अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या वीर के पत्र को पढ़कर भावुक हो गई और मन ही मन अनुराग से दूरी बनाने का निश्चय करने लगी। ससुराल में स्वागत के बाद भी उसके विचार वीर के इर्द-गिर्द ही घूमते रहे। सुहागरात पर जहाँ अनुराग उत्साहित था, वहीं अनन्या वीर की यादों में डूबी हुई सो गई। अब इसके आगे-
अनन्या को गहरी नींद में सोता देखकर अनुराग ने सोचा, कितने चैन से सो रही है ... थक गई होगी, सोने देता हूँ, ऐसे में उठाना पूरा स्वार्थी लगने जैसा ही होगा। वह भी अनन्या के बाजू में लेट गया। वह काफ़ी समय तक उसकी खूबसूरती को देखता रहा। उसके गुलाबी पतली कली की तरह सुंदर होंठों को चूमने के लिए वह तड़प रहा था। परंतु उसने स्वयं पर नियंत्रण रखना सीखा था और वह उसमें सफल भी हुआ। अनन्या को देखते-देखते ही उसे भी नींद ने अपनी बाँहों में भर लिया।
आज की पहली रात रोमांस से भरी हुई ना होकर एकदम सुस्त नीरस ही बीत गई। सूरज की किरणों ने अपना अस्तित्व दिखाना भी शुरू कर दिया। तभी अनन्या की आँख खुली तो उसने देखा, उसके बाजू में अनुराग गहरी नींद में सो रहा है। वह दंग थी कि अनुराग ने उसे उठाया नहीं।
वह और कुछ सोच पाती, उससे पहले ही उसने तकिये के नीचे से अपना मोबाइल निकाल कर देखा तो वीर का मैसेज दिखाई दिया। उसने लिखा था, तुम मेरी हो अनु, अपने आप को संभाल कर रखना। तुम्हारे मन और तन पर सिर्फ़ मेरा हक़ है। अनन्या ने जल्दी से मैसेज डिलीट कर दिया और कपड़े बदल कर कमरे से बाहर चली गई। अनुराग देर तक सोता रहा।
अनु को देखते ही शैलजा ने कहा, "आओ बेटा, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ।"
"नहीं मम्मी जी, मैं बनाती हूँ हम सबके लिए।"
वह चाय बना रही थी, तब तक अनुराग भी रसोई में आ गया और अनु की तरफ़ देखकर उसने कहा, "अनु, चाय लेकर कमरे में आना प्लीज।"
"ठीक है, अभी आती हूँ।"
अनन्या सोच रही थी, अनुराग उसे इस तरह क्यों बुला रहा है। खैर, चाय बनाकर वह दो कप चाय लेकर कमरे में पहुँची तो अनुराग ने उसके आते ही दरवाज़ा बंद कर लिया।
अनन्या ने डरते हुए पूछा, "यह क्या कर रहे हैं आप? यदि मम्मी जी बुलाएंगी तो?"
"कोई नहीं बुलाएगा अनु। सब जानते हैं नई-नई शादी हुई है हमारी। रात को तुम बहुत थक गई थीं ना, इसलिए मैंने तुम्हें नहीं जगाया। आओ बैठो मेरे पास। कल रात मैं तुम्हारे लिए कुछ उपहार लेकर आया था जो तुम्हें दे ना सका। परंतु अभी देना चाहता हूँ," कहते हुए उसने रंगीन कागज़ में लिपटा एक बॉक्स उसके हाथ में दिया जिस पर हार्ट बना हुआ था।
मजबूरी में ही सही, परंतु अनन्या को वह लेना ही पड़ा।
अनुराग ने कहा, "अनु, खोलो ना बॉक्स ... देखो मैं क्या लाया हूँ? तुम्हें पसंद आएगा या नहीं, मैं देखना चाहता हूँ?"
अनन्या ने जैसे ही बॉक्स खोला तो वह चौंक गई। उसमें हीरे का मंगलसूत्र चमक कर अपनी रौशनी बिखेर रहा था। उसके साथ ही एक और डब्बे में लाल रंग की कांच की चूड़ियाँ थीं, बिंदी का पैकेट और बिछिया भी थी।
अनुराग ने कहा, "एक पत्नी के लिए शायद इससे अच्छा तोहफ़ा और कुछ हो ही नहीं सकता। यही सोचकर मैंने पूरा सुहाग का सामान लेना पसंद किया। तुम्हें कैसा लगा अनु?"
अनन्या दंग थी, ऐसे उपहार की तो उसने कल्पना भी नहीं की थी।
उसने धीरे से कहा, "यह तो बहुत ही सुंदर उपहार है।"
अनुराग ने कहा, "आओ, मैं अपने हाथों से तुम्हें यह मंगलसूत्र पहनाता हूँ, पीछे घूमो।"
अनन्या कुछ ना कह सकी। वह जैसे ही पीछे घूमी, अनुराग की उंगलियों के स्पर्श ने उसे रुला दिया।
रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः