Vardaan - 4 in Hindi Mythological Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | वरदान - 4

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वरदान - 4

राजमहल का प्रसव कक्ष उस समय दीपों की रौशनी और मंगल ध्वनियों से जगमगा रहा था।

चारों ओर रेशमी परदे लटक रहे थे, जिन पर सोने की महीन कढ़ाई की गई थी।

फर्श पर स्वच्छ सफ़ेद चादरें बिछी थीं और हवा में चंदन और केसर की सुगंध फैली हुई थी।

कक्ष के एक ओर वैद्य और दाइयाँ व्यस्त थीं, उनकी आँखों में उत्सुकता और चेहरे पर गंभीरता थी।

जैसे ही शिशु की पहली किलकारी गूँजी, वैद्य ने प्रसन्न होकर घोषणा की—'राजकुमार का जन्म हुआ है!'

तुरंत दाइयों ने रत्नजड़ित थालियों में हल्दी-कुमकुम, पुष्प और दीप रखकर शुभ वाणी उच्चारी।

छोटी रानी बिस्तर पर थकी हुई किंतु प्रसन्न मुस्कान के साथ लेटी थीं।

उनकी आँखों में आँसू थे, पर उन आँसुओं में पीड़ा नहीं, बल्कि खुशी की चमक थी।

पास ही खड़ी स्त्रियाँ घुटनों के बल बैठकर भगवान का धन्यवाद कर रही थीं।

दीवारों पर टंगे दीपकों से निकलती सुनहरी आभा और बाहर से आती शंख-नगाड़ों की ध्वनि मिलकर

वातावरण को किसी मंदिर जैसा पवित्र बना रही थी।

कक्ष में उपस्थित हर व्यक्ति को लग रहा था मानो स्वयं देवताओं ने इस क्षण को आशीर्वाद देने के लिए आकाश से उतरकर झिलमिला रही रौशनी बिखेरी हो।

जन्म लेते ही राजकुमार के मुख पर दिव्य रोशनी चमक रही थी।

मानो सूर्योदय की पहली किरण धरती पर उतर आई हो।

उसकी त्वचा से हल्की सुनहरी आभा झलक रही थी और उसकी आँखों में अद्भुत चमक थी, जो किसी साधारण शिशु में नहीं हो सकती।

जब उसने पहली बार अपनी मासूम आँखें खोलीं, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनमें ज्ञान और भविष्य की गहराई छिपी हो।

उसके रोने की ध्वनि भी सामान्य शिशुओं जैसी नहीं थी।

वह मधुर, कोमल और किसी शंखनाद की तरह गूँजती थी।

उपस्थित लोग विस्मित होकर एक-दूसरे से कहते, 'यह बालक साधारण नहीं है, यह तो देवताओं का वरदान है।'

राजकुमार के माथे पर एक स्वाभाविक तेज झलकता था, मानो भाग्य स्वयं उसके ललाट पर लिख दिया गया हो।

जो भी उसे देखता, उसके हृदय में असीम स्नेह और श्रद्धा भर जाती।

सचमुच, वह बालक राज्य की ज्योति और वंश का गौरव बनकर आया था

जब राजकुमार के जन्म का समाचार प्रजा तक पहुँचा, तो पूरा राज्य आनंद से झूम उठा।

नगर की गलियों में दीपक जल उठे, घर-घर से मंगलगीत गूँजने लगे।

लोग अपने-अपने आँगनों में रंगोली सजाने लगे और बच्चों ने फूल बरसाए।

जब पहली बार लोगों को राजकुमार के दर्शन कराए गए, तो सभी विस्मित रह गए। 

उस शिशु के मुखमंडल पर जो तेज झलक रहा था, उसने हर हृदय को छू लिया।

बुज़ुर्गों ने आँसू भरी आँखों से कहा—'यह बालक हमारे राज्य का भविष्य है।'

महिलाएँ उसकी ओर देख-देखकर आशीर्वाद देने लगीं, और पुरुष गर्व से सिर ऊँचा उठाकर जयकार करने लगे।

चारों ओर नगाड़े बजने लगे, शंखध्वनि से वातावरण गूँज उठा और फूलों की वर्षा होने लगी।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं देवताओं ने आकाश से उतरकर इस उत्सव में भाग लिया हो।

प्रजा की खुशी का ठिकाना न था, क्योंकि वे जान चुके थे कि उनके राजा के वंश में जन्मा यह तेजस्वी बालक एक दिन महान सम्राट बनकर उनका मार्गदर्शन करेगा।"

राजकुमार के जन्मोत्सव के लिए महल को अद्भुत ढंग से सजाया गया।

चारों ओर फूलों की मालाएँ लटक रही थीं, आँगनों में दीपमालाएँ जगमगा रही थीं और हवा में चंदन और अगरबत्ती की सुगंध फैली हुई थी।

