानक क्यों न हो।
वह उससे निकलने का मार्ग निकाल लेगा।
मैं स्वयं उसकी रक्षा करूँगा और उसका नाम तुम्हारे कुल का मान बढ़ाएगा।
परन्तु सुनो, हे राजन—मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि तुम उस बल और गौरव को अपने जीवित रहते नहीं देख सकोगे।
जैसे ही तुम्हारा पुत्र पाँच वर्ष का होगा, उसी समय तुम्हारा देहान्त हो जाएगा।’"
राजा फूट-फूट कर रोने लगे।
काँपते स्वर में बोले—‘महाराज! आपका हर एक श्राप और वरदान मैं स्वीकृत करता हूँ।
आपने मेरे वंश का मान बढ़ाने के लिए जो वरदान दिया और जिसने मेरी पत्नी के गर्भ में संतान का वास कर दिया, उसके लिए मैं आपका कोटि-कोटि नमन करता हूँ।’
वे देवता के चरणों पर माथा टेक देते है।
और मन ही मन यह प्रण कर बैठे कि अपने पुत्र की परवरिश वे अपने प्राणों से भी बढ़कर करेंगे—भले ही स्वयं उसे दीर्घकालीन वैभव देखना न हो सके।"
"सुनो, हे राजन," देवता ने मंद स्वर में कहा, "जैसे ही मैं इस लोक से चला जाऊँगा, तुम सभी इस घटित घटना को एक स्वप्न समझकर भुला दोगे।"
इतना कहकर देवता मुस्कराए और उनकी दिव्य आभा आकाश में विलीन होने लगी।
क्षणभर में तेजस्वी प्रकाश बुझ गया, और महल फिर से वैसा ही दिखने लगा जैसा पहले था।
वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें भारी हो गईं।
जब उन्होंने आँखें खोलीं तो किसी को भी देवता का स्मरण शेष न रहा।
सबको ऐसा प्रतीत हुआ मानो यह सब कोई स्वप्न था।
केवल राजा के हृदय में एक हल्की-सी करुणा और गहन संतोष रह गया, परंतु कारण कोई न समझ पाया।"
"समय अपनी गति से चलता रहा।
दिन, सप्ताह और मास बीतते गए।
देवता के विलीन हो जाने के कुछ ही समय बाद महल में एक अद्भुत परिवर्तन घटा।
छोटी रानी ने यह अनुभव करना शुरू किया कि उसके गर्भ में जीवन पल रहा है।
धीरे-धीरे यह समाचार पूरे महल में फैल गया।
महल की स्त्रियाँ आनंद से भर उठीं और रानी की सेवा में तत्पर हो गईं।
राजमहल में उत्सव का वातावरण छा गया।
प्रजा के बीच भी यह खबर पहुँची तो लोग हर्षित हो उठे, यद्यपि उन्हें यह ज्ञात न था कि यह संतान वास्तव में देवता का दिया हुआ वरदान है।
लेकिन जहाँ महल में खुशियों की लहर छाई हुई थी, वहीं अंधकार की परछाइयाँ भी गहरी होने लगीं।
बड़ी रानी के मन में ईर्ष्या की अग्नि धीरे-धीरे सुलग उठी।
उसके भाई, जो लंबे समय से राजसिंहासन की लालसा रखते थे, उसे बहकाने लगे।
उन्होंने बड़ी रानी से कहा—‘देखो, यदि छोटी रानी का पुत्र बड़ा हुआ तो सारा राज्य उसी का होगा और तुम्हारा महत्व मिट जाएगा।’
उनके विषैले शब्दों ने बड़ी रानी का मन डिगा दिया।
पहले तो उसने विरोध किया, परंतु धीरे-धीरे वह अपने भाइयों की बातों में आ गई।
और फिर, उनके कहने पर वह उनके षड्यंत्रों में सम्मिलित हो गई—
छोटी रानी के गर्भस्थ शिशु को मारने की साज़िशें गुप्त रूप से रची जाने लगीं।"
बड़ी रानी और उसके भाई अब पूरी तरह षड्यंत्र में डूब चुके थे।
पहले उन्होंने छोटी रानी को मारने का प्रयास किया।
रसोई में गुप्त रूप से ज़हर मिलाकर भोजन भेजा गया।
परंतु अद्भुत संयोग यह हुआ कि हर बार भोजन बदल गया या बर्तन गिर पड़ा, जिससे छोटी रानी बच गई।
यह असफलता उन्हें और भी क्रोधित कर गई।
फिर उन्होंने तांत्रिकों को बुलाया।
आधी रात को महल के बाहर काले वस्त्रों में लिपटे तांत्रिक मन्त्र पढ़ते, मुट्ठीभर राख फेंकते और शिशु को गर्भ में ही नष्ट करने के लिए यज्ञ करने लगे।
कभी वे गुड़ियों पर कील गाड़कर तंत्र साधते, कभी राख और नींबू रानी के कक्ष की ओर फेंकते।
लेकिन हर बार कोई अदृश्य शक्ति उनके मंत्रों को निष्फल कर देती।