नर्तकियाँ और गवैये मंगलगीत गा रहे थे। प्रजा को महल में प्रवेश कर दर्शन का अवसर दिया गया।

हर कोई उस दिव्य बालक की एक झलक पाने के लिए उत्सुक था।

कुछ ही दिनों बाद राजकुमार का नामकरण संस्कार बड़े विधि-विधान से संपन्न हुआ।

महल के प्रांगण में यज्ञ वेदी सजाई गई।

आचार्य और ऋषिगण वेद-मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे।

वातावरण शंख, घंटियों और मंत्रों की ध्वनि से गूँज रहा था।

राजा और रानियाँ स्वयं पुत्र को लेकर वेदी के पास बैठे।

जब शुभ मुहूर्त आया तो राजपुरोहित ने बालक के कान में धीरे से उसका नाम उच्चारित किया।

उसी क्षण आकाश से एक दिव्य झोंका आया और चारों ओर पुष्प वर्षा होने लगी।

प्रजा ने जोर से जयकार की—‘जय हो! जय हो!’

राजकुमार का नाम बड़े ही शुभ और पौराणिक अर्थ वाला रखा गया, ताकि उसका जीवन भी उसी नाम की तरह तेजस्वी और महान बने।

नामकरण के साथ ही महल में उत्सव और भी भव्य हो उठा।

प्रजा को मिठाइयाँ बाँटी गईं, ढोल-नगाड़े बजने लगे और राज्य में सात दिनों तक उत्सव मनाया गया।"

नामकरण के शुभ मुहूर्त में जब राजपुरोहित ने वेद-मंत्रों का उच्चारण करते हुए बालक के कान में उसका नाम कहा—'राजवर्धन'—तो पूरा प्रांगण जयघोष से गूँज उठा।

प्रजा ने आनंदित होकर तालियाँ बजाईं और एक स्वर में कहा—'जय राजवर्धन! जय राजवर्धन!'

राजा की आँखें आँसुओं से भर आईं। उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कहा—'आज से तुम मेरे वंश की ज्योति हो।

तुम्हारा नाम राजवर्धन है, जो सदा हमारे राज्य का गौरव बढ़ाएगा।'

छोटी रानी ने अपने पुत्र को हृदय से लगाकर आँखें मूँद लीं, मानो यह क्षण उनके जीवन की सबसे बड़ी पूर्ति हो।

और पूरा महल, पूरा राज्य सात दिनों तक उत्सव में डूबा रहा, क्योंकि अब सब जानते थे कि यह बालक केवल एक उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि देवताओं का दिया हुआ वरदान है।"

राजवर्धन का बचपन महल की भव्यता और माता-पिता के प्रेम में बीतने लगा।

परंतु नियति का लेखा कुछ और ही था।

महल के भीतर हर्ष और उल्लास था, लेकिन अदृश्य रूप से समय अपनी गिनती कर रहा था।

देवता के वचन अभी भी सत्य होने की प्रतीक्षा कर रहे थे—जैसे ही राजवर्धन पाँच वर्ष का होगा, राजा का जीवन समाप्त हो जाएगा।

राजा जब-जब अपने पुत्र को खेलते देखते, उनके हृदय में दर्द उठता—'काश मैं और जीवित रह पाता, ताकि अपने बेटे की रक्षा कर पाता।'

पर वे जानते थे कि समय आने पर राजवर्धन को अकेले ही जीवन की अग्निपरीक्षा देनी होही।

जैसे-जैसे राजकुमार राजवर्धन बड़ा होता गया, राजा का स्नेह उस पर और भी गहरा होता चला गया।

पुत्र की मासूम मुस्कान और मधुर किलकारियाँ देखकर वे अपने सारे दुःख, सारी चिंताएँ भूल जाते।

यहाँ तक कि उन्हें देवता के कहे हुए शब्द भी स्मरण न रहे। अब उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख था—अपने पुत्र की संगति।

परंतु महल की सुनहरी दीवारों के पीछे षड्यंत्र और भी गहरा हो रहा था।

जहाँ पहले लक्ष्य गर्भस्थ शिशु और रानी थी, वहीं अब शिकार बदल चुका था।

अब षड्यंत्रकारियों की नज़र सीधे राजा पर थी।

वे जानते थे कि जब तक राजा जीवित है, उनकी कुटिल योजनाएँ कभी सफल नहीं होंगी।

इसलिए अब सारा विष और सारी चालें स्वयं महाराज को समाप्त करने पर केंद्रित हो गईं।

बड़ी रानी अब अपना चेहरा बदल चुकी थी।

जब से राजकुमार राजवर्धन का जन्म हुआ था, वह दिखावे में ऐसे व्यवहार करने लगी मानो उसे भी इस बालक से सगी माँ जैसा प्रेम हो।

महल के सामने वह हर छोटी-बड़ी बात में आगे बढ़कर हिस्सा लेती—कभी राजकुमार को गोद में उठाती, कभी उसे दुलारती, और कभी उसके खेलों में भी सम्मिलित हो जाती।

प्रजा और महल के सेवक यही मानने लगे कि बड़ी रानी ने अब अपने मन का द्वेष भुला दिया है।

यहाँ तक कि छोटी रानी भी कई बार उसके इस बदले रूप को देखकर आश्चर्य करती।

बड़ी रानी राजवर्धन की परवरिश में बढ़-चढ़कर भाग लेती और सगी माँ की तरह उसकी देखभाल करती।

परंतु यह सब केवल एक मुखौटा था।

उसके मन के भीतर अब भी ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा की आग जल रही थी।

उसका असली लक्ष्य अब भी वही था—सिंहासन।

और इस बार शिकार कोई और नहीं, बल्कि स्वयं राजा बनने वाले थे।"

एक दिन जब राजा ने दरबार में अपने पुत्र राजवर्धन को युवराज घोषित करने की इच्छा प्रकट की, तब बड़ी रानी ने बड़ी चतुराई से उनकी बात टाल दी।

वह मधुर स्वर में बोली—‘हे महाराज, राजकुमार अभी बहुत छोटा है।

उसे अभी खेलने-कूदने दो, क्यों इतनी जल्दी उसके कंधों पर राज्य का बोझ डालना चाहते हो?

अभी वह बालक है, उसके लिए यही उचित है कि वह निश्चिंत होकर बचपन का सुख ले।

वैसे भी हमारा पुत्र असाधारण रूप से होशियार और प्रतापी है।

जब समय आएगा, तो वह स्वयं अपनी योग्यताओं से राज्य सँभाल लेगा।

क्यों न उसे कुछ वर्षों बाद युवराज घोषित किया जाए?’

राजा उसकी बातों में उलझकर मौन हो गए।

उन्हें लगा कि बड़ी रानी की बात सही है।


राजा :दरबार में

“मेरा मन चाहता है कि अब राजवर्धन को युवराज घोषित कर दिया जाए।

वह मेरा उत्तराधिकारी है और राज्य की प्रजा को भी यह जानना आवश्यक है कि अगला राजा कौन होगा।”

बड़ी रानी :नम्र और मधुर स्वर में

“हे महाराज, राजकुमार अभी बहुत छोटा है।

क्या इस उम्र में उसके मासूम कंधों पर राज्य का इतना बड़ा बोझ डालना उचित होगा?”

राजा :गंभीर होकर

“परंतु मैं चाहता हूँ कि समय रहते सबको पता चल जाए कि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी कौन है।

यह प्रजा के विश्वास और राज्य की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।”

बड़ी रानी :धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए

“आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, परंतु सोचिए, वह अभी खेल-कूद की अवस्था में है।

उसे निश्चिंत होकर अपना बचपन जीने दीजिए।

वैसे भी हमारा पुत्र अत्यंत होशियार और प्रतापी है।

उसके भीतर जन्म से ही असाधारण गुण हैं।

समय आने पर वह स्वयं सिद्ध कर देगा कि वह युवराज कहलाने के योग्य है।”

राजा :थोड़ा विचार में पड़ते हुए

“हूँ… तुम्हारी बात में तर्क है।

शायद अभी समय नहीं आया।”

बड़ी रानी :विनम्रता से सिर झुकाकर

“जी महाराज, यही उचित होगा।

कुछ वर्षों बाद जब वह और परिपक्व हो जाएगा, तब आप स्वयं देखेंगे कि वह राज्य की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए सबसे श्रेष्ठ है।”

छोटी रानी अत्यंत सरल स्वभाव की थी।

वह न तो राजनीति समझती थी, न षड्यंत्र।

उसके लिए राजा का हर शब्द आदेश था और बड़ी रानी की हर बात सत्य।

जब राजा और बड़ी रानी के बीच राजवर्धन को युवराज घोषित करने पर वार्तालाप हुआ, तो छोटी रानी चुपचाप सुनती रही।

राजा ने उसकी ओर देखा और पूछा—‘तुम्हारा क्या विचार है?’

छोटी रानी ने सिर झुकाकर धीरे से कहा—‘महाराज, मैं तो आपकी और बड़ी रानी की बात से ही सहमत हूँ।

जो आप दोनों उचित समझें, वही मेरे लिए सत्य है।’

उसकी इस सरलता और आज्ञाकारिता के कारण महल के लोग उसे बहुत सम्मान तो देते थे,ल

परंतु यही स्वभाव उसे राजनीति और छल के खेल से दूर रखता था।

उसे यह तनिक भी आभास नहीं था कि बड़ी रानी की मीठी बातों के पीछे कितना गहरा षड्यंत्र छिपा हुआ है।