इसके बाद उन्होंने महल के भीतर गुप्त जासूसों को लगाया।
कभी रानी की दाई को खरीदा गया, कभी औषधि में जहर मिलाने की कोशिश की गई।
रात के अंधेरे में एक बार तो बड़ी रानी स्वयं भी अपनी बहन के कक्ष तक पहुँच गई, लेकिन किसी अनजानी दिव्य शक्ति ने उसे इतना भयभीत कर दिया कि वह भाग खड़ी हुई।
अनगिनत षड्यंत्र रचे गए—जहर, तंत्र, छल, धोखा—परंतु प्रत्येक बार असफलता ही हाथ लगी।
महल में किसी को कुछ समझ न आता, पर सच्चाई यही थी कि गर्भस्थ शिशु के चारों ओर अदृश्य देव-शक्ति रक्षा कवच बनकर खड़ी थी।
महल के अंधेरों में षड्यंत्र पर षड्यंत्र रचे जा रहे थे।
बड़ी रानी और उसके भाई हर बार नाकाम होने के बावजूद हार नहीं मानते थे।
वे और भी खतरनाक कदम उठाने की योजनाएँ बनाने लगे।
अब उनका इरादा सिर्फ़ छोटी रानी को नहीं, बल्कि उसके गर्भस्थ शिशु को हर हाल में समाप्त करना था।
तांत्रिकों से लेकर हत्यारों तक सबको मिलाने की कोशिश की गई।
पर आश्चर्य की बात यह थी कि राजा को इन सब की तनिक भी भनक नहीं लगी।
वे अपनी भावी संतान के आने की कल्पना में खोए रहते।
उन्हें विश्वास ही न था कि महल के भीतर ही उनकी प्राणों से भी प्रिय पत्नी और होने वाले पुत्र पर इतनी भयानक साजिशें चल रही हैं।
प्रजा भी राजा की इस मासूम खुशी में शामिल थी, इसलिए षड्यंत्र की काली परछाई केवल महल की दीवारों के पीछे ही गुप्त रूप से सुलग रही थी।"
"लेकिन बड़ी रानी और उसके भाइयों की साज़िश महफूज़ न रह सकी।
उनकी गपशप और योजनाएँ किसी न किसी तरह महल की हवाओं में फैलने लगीं, और विश्वासपात्रों की नज़रों से कुछ छिप न पाया।
रानी की सबसे भरोसेमंद नौकरानी, जो दिन-रात उसके आस-पास रहती थी, वह सब सुन गई—
कई छिपे हुए संकेत, रातों के फुसफुसाते कार्यक्रम और गुप्त मिलने वालों की आहट।
बह छोटी रानी की खास नौकरी की,सगी बड़ी बहन थी। उसने जाकर अपनी बहन को बताया।वह जान गई कि कोई बड़ा कुकर्म रचा जा रहा है, और उसका हृदय काँप उठा।
जब उसने सुनो तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई
उसने छोटीरानी को सब कुछ बताना चाहा , पर रानी के गर्भ के कारण स्थिति जोखिम भरी थी।
सोच-समझ कर, नौकरानी ने स्वयं एक कठिन निर्णय लिया—
नौकरानी ने साहस कर लिया।
उसने रानी के वस्त्र और आभूषण पहन लिए और धीरे से रानी के बिस्तर पर लेट गई।
जैसे कोई गहरी नींद सो रही हो।
वह चाहती थी कि यदि अँधेरे में कोई छापा पड़े तो वे रानी को जीवित पायें न कि उसके गर्भस्थ शिशु को।
जब षड्यंत्रकारी रात के पर्दे में घुसे और चुपके से कक्ष में प्रवेश किया, तो उन्होंने जिस आभास से देखा वह उन्हें संतुष्ट कर गया—
उनके सामने वही 'रानी' रही, न कि असली मूरत।
वे बिना देर किए अपने कृत्य करने निकले, परन्तु उनकी आत्माओं में कोई भी दया नहीं दिखी।
दूसरी ओर, महल के दूसरे भाग में, मंगल-शंखध्वनिनवमास पूर्ण होते ही महल में एक दिव्य रौशनी छा गई।
मधुर शंखध्वनि और मंगलगीतों के बीच छोटी रानी ने एक तेजोमय पुत्र को जन्म दिया।
महल आनंद और उल्लास से गूंज उठा।
समस्त राज्य में दीप प्रज्वलित किए गए और प्रजा ने इसे ईश्वर की कृपा मानकर उत्सव मनाया।"
कुछ समय पहले
जब नौकरानी को आभास हुआ कि आज रानी की हत्या की साजिश को अंजाम दिया जाना है।
तो उसे कुछ पल के लिए कुछ समझ नहीं आया।
,उसने पहले रानी को सब बताने की कोशिश की।
पर उस समय रानी की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, वह अत्यधिक अशक्त हो चुकी थी।
उसने देखा की रानू को प्रसव पीढ़ा होने लगी है,
इसलिए नौकरानी ने उसे बिना घबराए चुपचाप दूसरे कक्ष में पहुँचा दिया, जहाँ वैद्य और दाइयाँ उसकी अच्छी तरह देखभाल कर सकें।"
"रानी को सुरक्षित दूसरे कक्ष में पहुँचा देने के बाद नौकरानी ने निश्चय किया कि अब वही रानी की जगह लेगी।
उसने रानी के वस्त्र और आभूषण धारण कर लिए और उसी बिस्तर पर जा लेटी जहाँ रानी को होना चाहिए था।
बाहर से देखने पर कोई अंतर नहीं लगता था।
कमरे की मद्धिम रौशनी और भारी पर्दों के बीच, जो भी भीतर आता, उसे यही आभास होता कि बिस्तर पर रानी विश्राम कर रही है।
नौकरानी का हृदय तेज़ धड़क रहा था, परंतु उसके मन में यह दृढ़ निश्चय था कि चाहे जो हो जाए, वह अपनी स्वामिनी और उस गर्भस्थ शिशु की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटेगी।
"आधी रात का समय था।
महल की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था।
तभी कुछ परछाइयाँ दबे पाँव उस कक्ष की ओर बढ़ीं, जहाँ उन्हें विश्वास था कि छोटी रानी विश्राम कर रही है।
दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराता हुआ खुला और अंधेरे में उनकी शातिर आँखें बिस्तर पर टिक गईं।
आभूषणों और वस्त्रों से सजी आकृति देखकर वे आश्वस्त हो गए कि यही छोटी रानी है।
षड्यंत्रकारी चुपचाप भीतर आए और बिना देर किए अपने घातक इरादे को अंजाम देने लगे।
लेकिन उन्हें तनिक भी आभास नहीं था कि जिसको वे निशाना बना रहे हैं, वह वास्तव में रानी नहीं बल्कि उसकी विश्वासपात्र नौकरानी है।
, जिसने अपनी स्वामिनी और उसके गर्भस्थ पुत्र को बचाने के लिए यह बलिदान स्वयं चुना था।
कमरे में दबे स्वर में खड़खड़ाहट और हलचल हुई, फिर सब कुछ गहरे सन्नाटे में डूब गया।"
"इधर एक जीवन ने बलिदान दे दिया, उधर एक नया जीवन जन्म लेकर संसार में आया।
जब षड्यंत्रकारियों के कानों में शंखनाद और मंगल-गीतों की ध्वनि पहुँची, तो उन्हें लगा कि कुछ गड़बड़ है।
वे तुरंत लौटे और जब उस निष्प्राण शरीर को देखा तो सच्चाई सामने आ गई—
वह रानी नहीं, बल्कि उसकी विश्वासपात्र नौकरानी थी।
बड़ी रानी और उसके भाई घबरा उठे।
अपने अपराध को छिपाने के लिए उन्होंने नौकरानी की देह को उठा लिया और उसे इस प्रकार सजा-सँवार दिया मानो किसी और कारण से उसकी मृत्यु हुई हो।
उन्होंने पूरे प्रपंच को इस तरह गढ़ा कि महल में किसी को तनिक भी संदेह न हो।
पर वे यह भूल गए कि मनुष्य चाहे कितनी ही चतुराई से अपने अपराध को छिपा ले, ईश्वर की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं रहता।
उनकी हर करणी का हिसाब ऊपरवाला रख रहा था, और समय आने पर उन्हें इसका पूरा दंड भुगतना ही होगा_चाहे वह दंड देर से क्यों न मिले।
""उसी समय महल के दूसरे हिस्से में खुशियों का समंदर उमड़ पड़ा।
छोटी रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
शंखध्वनियाँ गूँज उठीं, नगाड़े बजने लगे और दीप प्रज्वलित कर पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया।
प्रजा ने इसे देवताओं की कृपा मानकर नाच-गाकर रात को स्वर्णिम बना दिया।
महल में मधुर गीत गाए गए और दाइयों ने आशीर्वाद दिया कि यह बालक एक दिन महान सम्राट बनेगा।
राजा जब अपने पुत्र को पहली बार गोद में लेते हैं, तो उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है।
उनके लिए यह पल जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी—वह संतान सुख, जिसके लिए वे बरसों से तरसते आए थे।
इस प्रकार महल एक ओर हर्षोल्लास और दूसरी ओर अदृश्य नियति की गंभीरता से भर गया।
प्रजा और परिवार उत्सव में मग्न थे, पर केवल राजा ही थे जिनके हृदय में आनंद और करुणा के साथ-साथ भविष्य की पीड़ा भी बस चुकी थी।
कृपया इस कहानी को प्यार करे ये पुरानी कहानी है जिसे मेरी मां सुनाया करती थी
धन्यवाद 🙏 🙏 🙏